Tuesday, September 30, 2008

प्रतिध्वनि

एक लड़का था| प्रतिध्वनि के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानता था | एक बार जंगल में जब वह चिल्लाया, तो उसे लगा कि पास ही कोई दूसरा लड़का भी चिल्ला रहा है | उसने उससे कहा "इधर तो आओ"|
उधर से भी आवाज आई, "इधर तो आओ "| लड़के ने कहा, "कौन हो तुम?" आवाज ने भी कहा, कौन हो तुम?"|
लड़के ने उसे डाटा, "तुम बहुत ख़राब लड़के हो"
लड़का घबराया और जंगल से घर लौट आया | उसने अपनी माँ को सारी घटना बताई, "माँ! जंगल में एक ख़राब लड़का रहता है | वह हू-ब-हू मेरी नक़ल करता है | जो मैं कहता हूँ वह भी वही कहता है | मैं जैसे चिल्ल्लाता हूँ, वह भी वैसे ही चिल्लाता है "
उसकी माँ समझ गई कि मामला क्या है? उसने बेटे से कहा, "बेटा उस लड़के से विनम्रता-पूर्वक बोलो यदि तुम नम्रता-पूर्वक बोलोगे, तो वह भी तुमसे नम्रता-पूर्वक बोलेगा "
लड़का फिर उसी जंगल में गया | वहाँ उसने जोर से कहा, "तुम बहुत अच्छे हो"| उधर से आवाज आई, "तुम बहुत अच्छे हो"| लड़के ने और जोर से कहा, मैं तुमसे प्यार करता हूँ"| उधर से भी आवाज आई, "मै तुमसे प्यार करता हूँ"| मनुष्य का जीवन भी एक प्रतिध्वनि कि तरह है | यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे प्रेम करें, तो तुम भी दूसरों से प्रेम करो | तुम जिससे भी मिलो, मुस्कुराते हुए मिलो | तुमको मुस्कुराता हुआ देखकर,वह भी मुस्कुराएगा और फिर मुस्कराहट ही मुस्कराहट नज़र आएगी |

अनुवाद -नीलम मिश्रा
स्रोत -बाल बोध कथाएं (भारतीय योग संस्थान )


पतंग



ऊँचा गगन विशाल,
उसमें देखो पतंग हजार,
सबसे प्यारी मेरी पतंग
सबसे न्यारी मेरी पतंग
जिधर मैं चाहूँ, उधर वो जाए
मेरी आहट पाकर,वो मुड़ जाए
एक बात तुम भी रखो याद ,
पतंग से ले लो सीख ये आज |
अगर कभी झुक जाओ जग में ,
झट उठ जाओ पतंग के जैसे |
गिर के उठना, उठ के गिरना ,
जीवन की तो रीत यही है |
इससे मिलती उम्मीद नई है,
उमंग नई है ,
सबसे प्यारी मेरी पतंग ,
सबसे न्यारी मेरी पतंग

नीलम मिश्रा ((चित्र प्रस्तुत किया है हमारे नन्हे चित्रकार -गुरप्रीत सिंह ,जो pre-nursary, में पढ़ते हैं )


Monday, September 29, 2008

बूझो तो जाने

आज हम कुछ पहेलियाँ पूछेंगे, सही उत्तर अगले दिन बताएँगे तब तक दिमाग के घोड़े दौडाओ, सही उत्तर देने वाले सबसे पहले बच्चे को हम पुरस्कार भी देंगे, मगर १२ साल से अधिक उम्र के प्रतिभागियों के लिए कोई पुरस्कार तय नहीं किया गया है| अलबत्ता भाग तो कोई भी ले सकता है, आशा करते हैं कि आप सभी को हमारी पहेलियाँ पसंद आएँगी, पाठकों के सुझाव भी सदैव आमंत्रित हैं |
१) कही पहेली बीरबल,
अकबर को दियो सुनाय
पक्के रहत बहुत दिन,
बिन पक्के गल जाय

२) तारों के संग आता है,
तारों के संग जाता है,
बुद्धि जिसकी दुर्बल हो,
इसकी पदवी पाता है |

३) दुबली-पतली गुण से भरी,
सिर को चले झुकाय,
आवे जब वो हाथ में,
दो को एक मिलाय |

४) तीन अक्षर का मेरा शब्द,
बूझो तो हो सब स्तब्ध|

५) तीन अक्षर का मेरा नाम,
जल में रहता मेरा धाम,
मेरा आंसू झूठ कहाए ,
जल में बैर नहीं कर पाये

--नीलम मिश्रा


Saturday, September 27, 2008

भगत सिंह

प्यारे बच्चों आज हम तुम्हे बताएँगे आजादी के एक सेनानायक के बारे में, सबसे पहले उनसे जुड़े एक रोचक प्रसंग को,
एक बार की बात है कि एक बच्चा अपने दादाजी जी साथ खेतों में टहलने जा रहा था, रास्ते में दादाजी के एक मित्र मिल गए, वो उनसे बात करते हुए आगे निकल गए थोड़ी देर के बाद उन्हें अपने पोते की कोई आहट न मिलने पर पीछे मुड़कर देखा तो देखा कि वह बालक काफ़ी दूर झुक कर कुछ काम कर रहा है उन्होंने उससे पूछा कि क्या कर रहे हो? उसने जबाब दिया कि मैं बन्दूक की फसल बो रहा हूँ| उस बालमन में यह था कि हमारे पास अंग्रेजों जितनी बंदूकें नहीं हैं |
बड़े होकर यही बालक बना भगतसिंह, आज हम इनका ही परिचय देंगे आपको, ताकि आप भी बड़े होकर भगतसिंह की तरह एक बहादुर और जांबांज सिपाही बनो, और अपने देश की रक्षा के लिए तन, मन धन से तैयार रहो, इन सबसे पहले एक अच्छा इंसान बनो |
भगत सिंह का जन्म २७ सितम्बर १९०७ को पंजाब के लायलपुर जिले के बंग गाँव, जो अब पाकिस्तान में है, हुआ था| इनके पिता का नाम सरदार किशन जी, तथा माता का नाम विद्यावती था| इनका पूरा परिवार देशभक्ति, समाजसेवा और स्वतंत्र देश के जज्बे में डूबा हुआ था| आपके चाचा जी श्री अजित सिंह २२ केसों में, सजाय- ऐ -काला पानी से बचने के लिए टर्की, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, और ब्राजील जैसे देशों में भटकते रहे| १४ वर्ष की अवस्था में आपके कोमलमन को जालियांवाला बाग की घटना ने बड़ा ही आहत किया, वे उस जगह की मिटटी को इकठा करके घर लाये, और वो घटना सदैव ही उनके मानसपटल पर अंकित रहे, इसलिए उसे अपने पढ़ने वाली मेज पर रख दिया|
लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए थे.

भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी. इस संगठन का उद्देश्य 'सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले' नवयुवक तैयार करना था

११ वर्ष की उम्र में
इतनी छोटी उम्र में भी भगत सिंह ने एक परिपक्व राजनीतिक समझ को सामने रखते हुए एक ज़मीन तैयार की जिससे और क्रांतिकारी पैदा हो सकें. भगत सिंह के दौर में क़रीब 2000 किशोर क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज हुए थे.
भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून-खराबा ना हो तथा अंग्रेजो तक उनकी 'आवाज़' पहुंचे। हालांकि उनके दल के सब लोग ऐसा ही नहीं सोचते थे पर अंत में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनो ने एक निर्जन स्थान पर बम फेंक दिया। पूरा हॉल धुएँ से भर गया। वे चाहते तो भाग सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें फ़ाँसी कबूल है। अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। बम फटने के बाद उन्होंने इन्कलाब-जिंदाबाद का नारा लगाना चालू कर दिया ।

जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल गुजारे। इस दौरान वे कई क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे। उनका अध्ययन भी जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे ख़त आज भी उनके विचारों का दर्पण हैं। इस दौरान उन्होंने कई तरह से पूंजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों के उपर शोषण करने वाला एक भारतीय ही क्यों न हो वह उसका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ ।

उसका कुछ हिस्सा जो हमे बेहद पसंद है, और तुम लोगों को भी अच्छा लगे यहाँ पर लिखा है ,
ध्यान से पढ़ना

कॉलेज के दिनों में
मैं आपको यह बता दूँ कि अंग्रेज़ों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताक़त है और हम में उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं.

वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बंदूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं.

यह हमारी ही उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निंदनीय अपराध-एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचारपूर्ण शोषण-सफलतापूर्वक कर रहे हैं.

कहाँ है ईश्वर? वह क्या कर रहा है? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? वह नीरो है, चंगेज़ है, तो उसका नाश हो.
मेरी स्थिति आज यही है. यह मेरा अहंकार नहीं है.

मेरे दोस्तों, यह मेरे सोचने का ही तरीका है जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना-जिसे मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ-मेरे लिए सहायक सिद्घ होगी या मेरी स्थिति को और चौपट कर देगी.

मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.

देखना है कि मैं इस पर कितना खरा उतर पाता हूँ. मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा.

जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, 'देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.' मैंने कहा, 'नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.

स्वार्थ के लिए मैं प्रार्थना नहीं करूँगा.' पाठकों और दोस्तो, क्या यह अहंकार है? अगर है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ.

फ़ासी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा था -

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें ।


इससे उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता
गांधी ने इस बातचीत के दौरान इरविन से यह भी कहा था कि अगर इन युवकों की फाँसी माफ़ कर दी जाएगी तो इन्होंने मुझसे वादा किया है कि ये भविष्य में कभी हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएंगे. गांधी के इस कथन का भगत सिंह ने पूरी तरह से खंडन किया था.

असलियत तो यह है कि भगत सिंह हर हाल में फाँसी चढ़ना चाहते थे ताकि इससे प्रेरित होकर कई और क्रांतिकारी पैदा हों. वो कतई नहीं चाहते थे कि उनकी फाँसी रुकवाने का श्रेय गांधी को मिले क्योंकि उनका मानना था कि इससे क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान पहुँचता.

उन्होंने देश के लिए प्राण तो दिए पर किसी तथाकथित अंधे राष्ट्रवादी के रूप में नहीं बल्कि इसी भावना से कि उनके फाँसी पर चढ़ने से आज़ादी की लड़ाई को लाभ मिलता.
२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर इनको तथा इनके दो साथियों सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे । कहा जाता है कि जब जेल के अधिकारियों ने उन्हें सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा - 'रुको एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है' । फिर एक मिनट के बाद किताब छत की ओर उछालकर उन्होंने कहा - 'चलो' |

फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे -

दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी खुश्बू-ए-वतन आएगी ।


आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हम उनके इस अमूल्य योगदान को एक बार फिर से याद करे,और सोचे कि क्या कोई माँ, कोई देश फक्र क्योँ न करे ऐसे बलिदानी, क्रांतिकारी पर|
हम सलाम करते देश के इस सपूत को, और पूरा देश सलाम करता है इस राष्ट्र पुत्र को जो मात्र २३ साल कि उम्र में देश को, उसके नौजवानों को वो संदेश दे गया, जो भगतसिंह के बिना नामुमकिन था|

--नीलम मिश्रा


Friday, September 26, 2008

बच्चे

बच्चे अच्छे
बच्चे सच्चे
बच्चे मनके
प्यार सबसे करते ।

कपट न जानें
बैर न जानें
द्वेष न जानें
हठ भले ही करते ।

सत्य धर्म है
सत्य कर्म है
सत्य मर्म है
झूठ कभी न कहते ।

निर्मल मन है
पावन मन है
उज्ज्वल मन है
अहं कभी न रखते ।

दूर बुराई
सब चतुराई
सब हैं भाई
दोस्त सब को कहते ।

भोली सूरत
भोली सीरत
नटकट आदत
तंग सबको करते ।

कवि कुलवंत सिंह


पंडित नहीं कहते

एक अनपढ़ भीख मांगकर अपना पेट भरता था | उसे पंडित कहलवाने की बड़ी इच्छा थी | परन्तु मूर्ख और अनपढ़ को भला कौन पंडित कहता |
एक दिन उसने बीरबल का रास्ता रोककर पूछा कि ऐसा कोई उपाय बताएं कि लोग उसे पंडित कहने लगें |
"तुम थोडी दूर जाकर खड़े हो जाओ और कोई तुम्हें पंडित कहे, उसे मारने दौडो" | बीरबल ने उसे युक्ति समझाई |
यह सुनकर वह ब्राह्मण बहुत खुश हुआ और कुछ दूर जाकर खडा हो गया | उसके हटते ही बीरबल ने इधर-उधर खेल रहे लड़कों से कहा -"यह आदमी पंडित कहने से चिढ़ता है, इसको खूब चिढ़ाओ"

बस फिर क्या था, लड़के उसे चिढ़ाने के लिए 'पंडित -पंडित' कहने पुकारने लगे | ब्राह्मण उन्हें मारने को दौड़ा | लड़कों की देखा-देखी और लोग भी उसे चिढ़ाने लगे | लोग उसे पंडित कहते, वह उन्हें मारने दौड़ता | इसी प्रकार थोड़े ही दिनों में उसका 'पंडित' नाम सारे नगर में मशहूर हो गया | फिर, बीरबल की सलाह पर ही उसने चिढ़ना छोड़ दिया, मगर लोगों ने पंडित कहना न छोड़ा |
(यह कहानी कैसी लगी ,इस कहानी से आप क्या को क्या शिक्षा मिलती है ,लिखना न भूलें )


Thursday, September 25, 2008

बाल-स्वप्न...

आज सुबह जब गया बगीचे
नज़र पड़ी जैसे ही नीचे
देखा मैने कार खिलौना
छुपा हुआ एक पेड़ के पीछे

मैने खुद को तनिक संभाला
जोर खोपड़ी पर कुछ डाला
कहीं यार कोई बम ना हो ये
हो सकता है, कुछ कर लाला

मै जल्दी से गया लपककर
पुलिस की गाड़ी खड़ी जहाँ पर
बोला, अंकल साथ चलों जी
कुछ वस्तु सन्दिग्ध वहाँ पर

पुलिस तुरंत हरकत में आयी
साथ में चल दिये कई सिपाही
वायरलैस कर दिया कहीं पर
बम निरोधक टुकड़ी आई

सबको दूर दूर कर दिया
गहन निरीक्षण बम का किया
गया पास में एक सिपाही
बम को कर दिया निष्क्रिय भाई

दुर्घटना एक और घट जाती
कार खिलौना यदि फट जाती
बुद्धि से गर काम ना लेता
जमीं शवों से फिर पट जाती

बच्चों ये है रात का सपना
बुद्धि विवेक ना खोना अपना
सच में भी सम्भव है यह सब
रहना होगा बस चौकन्ना

अर्रे आगे भी तो सुनो...

