Saturday, August 4, 2018

बाहर निकलूं मैं भी भीगूं चाह रहा है मेरा मन

अम्मा जरा देख तो ऊपर
चले आ रहे हैं बादल,
गरज रहे हैं, बरस रहे हैं
दीख रहा है जल ही जल।

हवा चल रही क्या पुरवाई
झूम रही है डाली-डाली,
ऊपर काली घटा घिरी है
नीचे फैली हरियाली।

भीग रहे हैं खेत, बाग, वन
भीग रहे हैं घर आँगन,
बाहर निकलूं मैं भी भीगूं
चाह रहा है मेरा मन।

दोस्‍तो, ये कविता किसकी लिखी है, मुझे तो नहीं मालूम, पर आजकल चारों ओर जल ही जल है। और बारिश किसे अच्‍छी नहीं लगती। आपको लगती है न? मन करता है, बारिश में भीगें, नाचें गाएं, गलियों में दौड़ लगाएं और दोस्‍तों के साथ मिलकर कागज की नाव चलाएं।

पर बारिश में ज्‍यादा भीगने से बीमार होने का डर भी रहता है। जानते हो क्‍यों? क्‍योंकि बारिश में तमाम तरह के वायरस/बैक्‍टीरिया एक्टिव हो जाते हैं, जिसकी वजह से बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए पानी में खेलना या भीगने से जितना हो सके, बचना चाहिए।

दोस्‍तो, जब ज्‍यादा बारिश हो जाती है, तो हमारी गली-मुहल्‍लों में पानी भर जाता है और बहुत सारी जगहों पर तो बाढ Floods आ जाती है। बाढ़ की वजह से खेत और घर डूब जाते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, सड़कें, पुल, जानवर, पेड़ और यहां तक कि बहुत से लोग भी बाढ़ की चपेट में आकर बह जाते हैं। सैकड़ों लोग मारे जाते हैं, हजारों घर तबाह हो जाते है। यहां तक कि लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाते हैं।

ऐसा होने के पीछे आमतौर से हम प्रकृति को जिम्‍मेदार ठहराते हैं। लेकिन सिर्फ प्रकृति ही दोषी नहीं, दोषी हम भी हैं। क्‍या कहा, कैसे? अरे भई, आपने देखा होगा कि अक्‍सर लोग अपने घर का कचरा नाली में फेंक देते हैं। इस कचरे में ढेर सारी पॉलीथिन भी होती हैं, जो नष्‍ट नहीं होतीं। इससे नालियां और सीवर चोक हो जाते हैं। ऐसा होने पर बारिश का पानी नालियों से निकल नहीं पाता और गली-मोहल्‍लो में भर जाता है। और हमारे मोहल्‍लों का यही कचरा नालियों और नालों से होता हुआ नदियों तक जा पहुंचता है। कचरा जमा होने के कारण नदियां भी धीरे-धीरे पटती जा रही हैं, जिससे बारिश का पानी उनके भीतर समा नहीं पाता और वह खेतों और बस्तियों में बाढ के रूप में बिखर जाता है।

वैसे तो बाढ़ के और भी बहुत से कारण हैं, पर अगर हम पॉलिथीन का प्रयोग बंद कर दें और अपने घर और बाहर की नालियों को साफ रखें, तो हम अपने घर और गलियों में पानी भरने और उसकी वजह से होने वाली समस्‍याओं से काफी हद तक बच सकते हैं।

उम्‍मीद है कि आप मेरी बातों पर गौर फरमाएंगे और संभल कर बारिश का आनंद उठाएंगे।


Thursday, June 7, 2018

गर्मी की छुट्टी और मीठे-मीठे आम।

मीठा होता खस्ता खाजा
मीठा होता हलुआ ताजा,
मीठे होते गट्टे गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठे होते आम निराले
मीठे होते जामुन काले,
मीठे होते गन्ने गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

दोस्तों, बच्‍चों के प्‍यारे कवि सोहन लाल द्विवेदी की यह कविता तुमने जरूर पढी होगी। वैसे आजकल तो तुम्‍हारी छुट्टियां चल रही हैं। और छुट्टी का मतलब है दादी-नानी का गांव और ढेर सारी मस्‍ती, वो भी आम के बगीचों में।

तुम्‍हें तो पता ही है कि आम को फलों का राजा कहा जाता है। आम का साइंटिफिक नाम है मैंगीफेरा इंडिका (Mangifera indica)। आम का इतिहास बहुत पुराना है। आजकल तो इसी तरह-तरह की वरायटी भी मिलती हैं, जैसे दशहरी, लंगड़ा, चौसा, बंबइया..। तुम्‍हें कौन सा आम पसंद है?

