Saturday, December 5, 2009

“जगहों के नाम पहचानें”

प्यारे बच्चो,
निम्नलिखित वाक्यों में अलग-अलग जगहों के नाम छुपे हुए हैं ।
कोशिश करके इनमें से उन नामों को ढ़ूँढ निकालो ।
1 मेरी आभा, रतजगा कर रही है ।
2 रमेश जा, पान लेकर आ ।
3 मेरा पुत्र अमृत, सरदार हो गया है ।
4 शीश के भाई ने रो-रो (कर) ममता को परेशान कर दिया ।
5 पर्वत की चढ़ाई, राक से भरी है ।
6 नन्ही मुन्नी बेला, रूस कर बैठी है ।
7 मेरे पुत्र प्रिय, मन लगा कर देश की सेवा कीजिए ।
8 पौधे की अवस्था जर-जर, मनी प्लांट सी हो गई है ।
9 सुशीला का पुत्र राज, स्थानांतरित हो लखनऊ आ गया है ।
10मैं भी काश, मीरपुर जा सकती ।
सौजन्य : डा0 शारदा वर्मा


Thursday, December 3, 2009

पहला झूठ

पहला झूठ

खेलते खेलते बच्चे ने मेरी जेब से पेन निकाला .वह पेन की निब फर्श पर मारने को हुआ ,तो मैंने पेन छीन लिया .वह रोने लगा .उसे चुप करने के लिए पेन देना पड़ा .वह फिरनिब को फर्श पर मारनेलगा ।

पेन कीमती था .मै नही चाहता था ,कि बच्चा उसे बेकार कर दे ।

मैंने बच्चे का ध्यान फिराया .पेन उससे छीन कर छिपा लिया .पर की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा ,"पेन ....चिड़िया ।" पेन चिड़िया ले गई .इस बार वह रोया नही .आसमान की ओर नजर उठा कर देखने लगा ।
एक दिन वह बर्फी खा रहा था .मैंने कहा "बिट्टू ,बर्फी मुझे दे दो ।"
उसने बर्फी पीठ के पीछे छिपाई और बोला ,"बफ्फी .......चिया ......."





Friday, November 27, 2009

महान नायिकाएँ-1: कल्पना चावला

प्यारे बच्चों ,
आज से हम कुछ महान नायिकाएँ नाम से एक श्रंखला शुरू करने जा रहे हैं ,इसमे हम आपको देंगे छोटी परन्तु रोचक जानकारी ,अगर आप के पास कोई जानकारी है ,या आप किसी नायिका के मिलवाना चाहते हैं तो हमे लिख भेजें baaludyan@hindyugm.com पर ,


कल्पना चावला का जन्म हरियाणा के शहर करनाल में हुआ था .बचपन से ही उनकी रूचि उड़ान भरने में और पढने में थी .उन्होंने B.S.D.Aero.Eng. प्राप्त की .उसके बाद वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिएU.S.A चली गई .कल्पना ने अपना अनुसंधान नेशनल एरोनॉटइक्स एवं स्पेस एडमिनीस्ट्रेशन (N.A.S.A )में 1988 में किया .दिसंबर 1994 में उन्हें एस्ट्रोनॉट तथा तथा 19 नवम्बर ,1997 को मिशन के लिए चुना गया .दुर्भाग्य वश उनका यान दुर्घटना ग्रस्त हो गया जिसमे उनका निधन हो गया .यह एक मध्यम वर्गीय लड़की की विजयगाथा है .


Monday, November 23, 2009

कद्दू की कुछ बातें

आओ बच्चों, आज कुछ कद्दू के बारे में बात करें. इन दिनों सर्दी का मौसम आ रहा है और सब्जी के बाज़ार में कद्दुओं का आगमन भी शुरू हो रहा है. वैस तो कद्दू को सब लोग अधिक पसंद नहीं करते हैं. जैसे की बिचारे चुकंदर की दशा निरीह हो जाती है वैसे ही इसे भी खाने में कुछ लोग संकोच करते हुये नाक-भौं चढ़ाते रहते हैं .....खासतौर से बच्चे. तो आइये आज कुछ इसके बारे में बताऊँ और इसकी अच्छाइयों के बारे में भी तो शायद आप लोग इसके बारे में अपनी राय बदल दें.

कद्दू कई तरह के और कई रंग के होते हैं. छोटे-बड़े, लम्बे, हलके या भारी-भरकम भी. और यह कई रंगों में पाये जाते हैं. इनके रंग नारंगी और लाल ही नहीं बल्कि हरे, पीले और सफ़ेद भी होते हैं. इसकी तुलना घिया या तुरई के स्वाद से की जाती है. और अपने भारत में हर प्रांत में लोग इसे अलग नामों से जानते हैं.....उत्तर प्रदेश में गंगाफल या सीताफल नाम से भी जाना जाता है.