सबने मुझको दी शाबाशी
भीड़ जमा थी अच्छी खासी
फूल गया मेरा गर्व से सीना
आखिर हम सब भारतवासी

भारत माता की जय..
25-09-08


Wednesday, September 24, 2008

सब से पहले




आज उठा मै सबसे पहले|
सबसे पहले आज सुनूँगा
हवा सवेरे की चलने पर,
हिल ,पत्तों का करना 'हर-हर'
देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले, लाल सुनहले|
आज उठा मै सबसे पहले|
सबसे पहले आज सुनूँगा,
चिडिया का डैने फड़का कर,
चहक -चहक कर उड़ना 'फर-फर'
देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले, लाल सुनहले|
आज उठा मै सबसे पहले|
सबसे पहले आज चुनूँगा,
पौधे -पौधे की डाली पर
फूल खिले जो सुंदर -सुंदर
देखूँगा ,पूरब में फैले बादल पीले ,लाल,सुनहले
आज उठा मैं सबसे पहले
सबसे कहता आज फिरूँगा
कैसे पहला पत्ता डोला,
कैसे पहला पंछी बोला,
कैसे कलियों ने मुँह खोला ,
कैसे पूरब ने फैलाए बादल पीले, लाल, सुनहले
आज उठा मैं सबसे पहले

स्रोत- नीलिमा बच्चन की चौथी वर्षगाँठ अथवा पाँचवे जन्मदिन पर उनके दादा जी, हरिवंशराय बच्चन जी के आशीष प्यार के साथ भेंट की गई पुस्तक "नीली चिड़िया" से


Monday, September 22, 2008

स्वयं अपना मूल्यांकन सम्भव नही

एक बार कला कौशल के देवता -बुद्ध-को एक अनोखा विचार आया वे यह जानने के लिए उत्सुक हो उठे कि कि धरती के वासी अन्य देवताओं की तुलना में उनका अंकन कैसे करते हैं अतः एक मनुष्य का वेश बनाकर वे धरती पर उतर आए घूमते -घुमाते वे एक मूर्तिकार के घर जा पहुँचे वह मूर्तिकार देवताओं की मूर्तियाँ बनाने के लिए विख्यात था बुद्ध देव ने विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ उसके घर में पड़ी देखीं उनमे उनकी अपनी मूर्ति भी थी
बुद्धदेव मूर्तिकार के पास जाकर बोले ,"देवताओं के गुरु ब्रहस्पति की मूर्ति का क्या मूल्य है ?"
"सौ रुपये " मूर्तिकार ने उत्तर दिया
"और देवी शचि की मूर्ति कितने की है ?"उन्होंने पूछा
"पचास रुपए की "मूर्तिकार ने कहा


बुद्ध देवता की मूर्ति की कीमत क्या है उन्होंने पूछा
"यदि आप ये दोनों मूर्तियाँ खरीद लें तो बुद्ध की मूर्ति आप को मुफ्त में दे दूँगा "मूर्तिकार ने उत्तर दिया बुद्धदेव अपना सा मुहँ लेकर लुप्त हो गए


Saturday, September 20, 2008

ज़ाकिर अली 'रजनीश' बाल-साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित


भाऊराव देवरस सेवा न्यास, लखनऊ द्वारा आयोजित चतुर्दश पं० प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा साहित्यकार सम्मान समारोह में सांसद मा0 कलराज मिश्र ने लखनऊ के प्रतिष्ठित रचनाकार श्री जाकिर अली "रजनीश" को सम्मानित किया। यह सम्मान उनके द्वारा बालसाहित्य विधा में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए प्रदान किया गया। सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक "रामनरेश त्रिपाठी सभागार" में आयोजित इस समारोह में श्री रजनीश को सम्मान स्वरूप पांच हजार रूपये नकद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं न्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का सेट भेंट किया गया। उल्लेखनीय है कि श्री रजनीश विगत दो दशक से बालसाहित्य की सेवा में रत हैं। उनकी अब तक चार दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा डेढ दर्जन से अधिक संस्थाएं उन्हें पुरस्कृत/सम्मानित कर चुके हैं। रजनीश विगत १ वर्ष से बाल-उद्यान पर भी लेखन कर रहे हैं।

डॉ॰ ज़ाकिर अली 'रजनीश' को हिन्द-युग्म परिवार की बधाइयाँ।


Friday, September 19, 2008

वरदान दो

माँ मुझे वरदान दो,
गीत सुर का ज्ञान दो ।
विश्व में सम्मान दो,
माँ मुझे वरदान दो ।

मधुर हो वाणी सदा,
कटु वचन न कहें कदा ।
राष्ट्र निज अभिमान दो,
माँ मुझे वरदान दो ।

सत्य पथ अरमान हो,
पाप से अनजान हों ।
पुण्य प्रेम संज्ञान दो,
माँ मुझे वरदान दो ।

ज्योति बन पथ पर जलें,
मार्ग परहित पर चलें ।
सृजन शक्ति महान दो,
माँ मुझे वरदान दो ।

माँ पिता पग स्वर्ग हो,
उनकी सेवा धर्म हो ।
साहस शौर्य मान दो
माँ मुझे वरदान दो ।

कवि कुलवंत सिंह


Thursday, September 18, 2008

हफ्ते के दिन

बच्चो सुनो ध्यान से बात
हफ्ते मे होते दिन सात

1. सोमवार

सोमवार आया पहला दिन
सारे ही हो जाते है खिन्न
सुबह सवेरे जल्दी जागे
और फिर अपने काम पे भागे

2.मंगलवार
दूजा दिन है मंगलवार
जाओ जब मन्दिर के द्वार
सारे पूजा मे रत रहते
तरह तरह के लड्डू बँटते

3.बुधवार
बुधवार मंगल के बाद
बच्चो इसको रखना याद
तीसरा हफ्ते का यह वार
बाकी बचे हैं अब दिन चार

4. गुरुवार
गुरुवार चौथा दिन आया
तो सबने मन को समझाया
करना एक और दिन काम
फिर छुट्टी मे करो आराम

5. शुक्रवार
पाँचवा दिन है शुक्रवार
काम से सारे गए थक हार
किसी तरह से दिन बिताए
आगे दो दिन छुट्टी आए

6. शनिवार
शनिवार की छुट्टी आई
सबने मिलकर खुशी मनाई
देर से उठना, देर से खाना
और शाम को घूमने जाना

7. रविवार
आया सातवाँ दिन रविवार
छुट्टी मे सारा परिवार
तरह तरह का खाना खाए
छुट्टी मनाएँ और सो जाएँ


बाल-सवाल....



माँ, ये जो गहरा धुँआ है !
एक दम से कहाँ से हुआ है
ना आज कोई दीवाली है
ना शादी होने वाली है
ना आसमान में बादल है
ना क्रिसमस की कोई हलचल है
होली भी नहीं तो लाल हैं क्यूँ
सहमे सहमे बदहाल है क्यूँ
माँ एक दम घुप्प अँधेरा क्यूँ
यहाँ लगा भीड़ का घेरा क्यूँ
क्यूँ मची है चीख पुकार यहाँ
हो रही क्यूँ हाहाकार यहाँ ?

- बोलो न माँ क्या है ये सब
और माँ - स्तब्ध !!
कुछ रोज बाद.........

