सुनिए बाल-कविताएँ
मम्मी-पापा
चिड़िया रानी
चाँद पे होता घर जो मेरा
परियों की शहज़ादी
बाल-कविताओं में आवाज़
गिलहरी का घर
सूरज
गुड़िया रानी बड़ी सयानी
तितली परी
रोहिणी, दिल्ली में बच्चों ने मनाया गणतंत्र दिवस समारोहक्यों मनाया जाता है विश्व नम भूमि दिवसबंदर और मगरमच्छ कहानी। हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाओ

Friday, July 10, 2009

आम

सभी फलों का बाप
आम खाओ आप .

कैसे कैसे नाम
सबको कहते आम .

आपुस, मलीहाबाद
लंगड़ा जिंदाबाद .

केशर, दसहरी खास
सबको आते रास .

मिठास से भरपूर
गूदे रस से चूर .

आम भले हो एक
गुण इसके अनेक .

अमिया बने अचार
पियो बना के सार .

दाल में कच्चा डाल
अमचूर पूरा साल .

गर्मी से बेहाल
’पना’ करे निहाल .

फलों का राज आम
खाओ, न देखो दाम .

कवि कुलवंत सिंह


Thursday, July 9, 2009

चाणक्य और उसकी माता

चाणक्य और उसकी माता
( वज्र सा कठोर ,फूल सा कोमल )
चाणक्य अपने समय का लौहपुरुष था राज द्रोहियों का दमन करने में उसे दया नहीं आती थी शासन में वह वज्र की तरह कठोर और हृदयहीन होकर भी अपने व्यक्तिगत जीवन में फूल की तरह कोमल ,सरस ,एवं सुहृदय था | चाणक्य दिमाग का ही नहीं दिल का भी बड़ा था इस सम्बन्ध में उसके जीवन की एक घटना उल्लेखनीय है ,चाणक्य जब बड़ा हुआ तो एक दिन उसकी माँ उसका मुहँ देखकर रोने लगी बेटे ने इसका कारण पूछा तो वह बोली -बेटा ,तुम्हारे भाग्य में राज्य छत्र धारण करना लिखा है ; तुम थोडा ही प्रयत्न करके किसी बड़े राज्य के स्वामी बन जाओगे -इसी को सोचकर रो रही हूँ ! चाणक्य ने हंसते हुए कहा -माँ इसमें रोने वाली क्या बात है ,तम्हारे लिए वह बड़े हर्ष की बात होनी चाहिए सच -सच बताओ ,तुम क्यों रोती हो !माँ ने कहा -बेटा ,मै अपने दुर्भाग्य पर रो रही हूँ अधिकार पाकर लोग अपने सगे सम्बन्धियों तक की उपेक्षा करने लगते हैं ,तुम भी राजा होते ही भूल जाओगे ,"राजा जोगी काके मीत "उस समय तुम मेरे प्रेम को ठुकरा दोगे ,मुझे पूछोगे भी नहीं ,मेरा लाल मेरे हाथों से निकल जाएगा यही सोचकर रोती हूँ , चाणक्य ने फिर पूछा -माँ ,तुमने कैसे जाना कि मेरे भाग्य में राजा होना लिखा है ? माता ने कहा -बेटा तुम्हारे सामने के दोनों दांतों से पता चलता है कि तुम राज वैभव का भोग करोगे सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे दांतों वाला मनुष्य राजा होता है चाणक्य ने उसी समय एक पत्थर से अपने दोनों दांतों को तोड़ डाला और उन्हें फेंककर कहा -माँ ,अब तुम निश्चिंत हो जाओ ;अब मै राजा नहीं बन सकता ; इसलिए सदा तम्हारे पास ही रहूंगा बेटे का यह अद्भत कर्म देखकर माँ चकित हो गयी वह आँचल से रक्त पोंछते हुए बोली -चाणक्य यह तूने क्या किया ?चाणक्य ने सहज भाव से कहा -माँ ,तुम्हारी ममता के आगे मै संसार की बड़ी से बड़ी वस्तु को भी तुच्छ मानता हूँ मेरी दृष्टि में वह इन दांतों से और राज्य से कहीं अधिक मूल्यवान है माता ने प्रेम से गदगद होकर पुत्र को गले लगा लिया उस दिन से चाणक्य खंडदंत नाम से प्रसिद्ध हो गया
संकलन
नीलम मिश्रा