अफ्रीका में कद्दू काफी छोटे और कई प्रकार के होते हैं. सुना जाता है की सबसे पहले कद्दुओं को मध्य अमेरिका में उगाया गया था. अमेरिका में इसको बहुत पसंद करते हैं और तरह-तरह से बना कर खाते हैं. और वहां पर कद्दुओं की पैदावार बहुत होती है. वहां के कुछ क्षेत्रों में कद्दुओं का उत्पादन अत्यधिक होता है. अमेरिका में 90% कद्दू की पैदावार तो वहां पर इलिनोइस नाम की एक जगह है वहां होती है. हर साल वहां कद्दू के सम्मान में तमाम शहरों में बहुत बड़ा उत्सव मनाया जाता है और मेला लगता है. और तमाम तरह से इसका खाने में इस्तेमाल किया जाता है. इंग्लैंड, अमेरिका, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया व कुछ अन्य देशों में भी ' हल्लोवीन ' नाम का दिवस अक्टूबर महीने की आखिरी तारीख को मनाते हैं जिसमें कद्दू को तराश कर उसे कभी लालटेन का आकार देकर उसके अन्दर मोमबत्ती जलाते हैं तो कभी उसे किसी भूत-प्रेत की शकल में तराशते हैं. कद्दू से कई प्रकार के केक, पाई, पुडिंग, सूप, बिस्किट आदि बनाते हैं. फिर वह लोग रिश्तेदारों व मित्रों को निमंत्रित करते हैं खाने पर, या पार्टी देते हैं. जाने-पहचाने लोगों में केक व पुडिंग बना कर भेजते हैं. और हाँ, इंग्लैंड व अमेरिका में कद्दू को पम्पकिन कहते हैं.

शताब्दियों पहले ग्रीक के लोगों ने कद्दू को ' पेपोन ' नाम दिया जिसका ग्रीक भाषा में मतलब होता है ' बड़ा खरबूजा '. फिर फ्रेंच लोगों ने इसे ' पोम्पोन ' नाम दिया और इंग्लैंड में ' पम्पिओन ' कहा. किन्तु जब ' शेक्सपिअर ' ने अपने उपन्यास ' मेर्री वाइव्स ऑफ़ विंडसर ' में इसका पम्पकिन नाम से जिक्र किया तब से सभी अंग्रेज व अमेरिकन इसे पम्पकिन कहने लगे. और बच्चों आप लोगों ने यदि ' सिन्देरेला ' नाम की कहानी सुनी या पढ़ी है तो याद करिये की उसमें एक बड़े कद्दू की शकल की बग्घी में ही सिन्देरेला बैठ कर डांस-पार्टी में गयी थी. है ना?

अब कद्दू के बारे में कुछ विशेष बातें हैं जानकारी के लिये. जैसे कि:
१. इससे कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बन सकते हैं.
२. इसके बीजों में प्रोटीन और आयरन पाया जाता है और बीजों को भून व छील कर खाते हैं. और खाना बनाते समय भी बीजों का कई तरह से उपयोग किया जा सकता है.
३. इसके अन्दर के गूदे में विटामिन ए व पोटैसियम होता है.
४. इसके फूलों को भी खाया जा सकता है.
५. कद्दू को फलों की श्रेणी में रखा जाता है.
६. इसमें 90 % पानी होता है.

अपने भारत में कुछ लोग तो इसे बहुत प्रेम से खाते हैं. और इन दिनों तो इसका मौसम है तो इसका भरपूर उपयोग किया जाना चाहिये.
उत्तर भारत में तो इसे कुछ खास पर्वों पर जरूर बनाया जाता है. जैसे की होली-दीवाली पर या फिर व्रत-उपवास के समय भी.....सब्जी, हलवा या खीर के रूप में.

तो अब चलती हूँ. जल्दी ही इसके बारे में और भी मजेदार बातें करेंगें.

--शन्नो अग्रवाल


Thursday, November 19, 2009

आम और केले की लड़ाई



एक बार की बात है बच्चो,
आम और केले में थी ठन गई,
केला बोले मैं हूँ मीठा,
आम कहे मैं तुझसे मीठा।

यूँ ही दोनों में तब बच्चो,
बढ़ते-बढ़ते बहस थी बढ़ गई,
कौन है दोनों में से मीठा,
बात यहाँ पर आ कर अड़ गई।

केला बोला चल हट झूठा,
कभी-कभी तू होता खट्टा,
मेरे स्वाद पे लेकिन देखो,
लगता नहीं कभी है बट्टा।

आमजी ने पर घुड़की लगाई,
बोला मैं हूँ फलों का राजा,
जब मेरा मौसम है आता,
सब कहते हैं आम को खाजा।

स्वाद बेशक हो मेरा खट्टा,
फिर भी मिलता अलग जायका,
स्वाद तेरा हो हरदम इक सा,
कभी-कभी तो हो तू फीका।

आम सिर्फ गर्मी में आये,
केला हर मौसम में खायें,
तू तो बस है स्वाद का राजा,
मुझसे लोग फायदे भी पायें।

हुआ नहीं जब कोई फैसला,
बंदरजी इक कूदे आये,
बोले मैं हूँ बड़ा अक्लमंद,
कई फैसले मैंने कराये।

दोनों को तब याद थी आई,
बिल्लियों की मशहूर लड़ाई,
बंदर के जज बनने से पहले,
थोड़ी सी थी अक्ल लगाई।

आखिर हम दोनों ही फल हैं,
बेशक अलग-अलग है जाति,
दूजे के हाथों गर खेलें,
निश्चित हार नजर है आती।

ऐसे ही है देश हमारा,
अलग है भाषा, अलग धर्म है,
मिलजुल के सब रहना बच्चो,
देश के प्रति यही कर्म है।

--डॉ॰ अनिल चड्डा