माँ वो जो मेरी सहेली है
उस दिन से संग नही खेली है
ना अब वो घर पर आती है
ना स्कूल पढ़ने जाती है
क्या उस दिन उसका ब्याह रचा
जिस दिन था वो कोहराम मचा
जब उसकी हुई विदाई थी
मुझे उसकी चीख सुनाई दी
एक गुडिया उसकी मुझपर है
वो भी उस जैसी सुन्दर है
जब भी वो वापस आयेगी
अपनी गुड़िया ले जायेगी

- बोलो ना माँ इसीलिये रोये थे न सब
और माँ - स्तब्ध !!


Monday, September 15, 2008

मॉडर्न स्कूल, फरीदाबाद ने मनाया हिन्दी-सप्ताह



हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में मॉडर्न स्कूल फरीदाबाद सैक्टर १७ में हिन्दी सप्ताह मनाया गया। मॉडर्न स्कूल सैक्टर १७ फरीदाबाद ने हिन्दी भाषा को सम्मान देने के लिए ८ सितम्बर से १२ सितम्बर २००८ को हिन्दी सप्ताह के रूप में मनाया। कार्यक्रम का शुभारम्भ ८ सितम्बर को शहर के लोकप्रिय कवि विकेश बेनीवाल जी ने किया। इस अवसर पर विद्यालय में भाषण प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। यह प्रतियोगिता २ वर्गों में हुई। कनिष्ठ वर्ग में कक्षा सात के रजत प्रथम रहे तथा कक्षा ६ की महिमा द्वितीय रही। वरिष्ठ वर्ग में कक्षा नवम की तृषा शरण प्रथम रही तथा उसी कक्षा के रजत द्वितीय रहे। तृतीय स्थान कक्षा ग्यारह के नवनीत को मिला। ९ सितम्बर को कक्षा ४ और ५ के लिए कविता प्रतियोगिता हुई। इसमें उमंग प्रथम और कीर्ति द्वितीय रही। १० सितम्बर को अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता हुई । इसमें शान्ति सदन प्रथम तथा अहिंसा सदन द्वितीय रहा। ११ सितम्बर को अन्तर्विद्यालय प्रतियोगिताएँ हुई।
१ हिन्दी हास्य कविता पाठ प्रतियोगिता
२ हिन्दी श्रुतलेख
३ हिन्दी निबन्ध प्रतियोगिता
इस दिन हिन्द-युग्म से शिवानी सिंह जी मुख्य अतिथि रहीं। तथा शहर के राजकीय माध्यमिक कन्या विद्यालय की हिन्दी अध्यापिका तथा कवयित्री श्रीमती कुमकुम भडाना जी ने निर्णायक का भार संभाला। इन प्रतियोगिताओं में फरीदाबाद शहर के १२ स्कूलों ने भाग लिया।
हास्य कविता प्रतियोगिता में मॉडर्न स्कूल के रवि कपूर ने शैल चतुर्वेदी की चल गई कविता सुना कर श्रोताओं को लोटपोट कर दिया। मॉडर्न स्कूल की ही तृषा शरण ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया ।
श्रुतलेख में मॉडर्न विद्यानिकेतन के बच्चों का प्रदर्शन प्रशंसनीय रहा। मॉडर्न स्कूल नाएडा तथा के एल मेहता का प्रदर्शन अच्छा रहा ।
मंच संचालन का भार शोभा महेन्द्रू के नेतृत्व में कक्षा दस की मेघा तथा श्वेता ने संभाला। १२ सितम्बर को वरिष्ठ वर्ग की भाषण प्रतियोगिता तथा प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता हुई। इस अवसर पर हिन्द युग्म के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रेमचन्द सहजवाला मुख्य अतिथि रहे। शहर के जाने माने कवि व्यथित जी, अध्यापिका कुसुम, हिन्द युग्म के निखिल आनन्द गिरि तथा पत्रकार श्री अनिल बेताब जी निर्णायक रहे।
भाषण प्रतियोगिता में हरमन माइनर की आरूषी तथा मॉडर्न स्कूल नाएडा की आकाँक्षा प्रथम रही तथा मॉडर्न स्कूल फरीदाबाद की भवानी द्वितीय व रजत तृतीय रहे।
इस समस्त कार्यक्रम की मूल प्रेरणा विद्यालय के निदेशक श्री एस डी जैन हैं। विद्यालय की प्रधानाचार्या श्रीमती नीलिमा जैन जी ने सहर्ष कार्यक्रम आयोजन कराया तथा सबका उत्साह बढाया। हिन्द-युग्म की ओर से विजित
बच्चों को डॉ॰ अहिल्या मिश्र का कथा-संग्रह 'फाँस की काई' दिया गया। हिन्द-युग्म मॉडर्न स्कूल फरीदाबाद
सैक्टर १७ की प्रधानाचार्या जी का हृदय से आभार व्यक्त करता है।

कार्यक्रम-आयोजकः शोभा महेन्द्रू, मॉडर्न स्कूल फरीदाबाद


शोभा महेन्द्रू (दायें से दूसरे स्थान पर)


शिवानी सिंह


प्रेमचंद सहजवाला
















Sunday, September 14, 2008

ज़ाकिर अली रजनीश को पं॰ प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा साहित्यकार पुरस्कार


आप सभी को सूचित करते हुए हमे बेहद प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है कि भाउराव देवरस सेवा न्यास, लखनऊ द्वारा दिये जाने वाले पं0 प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा साहित्यकार सम्मानों की घोषणा हो गयी है, और इस वर्ष का बाल साहित्य सम्मान डॉ॰ ज़ाकिर अली 'रजनीश' को प्रदान किया जा रहा है। यह सम्मान सुल्तानपुर, उ0प्र0 के पं0 राम नरेश त्रिपाठी सभागार में दिनांक 19-09-2008 को प्रदान किया जाएगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मा0 कलराज मिश्र, सांसद तथा अध्यक्ष पं0 राम किशोर त्रिपाठी होंगे।

अन्य सम्मानित साहित्यकार हैं-
श्री अशोक कुमार पाण्डेय-काव्य विधा
डा0 सुनील कुमार विक्रम सिंह-कथा साहित्य
श्री वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज-नाटक विधा
श्री हिमांशु द्विवेदी-पत्रकारिता
डा0 चंद्रभूषण झा-संस्कृत साहित्य
श्री टी0बी0 चंद्रा सुब्ब्बा-नेपाल साहित्य

डॉ॰ ज़ाकिर अली 'रजनीश' को हिन्द-युग्म परिवार की बधाइयाँ।


Friday, September 12, 2008

ओणम की काव्यात्मक कहानी

नमस्कार बच्चो,
कैसे हैं आप सब लोग? आज मैं फिर से आई हूँ, आप सबके सम्मुख एक नई कहानी लेकर।
इस बार मैं आपको ले चलती हूँ केरल। इन दिनों करेल में बहुत चहल-पहल है। सभी लोग खुश हैं। जानते हैं क्यों? क्योंकि वहाँ पर इन दिनों ओणम का त्योहार मनाया जा रहा है। यह त्योहार पूरे १० दिन चलता है। लोग फूलों से सजावट करते हैं और तरह-तरह के पकवान बनाते हैं, जैसे- पायसम, सांभर, पचरी, तोरन आदि। इन सारे व्यंजनों को केरल में सदया बोलते हैं। चलो मैम आपको वो कहानी सुनाती हूँ, जिसके लिए यह त्योहार बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है।