Tuesday, July 7, 2009

पारुल

रुन-झुन करती आयी पारुल।
सब बच्चों को भायी पारुल।
बादल गरजे, तनिक न सहमी।
बरखा लख मुस्कायी पारुल।
चम-चम बिजली दूर गिरी तो,
उछल-कूद हर्षायी पारुल।
गिरी-उठी, पानी में भीगी।
सखियों सहित नहायी पारुल।
मैया ने जब डाँट दिया तो-
मचल-रूठ-गुस्सायी पारुल।
छप-छप खेले, ता-ता थैया।
मेंढक के संग धायी पारुल।
'सलिल' धार से भर-भर अंजुरी।
भिगा-भीग मस्तायी पारुल।

-संजीव 'सलिल'


Monday, July 6, 2009

मेरे नाना, मेरे नाना, अच्छी सी तुम टॉफी लाना

मेरे नाना, मेरे नाना,
जब मैं तुम से कहता हूँ कि,
अच्छी सी तुम टाफी लाना,
कहते हो क्यों ना, ना, ना, ना !

रोज सुबह जब उठता हूँ तो,
दाँत माँजने को हो बुलाते,
प्यार से फिर तुम गोद में ले कर,
मुझको हो तुम दूध पिलाते,
ना-नुकर जब करता हूँ,
लाली-पाप हो मुझे दिखाते,
वैसे ग़र मैं माँगू टाफी,
करते हो तुम ना, ना, ना, ना ,
ऐसा क्यों करते हो नाना !

सुनो ऐ मेरे प्यारे बच्चे,
तुम हो अभी अक्ल के कच्चे,
ढेर-ढेर सी टाफी खा कर,
दाँत तुम्हारे होंगें कच्चे,
ग़र टाफी ज्यादा खाओगे,
मोती-से दाँत सड़ाओगे,
चबा-चबा कर फिर ये बोलो,
खाना कैसे खाओगे?
तभी तो कहता मैं हूँ तुमको,
कम से कम टाफी तुम खाना,
नुक्सान नहीं दाँतों को पहुँचाना,
नाना की तुम बात को मानो,
टाफी तुम ज्यादा न खाना,
टाफी तुम्हे तभी मिलेगी,
बोलो जब तुम हाँ, हाँ, नाना।

डॉ॰ अनिल चड्डा


Sunday, July 5, 2009

मक्खी और मच्छर का बसेरा

मक्खी बोली मच्छर भाई
खास खबर इक मै लाई
सुनकर तुम होगे हैरान
बचगी अब न अपनी जान
जगह-जगह पर हुई सफ़ाई
नही रहा कहीं गंदा
अब न फ़ले-फ़ूलेगा भाई
तेरा मेरा धन्धा
पानी को सब ढक कर रखते
पानी को भी बंद
घर के बाहर भी न दिखता
नाली में भी गंद
गंदा पानी कहीं न ठहरे
लग गए हैं गंदगी पर पहरे
बोलो अब कहां जाएंगे
कहां रहेंगे क्या खाएंगे
कैसे फ़ैलेगी बीमारी
न फ़ैलेगी कोई महामारी
खत्म हो गया अब तो भैया
तेरा मेरा खेल
अब कैसे हो पाएगा अपना
बीमारी से मेल
लगता मौत निकट आई है
नहीं तेरा मेरा जीवन
बोलो भाई अब क्या करेंगे
क्या कहता है तेरा मन
मक्खी की आंखें भर आईं
देने लगी दुहाई
मच्छर के सर पर भी सुनकर
नई मुसीबत आई
बोला मच्छर मक्खी बहना
सच है तेरा कहना
जाने क्यों इन सबने सीखा
साफ़-सफ़ाई में रहना
गंदगी का कर दिया सफ़ाया
कचरा घर से हटाया
हम तुम दोनों बाहर निकाले
बीमारी को भगाया
चलो कहीं अब दूर देश में
जाकर डालें डेरा
साफ़-सफ़ाई पर तो अपना
जोगी वाला फ़ेरा
चलो कहीं अब जाकर ढूंढें
फ़िर से गंदा माल
वहां पहुंच्कर फ़िर से हम-तुम
करेंगे खूब धमाल
यहां तो अब न गलने वाली
तेरी मेरी दाल
गंदगी नहीं तो नहीं चलेगी
कोई भी अपनी चाल
उड गए दोनों मक्खी मच्छर
लिए बीमारी साथ
बच्चो तुम भी हर दम रखना
सुथरे अपने हाथ
धोकर हाथ ही खाना खाना
गंदगी न फ़ैलाना
गंदा करके आस-पास
बीमारी को न बुलाना
साफ़ सफ़ाई रखोगे तो
नहीं होगे बीमार
खुश बच्चों से ही रहता है
सारा सुखी परिवार