क्‍या तुम्‍हें पता है कि भारत में आम की तरह ही आम के पकवान भी लोकप्रिय हैं। आम का अचार तो सबको पसंद आता है। यह खाने में चार चांद लगा देता है। इसके अलावा बच्‍चों को मैंगो शेक भी बहुत पसंद आता है। अच्छा, इसके अलावा आम के कौन-कौन से व्‍यंजन बनते हैं? और हां, तुमने आम के कौन-कौन से पकवान खाए हैं, हमें जरूर बताना।
आम पर तो एक कहावत भी है- आम के आम गुठलियों के दाम। यानी किसी भी चीज से भरपूर फायदा उठाना। वैसे एक बताओ, तुम आम खाने के बाद गुठलियां क्‍या करते हो? क्‍या कहा, कूडू में फेंक देते हो? हां, ये तो सभी लोग करते हैं। पर तुम चाहो गुठलियों के भी दाम वसूल सकते हो। कैसे? अभी बताता हूं।

इस बार जब डाल के पके हुए आम तुम्‍हारे घर में आएं, तो जो आम तुम्‍हें सबसे ज्‍यादा पसंद हो, उसकी गुठलियों को संभाल कर रख लो। और जब बारिश हो, उसे आसपास की खाली पड़ी जमीन, जैसे पार्क का कोई कोना, सड़क के किनारे की जमीन या अगर तुम्‍हारे घर का आंगन बड़ा सा हो, तो वहां पर गुठली को जमीन में दबा दो। और फिर देखो, उसमें से अंकुर निकल आएगा। तुम उस अंकुर की देखभाल करते रहना, फिर धीरे-धीरे वो पौधा बन जाएगा। हां, तुम्‍हारे नाम का पौधा। 

तो फिर इन छुट्टियों में अपने नाम का एक पौधा जरूर लगाना और अपने फ्रेंड्स को भी बताना। ताकि वो लोग भी मोटिवेट होकर अपना-अपना पौधा लगा सकें। इससे हमारी धरती पर हरियाली बढ़ेगी और ये बेहद सुंदर हो जाएगी।

अच्‍छा दोस्‍तो, अब चलता हूं। पर चलते-चलते आपके लिए दो क‍हानियों के लिंक छोड़ जा रहा हूं। इन्‍हें जरूर पढ़ना और कैसी लगी आपको, हमें भी बताना। विज्ञान कथा- बड़‍बडि़या, छोटी सी बात

बॉय-बॉय।


Friday, November 5, 2010

आई दिवाली

तो हर साल की तरह दीपावली या कहो दिवाली का त्योहार फिर से आया है. दीपावली का मतलब होता है ''रोशनी की कतारें''. हिन्दू लोगों में इसका बहुत महत्व है. सब इसे बहुत उत्साह और उमंग से हर साल मनाते हैं. इस बार भी फिर वही धूम-धाम होगी, नयी चीजें और कपड़े खरीदे जायेंगे, लक्ष्मी पूजन होगा, अनगिन दिये जलाये जायेंगे, तरह-तरह की मिठाइयाँ खरीदना, आपस में मिलना-जुलना और साथ में खाना-पीना होगा. तो क्यों न सब बच्चों को दिवाली पर कहानी भी फिर से सुनाई जाये..क्या कहते हैं आप लोग...सुनोगे ? क्या कहा.. हाँ? तो फिर तैयार हो जाओ.

तो आप सबको पहले से ही पता है कि दिवाली का मतलब होता है ''रोशनी का त्योहार''. प्राचीन हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से दिवाली के दिन से नये साल का आरंभ होता है और यह कार्तिक महीने में मनाई जाती है. अंग्रेजी महीने के हिसाब से ये अक्तूबर या नबम्बर में पड़ती है. ये मुख्यतया दो कारणों से मनाई जाती है: 1. माँ लक्ष्मी जी का पूजन 2. अच्छाई की बुराई पर जीत.

लोग इस अवसर पर कई तरह की कहानियाँ सुनते और सुनाते हैं कि किस तरह से देवी देवताओं ने राक्षसों और असुरों को हराया था..लेकिन जो सबसे प्रसिद्ध व प्रचलित कहानी है वो सुना रही हूँ कि त्रेता युग में राम जो रानी कौशल्या व राजा दशरथ के पुत्र थे उन्हें उनकी सौतेली माँ कैकेयी ने 14 के लिये जंगल में रहने भेज दिया था क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि राम को राजा बनाया जाये. एक दिन लंका के राजा रावन ने सीता माता का धोखे से अपहरण कर लिया. तब राम अपने मित्र हनुमान व तमाम वानर और भालुओं की सेना के साथ लंका पहुँचे और वहाँ रावन और उसकी सेना के साथ घमासान युद्ध किया जिसमें रावन राम के हाथों छोड़ा हुआ सुनहरा तीर लगने से मारा गया. और राम व सीता वापस अयोध्या लौट आये. लेकिन उस दिन घोर अँधेरी रात थी तो अयोध्या वासियों ने अपने घरों के बाहर तमाम दिये जला कर रखे ताकि राम, लक्ष्मण और सीता जी को घर का रास्ता ढंग से दिख सके. और सारी प्रजा ने उस दिन राम के वापस आने की खुशी में नाच-गाना किया और फुलझडियाँ जला कर अपनी खुशी प्रकट की.