ओणम

आओ बच्चो
मिलकर हम मनाएँ
ओणम का उत्सव
इक राजा की
है कहानी
था बड़ा ही
वो महादानी
जाति से
तो था वह दानव
पर अपनी
वाणी में पावन
महाबलि था
उसका नाम
करता था
वह अच्छे काम
इक बार सौ
यज्ञ करवाए
ताकि वह
स्वर्ग को पाए
हो गए जब यज्ञ
निन्यावन
खुश था
इससे सबका ही मन
पर देवों के
उड़ गये होश
महाबलि में
आएगा जोश
करेगा पूरे
जब सौ यज्ञ
पाएगा वह
स्वर्ग पे विजय
श्री विष्णु
से करे पुकार
धारो अब
ऐसा अवतार
ताकि यज्ञ न
हो पूरा
रहे बलि का
सपना अधूरा
श्री विष्णु ने
सुनी पुकार
धार लिया
वामन अवतार
चले गये वो
बलि के पास
बनाया अपना
मुख उदास
देख के सुन्दर
वामन रूप
दंग रह गया था
बलि भूप
बोला
मुझसे माँगों तुम
जो मांगोगे
देंगे हम
वामन ने
ले लिया वचन
ताकि न बदले
बलि का मन
दे दो धरती
तीन कदम
इससे खुश
हो जायेंगे हम
कहा बलि ने
अपने कदम
जहाँ से चाहो
नापो तुम
बनाया प्रभु ने
रूप विशाल
नाप लिए
नभ और पाताल
कहाँ पे रखूँ
तीसरा कदम
दो जगह
जो हो तुममें दम
लेट गया बलि
धरती पर
रखो कदम
मेरे सर पर
श्री वामन ने
रख दिया कदम
निकला
महाबलि का दम
दे दी उसने
अपनी जान
पर नहीं तोड़ा
वचन का मान
लोगों का था
प्रिय राजा
दुखी थी इससे
सारी प्रजा
करते हैं उसे
हर वर्ष स्मरण
तभी
मनाते हैं ओणम

--सीमा सचदेव



आप सभी को ओणम की बधाइयाँ


वृक्ष

पल पल बढ़ा प्रदूषण जाता,
प्राण वायु में घुलता जाता,
वृक्षों को है काटा जाता,
जंगल को सिमटाया जाता ।

जीवन यापन जिससे पाते,
नष्ट उसी को हम कर जाते,
नियम प्रकृति के हमें न भाते,
उपकार इनका भूल जाते ।

विष पीकर यह हमें बचाते,
दे अमृत सदा प्राण बचाते,
परहित धर्म प्रतिपल निभाते,
फल, फूल, छांव सब हैं पाते ।

धरती का श्रृंगार तुम्ही हो,
जीवन का आधार तुम्ही हो,
विहगों का संसार तुम्ही हो,
बच्चों का आकाश तुम्ही हो ।

प्राणी को वरदान तुम्ही हो,
राही को आराम तुम्ही हो,
औषधि का आयाम तुम्ही हो,
दानियों में महान तुम्ही हो ।

आओ मिल सब पेड़ उगाएँ,
इस धरती पर स्वर्ग बसाएँ,
हरा भरा हम देश बनाएँ,
जग में फिर खुशियां बिखराएँ ।

कवि कुलवंत सिंह


गणेश उत्सव पर बच्चों के लिए दो कविताएँ

1.प्रार्थना

जय गणपति बाबा गजानन्द
तुझसे ही जीवन में आनन्द
प्रणाम तुम्हें हे मोदक प्रिय
तेरे नाम से मिल जाती है विजय
सर्व-प्रथम तेरा पूजन
हम करते तेरा अभिनन्दन
चरणों में फूल चढाएँ हम
कर जोरि के शीश झुकाएँ हम
शक्ति दो हम न घबराएँ
हर घर में खुशहाली आए
अगले वर्ष जल्दी आना
हर मन में खुशियाँ भर जाना

**************************************************

2.पर्यावरण का रखो ध्यान

आओ बच्चो मिलकर आओ
गणपति जी को शीश झुकाओ
गणेश चौथ की सुन लो बात
मिलेगी लड्डू की सौगात
आए जब यह दिवस पावन
शिव-गौरी हो अतिप्रसन्न
गौरी माँ जब मायके जाए
गणपति माँ को लेकर आए
इसे देख के खुश हो शिवशँकर
प्यारा सुत उनका लम्बोदर
होता गणपति का जन्मदिन
हर्षित करते है सबका मन
जिस पर गर्वित हो माता-पिता
जिसने सबका ही मन जीता
वह गणपति सबका प्यारा है
सारी दुनिया से न्यारा है
आओ मिल-जुल के करें पूजन
होगा अपना भी मन पावन
.........................................
गणपति पूजा सबका अरमान
पर पर्यावरण का रखो ध्यान
गणपति विसर्जन अति सुखद
इस भाव के लिए न कोई शब्द
पर रँग जब पानी में मिलते
पानी को गन्दला ही करते
तेज रँग कैमीकल वाले
जब इसको पानी में डाले
फैलाएँ यह जल प्रदूषण
खतरे में पड़ जाए पर्यावरण
वही जल पशु-पक्षी पीते
हम भी तो जल पर ही जीते
कितने जल-जन्तु मर जाएँ
जल में महामारी फैलाएँ
हो जाए कितना ही नुकसान
खतरे में हो सबकी जान
पर जो समझदारी अपनाएँ
हम अपने कुछ नियम बनाएँ
रँगवाली मूरत न लाओ
न इसे पानी में बहाओ
लाएँ जो पत्थर की मूरत
नहीं खराब हो किसी भी सूरत
न तो गन्दला करे यह पानी
न खतरे में हो जिन्दगानी
नहीं तो रख सकते हो घर
काम आएगी अगले वर्ष
शुद्ध रहेगा अपना जल
होगा सबका ही मन निर्मल
............................................
बच्चो तुमने समझी बात
पर्यावरण उत्तम सौगात
घर में तुम सबको समझाना
रँगवाली नहीं मूरत लाना
पत्थर की मूरत ही लाओ
खुशी से गणपति दिवस मनाओ

--सीमा सचदेव


Thursday, September 11, 2008

ओणम



भारत के दक्षिणी पश्चिमी तट पर एक राज्य है, जिसका नाम है केरल, जिसकी राजधानी है, तिरुवनंतपुरम| जैसा कि आप सभी को पता है कि भारत त्योहारों व पर्वों का देश है, अतः आज हम बात करेंगे, केरल में मनाए जाने वाले एक विशिष्ट पर्व की जिसका नाम है-ओणम|

अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से तो यह अगस्त-सितम्बर में मनाया जाता है, पर केरलवासियों के (कैलेंडर), कोल्लावर्षम के हिसाब से श्रावण मास में मनाया जाता है, इस त्योहार के बारे में कहा जाता है कि भगवान् विष्णु ने इस दिन राजा बाली को केरल में आकर अपने प्रजा को देखने की आज्ञा दी थी, इस दिन केरल की प्रजा राजा के आगमन की खुशी में अपने घर को सजाती है तथा भिन्न-भिन्न तरीके के व्यंजन बनाकर केरल वासी बताते हैं कि उनकी प्रजा अत्यन्त ही प्रसन्न है|

इस दिन घर की औरतें व लडकियां बड़े ही हर्ष के साथ ओन्नापूकोलम (फूलों की रंगोली ) बनाती हैं, घर के मुखिया द्वारा दिए गए वस्त्र जिसे ओनाकोड्डी कहते है, परिवार के सभी सदस्य पहनते हैं, महिलायें अच्छे -अच्छे व्यंजन तैयार करती हैं, जिन्हें साद्य कहते हैं, साथ ही साथ रंगारंग नृत्य..............प्रस्तुत करती हैं, पुरूष वल्ल्म्कल्ली (नौका दौड़ ) की प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं, जो विश्व प्रसिद्ध है, इस तरह १० दिनों तक चलने वाला यह त्योहार हर केरल वासी को उमंग व उत्साह से भर देता है, इस त्योहार में उत्साह व उमंग का एक कारण यह भी कि इस समय केरल वासियों की फसलें तैयार होती हैं जो वर्ष भर की मेहनत का परिणाम होती है| चाय, अदरक, इलायची, कालीमिर्च के अतिरिक्त धान की फसल कटने को तैयार होती है, किसान प्रसन्न मन से नई फसल को घर लाने को तैयार होते हैं।

इस की ख़ास बात यह है कि यह न केवल हिंदू द्बारा मनाया जाने वाला त्योहार है, वरन इसे सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग पूरे हर्ष के साथ मनाते हैं, कहना न होगा कि यह हमारे देश कि एकता व अखंडता का प्रतीक भी बन चुका है।

प्रस्तुति- नीलम मिश्रा


ओन्नापूकोलम (रंगोली)


Friday, September 5, 2008

स्नेहालय

स्नेहालय (Gwalior) - Home for Children of different abilities के लिए एक गीत प्रस्तुत है -

फूलों की यह प्यारी प्यारी
न्यारी न्यारी फुलवारी ।
आज मिले हम सभी यहां पर
सुगंध है इनकी मतवारी ।

भाव भंगिमा से मन मोहें
पल में रोना, पल में हंसना ।
मधुर, मनोहर, मीठी बातें
तुतला कर दिल सबका हरना ।

कभी मट्कना, कभी झगड़ना
बात बात में जिद पर अड़ना ।
भोली भाली सूरत सीरत
विद्वेष भाव न मन में रखना ।

प्यार करें हम इनके जैसा
स्वर्ग बने तब वसुधा अपनी ।
प्रभु की छवि बसती है इनमें
ऐसी ही हो दुनिया अपनी ।

पावन, निर्मल, उज्ज्वल मन हैं
सब लोकों से दुनिया न्यारी ।
हंसते और हंसाते सबको
सुगंध है इनकी मतवारी ।

कवि कुलवंत सिंह


Thursday, September 4, 2008

असफलता से मत घबराओं

एक बार की बात है जब थॉमस एल्बा एडीसन करीब 67 साल के थे, उनकी एक करोड़ो रूपये की फैक्टरी थी। एक हादसे में उनकी उस फैक्टरी में आग लग गई और सम्पूर्ण फैक्टरी जल कर राख हो गई। उस समय उनकी फैक्टरी का बीमा भी काफी कम था, और वे भारी नुकसान से जूझ रहे थे। एडीसन जो अब बूढ़े हो चुके थे, इस अग्निकांड से बहुत दुखी थे किन्तु उनके दिल से एक ही बात निकली- जो होता है अच्छा ही होता है। हमारी सारी कमियॉं इस फैक्ट्री में जल कर राख हो गई। अब मै कुछ नये सीरे से सोच सकता हूँ।  


इतना बड़े हादासे के मात्र तीन हफ्ते बाद ही  उन्होंने फोनोग्राफ़ का आविष्कार किया, इसलिये हम सीख ले सकते है कि जहॉं चाह वहॉं राह। जीवन में तो बहुत ही घटनाये होती रहती है किन्तु उनके आगे घुटने टेकने के बजाये हमें उनके लड़ने की ताकत जुटानी चाहिये। 


Wednesday, September 3, 2008

शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है?

प्यारे बच्चो,

आज तुम्हें शिक्षक दिवस की कहानी सुनाती हूँ। दूर एक जगह है तिरुतन्नी, जो ६४ किमी दूर है चेन्नई से, वहाँ पर एक तेलगु मध्यम वर्गीय परिवार में ५ सितम्बर १८८८ को जन्म हुआ एक बालक का, जिसका नाम था सर्वपल्ली राधाकृष्णन। वो खूब मन लगाकर पढ़ता था। हर किसी को उनपर नाज़ था। वो हमेशा "सादा जीवन उच्च विचार" की भावना से रहता था।

उनके जीवन दर्शन को स्वामी विवेकानंद व रविन्द्र नाथ टैगोर ने प्रभावित किया। बड़े होकर वे एक प्रतिभा शाली शिक्षक बने। सभी विद्यार्थी उन्हें तथा सभी विद्यार्थियों को वे बहुत प्यार देते थे। विद्यार्थियों तथा सहियोगियो द्वारा उनका जन्मदिन मनाये जाने की पेशकश करने पर उन्होंने कहा की "मेरा जन्मदिन मनाने की बजाये यह मेरा सौभाग्य होगा की आप इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में जाने"

१९५४ में इस भारत के रत्न को "भारत रत्न" की उपाधि से नवाजा गया। शायद तुम लोगो में से बहुत कम लोगो को ही पता होगा की वे हमारे भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी थे, जिनका कार्यकाल मई १३ - १९६२ से लेकर मई १३ -१९६७ तक रहा। राधाकृष्णन जी ने बाद में अपने सहियोगियों और साथियों के साथ कृष्णा अर्पण चैरिटी सोसाइटी की स्थापना की। आज हम उन्हें न केवल शिक्षक के रूप में ही, वरन् एक सच्चे कर्तव्य निष्ट राजनेता व एक दार्शनिक के रूप में शत-शत नमन करते है। भारत माँ का यह होनहार शिक्षक १७ अप्रैल १९७५ को इस दुनिया से चला गया। आज भी हम उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मानते है। प्यारे बच्चो, तुम लोग अपने टीचर को ५ सितम्बर को तोहफे में क्या देने वाले हो?

हर टीचर का अरमान है ये
बच्चों को मुस्कान दे वो
आंसू पोछे वो जब-जब
हँस के बोले हम तब-तब
सबसे प्यारी मेरी मैम|
शुभकामनाओं के साथ!

--नीलम मिश्रा
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Tuesday, September 2, 2008

एक छोटी बच्ची के शिक्षक पर विचार

अभी पिछले सप्ताह हमने एक छोटी बच्ची पाखी मिश्रा की एक कविता प्रकाशित की थी, आज उसी बच्ची ने शिक्षक दिवस के ऊपर एक लघु-निबंध लिख भेजा है। हम बिना संपादन के प्रकाशिक कर रहे हैं।



शिक्षक


शिक्षक वह व्यक्ति है ,जो एक बगीचे को भिन्न-भिन्न रूप रंग के फूलों से सजाता है, जो हमे कांटों पर भी मुस्कुरा कर चलने को प्रोत्साहित करता है, हमे जीने की एक वजह समझाता है। हर दुःख दर्द में हमारे घाव को भर देता है, मेरा आप सब से सिर्फ़ यही कहना है कि -शिक्षक भगवान् से भी बड़ा है, हाँ शिक्षक को भगवान् ने ही बनाया है, लेकिन शिक्षक ने लाखों छोटे-छोटे अनमोल जीवन को सही मार्ग दिखाया है, ताकि वह अपने लक्ष्य का उद्‌घाटन कर सके।
पाखी मिश्रा