आज को भी दिवाली मनाने की वही प्रथा चली आ रही है. सब लोग परिवार के संग मिलकर अपने घरों में दिवाली मनाते हैं. इस दिन स्कूल व आफिस बंद रहते हैं. और आप लोग तो जानते ही हैं कि आज के दिन कैसी बढ़िया-बढ़िया स्पेशल मिठाइयाँ हलवाई लोग बनाते हैं और उन्हें खरीदने के लिये दूकानों में ग्राहकों की बड़ी भीड़ लगी रहती है सारा दिन. सड़कों और दूकानों के बाहर खूब लाइट लगाकर रोशनी की जाती है, मंदिरों में भी भक्तों के द्वारा खूब प्रार्थना, पूजा और नाच-गाना होता है. लोग घरों को साफ-सुथरा करके सजाते हैं, अपने घरों के आगे अपने हाथों से रंगोली बनाते हैं..जो चावल और आटे से बनाई जाती है..बीच में उसके कमल का फूल भी बनाते हैं जो लक्ष्मी जी का चिन्ह है, ताकि माँ लक्ष्मी जो समृद्धि व धन की देवी हैं, घर में प्रवेश कर सकें. मंदिरों में इनकी मूर्ति के चार हाथों में से दो में कमल के फूल होते हैं जो पावनता का प्रतीक हैं. तीसरे हाथ से वरदान देती हैं और चौथे हाथ में से सिक्के गिरते हुये दिखायी देते हैं...जो धन का प्रतीक हैं. शाम के समय सब लोग तैयार होते हैं और अपने-अपने घरों में परिवारीजन मिलकर गणेश और लक्ष्मी की पूजा करते हैं. दिये जलाते हैं और घर बाहर व छतों को उनसे सजाते हैं. फिर मिठाइयाँ व अन्य पकवान आदि खाते हैं. आपस में अपनी हैसियत के हिसाब से लोग कपड़ों, गहनों, पैसों व मिठाइयों आदि का उपहार के रूप में आदान-प्रदान करते हैं.

व्यापारियों के लिये आज से नये आर्थिक वर्ष का आरंभ होता है, तमाम लोग ज्योतिषियों से अपने भविष्य के बारे में पूछते हैं. और इस दिन सब लोग लड़ाई-झगड़ों को भूल-भाल कर आपस में एकता कायम करने की कोशिश करते हैं. तो ये रही दिवाली पर कहानी. कैसी लगी इसे बताना ना भूलना. और अब आप सब लोग भी दिवाली की तैयारी में जुट जाइये या शायद पहले से ही जुटे होंगे. और खूब हँसी-खुशी व धमाके से मनाइये.. अरे हाँ, धमाके से याद आया कि अगर आप लोग फुलझड़ी आदि जलाकर धमाका करना चाहते हैं तो बड़ों की देख-रेख में करियेगा व बहुत सावधानी बरतियेगा.

तो अब चलती हूँ. आप सभी को मेरा प्यार व ढेरों शुभकामनायें... ये पर्व सभी को मंगलमय हो.

-शन्नो अग्रवाल


Wednesday, September 15, 2010

दस एकम दस


"दस एकम दस"

दस एकम दस,

दस दूनी बीस,

खुद को समझना मत बच्चो,

किसी से भी उन्नीस ।


दस तीए तीस,

दस चौके चालीस,

कभी न करना बेइमानी तुम,

रहना हरदम खालिस ।


दस पंजे पचास,

दस छेके साठ,

पढते रहना हरदम बच्चो,

सदाचार के पाठ ।


दस सत्ते सत्तर,

दस अट्ठे अस्सी,

जीवन भर तुम खींच के रखना,

चंचल मन की रस्सी ।


दस नामे नब्बे,

दस दाये सौ,

मेहनत से है मिलता जो भी,

कभी न देना खो ।


अनिल चड्ढा



Monday, September 13, 2010

चिड़ियों का अलार्म

सुबह-सुबह ही मेरी बगिया
चिड़ियों से भर जाती है
उनके चीं-चीं के अलार्म से
नींद मेरी खुल जाती है।

वे कहतीं हैं उठो उठो
अब हुआ सबेरा जागो
उठ कर अपना काम करो
झटपट आलस को त्‍यागो।

मूल्यवान जो समय गंवा कर
बहुत देर तक सोते
प्‍यारे बच्चों जीवन में वह
अपना सब कुछ खोते।

शरद तैलंग

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बच्‍चो, साथ ही जाकिर अली रजनीश की कविता आओ बांध दू राखी भी पढें, ये कविता भी आपको पसंद आएगी।