Monday, September 1, 2008

बाल विज्ञान कथा- बड़बडिया (लेखक-अरविंद मिश्र)

नन्हें दोस्तो, आज मैं तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति से मिलवाता हूँ जो हिन्दी के प्रमुख विज्ञान कथाकार माने जाते हैं। उनका नाम डा0 अरविंद मिश्र आइए पढते हैं डा0 अरविंद मिश्र की एक रोचक बाल विज्ञान कथा बड़बडिया। आपको यह कहानी -->कैसी लगी, बताना भूलना।
बड़बडिया
गांव के सब लोग उसे बड़बडिया कहते थे। वह था भी तो बहुत बातूनी हर वक्त बड़बड़ - बड़बड़ करता रहता था। सूरज की मां को तो वह फूटी आंख भी नहीं सुहाता था। वह सूरज को बड़बडिया से दूर रहने को सीख देती थी। मगर नटखट सूरज मां की सीख कहां सुनने वाला था। उसने चोरी छिपे बड़बडिया से दोस्ती कर ली थी। बड़बडिया उसे अक्सर अच्छी-अच्छी और अनोखी कहानियां सुनाता था। वह उसे बहुत प्यार भी करता था। बड़बडिया उस गा¡व का बाशिंदा नहीं था। अभी वह कुछ महीनों पहले ही न जाने कहां से आ धमका था।

सुरपुर गांव के निवासी पहले तो उसे देखकर सकपकाए थे और उसे भगाने का प्रयास भी किया था। किन्तु बड़बडिया का अच्छा स्वभाव और ठीक चाल-चलन देखकर गांव वालों ने उसे गांव से भगाने का इरादा छोड़ दिया था। तभी से वह गांव में स्थायी तौर पर रहने लगा था। सुरपुर गांव में दक्षिण की ओर एक बहुत पुराना खंडहर था जिसे गांव के लोग भुतहा खंडहर कहते थे। गांव के कई लोगों का कहना था कि उन लोगों ने सफेद कपड़ों में लिपटी आकृतियों को खंडहर के आस-पास घूमते हुए खुद अपनी आंखों से देखा है। गांव के रम्मन काका का तो कहना था कि उन्होंने बड़बडिया को भी खंडहर में कई बार आते-जाते देखा है इसलिए बच्चों को गांव की दक्षिण दिशा में जाने पर पाबन्दी लगा दी गयी थी। बड़बडिया से उस खंडहर के बारे में पूछने पर वह न जाने क्या अनाप शनाप बताता था जो गांव वालों की समझ में नहीं आता था, ण्ण्ण् शायद ऐसी ही बेतुकी बातों के कारण लोग उसे बड़बडिया कहते थे और पागल समझते थे। किन्तु सूरज उसे पागल नहीं मानता था।

सूरज नटखट तो था मगर बहुत बुिद्धमान लड़का था। वह कक्षा सात का विद्यार्थी था। उसके क्लास टीचर उससे बहुत प्रसन्न रहते थे और उसकी प्रशंशा किया करते थे। आखिर एक दिन सूरज ने बड़बडिया से उस खंडहर के बारे में पूछ ही लिया। पहले तो बड़बडिया ने आनाकानी की लेकिन सूरज के बहुत जिद करने पर उसने उसे खंडहर दिखाने का वादा कर लिया। सूरज बुद्धिमान होने के साथ ही बहुत साहसी भी था। आखिर उसने बड़बडिया के साथ खण्डहर देखने का मन बना लिया।

अभी सूर्योदय नहीं हुआ था। रात के अंधेरे में ही बड़बडिया और सूरज खंडहर की ओर चल दिये थे। बड़बडिया आगे-आगे और उससे बिल्कुल चिपक कर पीछे-पीछे सूरज। दोनों चुप थे। आखिर सूरज ने मौन तोड़ा।
``बड़बडिया चाचा, क्या सचमुच होते हैं भूत।´´
``अभी पता लग जाएगा, जरा धीरज तो रखो सूरज´´, बड़बडिया ने रहस्य भरी आवाज में उत्तर दिया ``चाचा, अगर भूत हुए तो मुझे उनसे बचा लेगें न आप?´´ सूरज ने सहम कर कहा।
``अरे, तुम घबरा क्यों रहे हो? कुछ नहीं होगा। तुम बस चले चलो। जब मैं हू¡ तेरे पास, तो क्यों होते हो निराश..´´ बड़बडिया ने कहा।
``अरे, हम तो आ गए, ``अचानक सामने खंडहर का मुख्य द्वार आ गया। `` सूरज, तुम यहीं दरवाजे की दहलीज पर रुको, मैं अभी आया´´ कहते हुए बड़बडिया पल भर में दरवाजे के भीतर प्रवेश कर ओझल हो गया। सूरज वैसे तो बहुत साहसी था पर उसे कोई अज्ञात-सा भय सताने लगा था। उसका दिल धक-धक कर रहा था और उसे लग रहा था कि उसके दिल की धक-धक उस सन्नाटे में साफ सुनाई दे रही थी। अचानक उसकी तन्द्रा भंग हो गयी। अब उसके दिल की धक-धक नहीं, बल्कि यहा¡ तो उसे कोई तेज आवाज सुनाई दे रही थी।
``तुम उसे यहां क्यों ले आए? तुम जानते हो यह हमारा सीक्रेट मिशन हैं, वह बच्चा कहीं हमारा रहस्य न उजागर कर दे। नहीं, नहीं, तुमने यह बिल्कुल ठीक नहीं किया।´´
``नहीं, वह ऐसा लड़का नहीं है, वह बहुत बुिद्धमान है। मेरी हर बात मानता है। मैं उसकी गारंटी लेता हूं।´´ यह आवाज बड़बडिया की थी, ``फिर भी... ´´
फिर कुछ क्षण सन्नाटा रहा। सूरज के मन में आया कि वह वहां से सरपट भाग चले और घर जाकर ही दम ले ण्ण्ण् ण्ण् किन्तु तभी बड़बडिया सामने आ खड़ा हुआ। बड़बडिया ने उसका हाथ पकड़कर हठात कहा, ``चलो।´´ सूरज यंत्रवत सा चल पड़ा। खंडहर में चमगादड़ों का बाहर से आना शुरू हो चुका था। झींगुरों की झन-झन अलग से सुनाई दे रही थी, पर हल्के प्रकाश की एक रेखा उनका मार्ग दर्शन कर रही थी। वे लम्बे गलियारे से होते हुए बड़े से हॉल में पहुंच गये थे। अरे। यहां तो भरपूर प्रकाश था ण्ण्ण् ण्ण्ण् एक बड़ी सी यंत्रनुमा गोली सी वस्तु हॉल के बीचोबीच रखी थी। जब तक सूरज को यहां का सारा माजरा समझ में आता एक आवाज सन्नाटे को चीर गई।
``आओ, सूरज आओ ण्ण्ण्ण् हम तुम्हारा स्वागत करते हैं।´´
``क्या आप भूत हैं? डरे-सहमें सूरज के मुंह से अचानक ही ये शब्द फूट पड़े।
`` क्या कहा तुमने, भूत, अरे भाई, कैसा भूत ण्ण् ण्ण्ण् भूत यानि जो बीत चुका अथात् भूतकाल। जो बीत चुका वह फिर से वापस कैसे आ सकता है? हम भूत नहीं,, भविष्य हैं, तुम्हारा भविष्य...
``हां सूरज, हम भविष्य से आए हैं, तुम मेरे और हम सब के पुरखे हो। पर दादा-लकड़दादा की हजारों पीढ़ी के भी पहले के पुरखे..´´
मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है।´´ सूरज की बुद्धि चकरा गई थी´´ हम समझाते हैं तुम्हें। जैसे तुम जमीन पर चलकर दूरियां तय करते हो। हमारे ग्रह पर समय को भी पार करने की मशीने बन चुकी हैं जो समय में आगे या पीछे आ जा सकती हैं यानि टाइम मशीनें। हम तुम्हारे सौरमंडल के पास ही एक आकाशगंगा के एक सौर परिवार से आए हैंण्ण् ण्ण्ण् सौर परिवार का मतलब तो तुम समझते ही हो।´´
``हां, हां, जैसे हमारा सूर्य परिवार। सूर्य, बुध, शुक्र, धरती, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और अभी बिरादरी से बाहर हुआ प्लूटो।´´
``शाबाश, तुमने तो सौर परिवार के सभी सदस्य ग्रहों का नाम गिना दिया´´ आवाज गूंजी।
``हम प्लूटों के भी पार से आये है बहुत तेज चलकर ण्ण्ण् हमारी रतार यानि यह जो यान तुम देख रहे हो वह प्रकाश की भी गति से तेज चलता है। प्रकाश की गति तो तुम्हें मालूम ही है। ``जी हां, एक लाख छियासी हजार दो सौ बयासी मील प्रति सेकेण्ड´´ सूरज के मुंह से तुरन्त रटा हुआ उत्तर फूट पड़ा।
``बहुत अच्छे! तुम, तो जीनियस हो। हम प्रकाश की गति से भी तेज चलकर तुम्हारे यहां एक प्रकाश वर्ष में पहुंचे हैं यानि प्रकाश एक वर्ष में जितनी दूरी तय करता है उतनी दूर से आये हैं हम। तुम गणना करके दूरी निकालना। अभी नहीं, इत्मीनान से´´ आवाज का आना जारी था।
``आप अंधेरे से थोड़ा प्रकाश में आइए।´´ सूरज बोला।
´´लो, आ गया।´´ बड़बडिया से मिलती-जुलती कद-काठी का एक व्यक्ति सामने था। ``आप लोग भूत नहीं है, और अपने को भविष्य से आया हुआ मानते हैं तो अपने आने का कारण तो बताइए´´ सूरज ने प्रश्न किया।
``हम दरअसल एक खोजबीन करने आये थे।´´
``कैसी खोजबीन? सूरज की जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी।
``मैंने बताया न सूरज कि तुम मेरे आदि-आदि पूर्वजों के भी पूर्वज हो, वास्तव में हम अपनी आकाशगंगा के युक्का ग्रह पर यहीं धरती से ही तो गए थे ण्ण्ण् लगभग लाख वर्ष पहले ण्ण्ण् यानि तुम्हारे समय के कुछ हजार साल बाद जब धरती से दूसरे सौरमंडलों तक की यात्राएं यानि अन्तरिक्ष यात्राएं सम्भव हो गई थीं।´´
``यानि कि मेरे समय के कुछ हजार साल बाद मानव अन्तरिक्ष यात्राएं करने लगेगा।´´ सूरज ने फिर प्रश्न किया।
``हां, केवल अपने सौर मंडल ही नहीं, निकटवर्ती आकाश गंगाओं की भी ऐसी यात्राएं `जेनरेशन वोयेज´ कही जाएंगी।´´
``जेनरेशन वोयेज? मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ा।
``यानि ऐसे अन्तरिक्षयान होंगे जिनमें मानव की पीढ़ियां-दर पीढ़ियां जन्म लेती रहेंगी और अंतरिक्षयान की कमान संभालेगी ण्ण्ण् पर ऐसे अन्तरिक्षयान की आबादी बहुत नियंत्रित रहेगी ण्ण्ण् ण्ण् पर यह सब तुम्हारी समझ में नहीं आएगा।´´
``आपने अब तक यह नहीं बताया कि आपका यहां आने का असली मकसद क्या है?´´ सूरज को मानो सहसा यह भूला प्रश्न याद हो आया।
``बस यूं ही, कुछ खास नहीं ऐसे ही तुम्हें देखने की इच्छा। और धरती, अथाZत् अपने मातृग्रह का सैर सपाटा´´
``अब मुझे आप बातों में मत बहलाइए। सही-सही बताइए।´´
``अच्छा (अब तुम सही-सही जानना ही चाहते हो तो समझ लो कि हम एक गुप्त अभियान पर आए थे। अपने ग्रह के मुखिया के इस धरती पर रहने वाले आदि पुरखों का पता लगाने का हमारा अभियान आज पूरा हुआ। तुम यानि तुम्हारा परिवार ही हमारे मुखिया अर्थात राष्ट्राध्यक्ष का धरती का आदि पुरखा परिवार है। हमारे राष्ट्रध्यक्ष स्वयं तुमसे मिलना चाहते हैं। बड़बडिया उनका ही विश्वासपात्र कर्मचारी है और मैं युक्का के खुफिया विभाग का प्रमुख हूं। मेरे अन्य साथी इस शटल में बैठे हैं, बोलो, चलोगे अपने भविष्य से मिलने?´´
इतना सुनना था कि सूरज का दिल जोरों से धड़क उठा। उसने बिना एक क्षण गंवाए जो सरपट दौड़ लगाई तो वापस घर ही आकर दम लिया ण्ण्ण् अभी घर पर सब सो रहे थे वह चोरी से घर में घुसा और बिस्तर में दुबक गया पर उसकी आंखों से नींद गायब थी।
सुबह हुई। सूरज उठ बैठा। उसे खंडहर का सारा दृश्य अभी भी बेचैन किये हुए था। आखिर उससे रहा नहीं गया। उसने सारी बातें अपनी मां से कह सुनाई। उसकी मां तो अवाक रह गयी। उसे बेटे की बातों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ। शायद सूरज ने कोई बुरा सपना देखा हो। उसकी मां को यही लगा।
``लगता है, तुमने रात में कोई बुरा सपना देखा है चलो, ठीक से हाथ मुंह धो लो´´ मां की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सूरज बोल उठा, ``नहीं मां, मैं सच कह रहा हूं।´´
``बड़बडिया की खोज शुरू हुई। लेकिन उसका तो कहीं अता पता ही नहीं था। सब लोगों ने गांव का कोना-कोना देख डाला। पूरे गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई कि बड़बडिया गांव से फरार है और उसके कुछ साथी दक्षिण वाले खंडहर में हैं। देखते ही देखते खंडहर के पास लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। कुछ हिम्मती गांव वाले सूरज को लेकर खंडहर में घुस गए। पर वहां तो कुछ भी नहीं था। हां, खंडहर के भीतर हाल में साफ-सफाई की गई लगती थी। कुछ तार और विचित्र से टूटे-फूटे कल-पुर्जे भी वहां बिखरे थे ण्ण्ण्ण्ण् इसके अलावा वहां कुछ भी नही था। ``बड़बडिया तो बहुत अच्छा इंसान था वह हम लोगों का बहुत काम भी कर देता था। कभी किसी पर गुस्सा नहीं करता था।´´
उन्हें यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बड़बडिया किसी दूसरे लोक से आया था।
सुरपुरवासियों को आज भी बड़बडिया का बेसब्री से इंतजार है।