Wednesday, November 28, 2007

पर्यटन – भाग-2: कुहू का बस्तर भ्रमण

मेरे प्यारे दोस्तों,



पिछले बुद्धवार मैंने आपको बस्तर के इतिहास से परिचित कराया था साथ ही साथ बारसूर और दंतेवाडा नगरों की सैर भी। आज मेरे पिटारे में एसे प्राकृतिक स्थल है।यहाँ पहुँच कर यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं तो आप खो जायेंगे वैज्ञानिक सोच रखते हैं तो अपने आगे रहस्यों और ज्ञान की कई परतों को खुला पायेंगे और अगर कवि या साहित्यकार हैं तो फिर तौबा, आपको तो वहाँ से उठा कर ही लाना पडेगा।

जगदलपुर से लगभग 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भारत के विशाल जलप्रपातों में एक चित्रकोट।



लगभग 100 फीट की उँचायी से गिरती हुई इन्द्रावती नदी विहंगम दृश्य उत्पन्न करती है। यह जलप्रपात नियाग्रा जलप्रपात का छोटा रूप कहा जाता है।



कमजोर चूना पत्थर को गलाती, काटती नदी नें अर्धचंद्राकार स्वरूप ले लिया है। शोर करती और निरझर होती नदी निकट ही उपर उठते फुहारों और इंद्रधनुष के रंगो को बिखेर देती है। बस्तर आने वाले पर्यटक यदि इस जलप्रपात को न देखें तो उनका घूमना व्यर्थ ही माना जायेगा।



जुलाई से अक्टूबर के मध्य इस स्थल को देखना सर्वोत्तम है, मानसून में इंद्रावती नदी अपने पूरे वेग पर होती है इसलिये चित्रकोट का सौन्दर्य दुगुना हो जाता है।जलप्रपात के निकट तक नौकाटन का आनंद लिया जा सकता है। निकट की कुछ छोटी छोटी गुफायें हैं जिन्हें मंदिर का स्वरूप दे दिया गया है।



अब कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान की ओर बढते हैं। यह उद्यान जंगली भैंसों के लिये जाना जाता है। दोस्तों, जंगली भैंसे रंग और स्वरूप में आम भैसों की तरह लगते हैं किंतु देह, कद और काठी मे बलिष्ठ।



उनके विशाल सींग उनके सौंदर्य में चार चाँद लगाते हैं। साल और टीक के घने दरखतों वाला इस राष्ट्रीय उद्यान जैव-विविविधता के विश्व में गिने चुने धरोहरों में से एक है।



जीव जंतुओं की तो बडी तादाद यहाँ है ही लाईमस्टोन (चूना पत्थर) तहा के धरातल को कई प्राकृतिक खजाने भी दे गया है जिनमें प्रमुख है कोटुमसर गुफा।



राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में ही इस गुफा के होने का लाभ यह है कि आपको मामूली फीस पर उद्यान के मुख्यद्वार पर ही गाईड मिल जाता है जो कि आपके साथ पैट्रोमेक्स अथवा सौर-उर्जा से जलने वाले प्रकाश स्त्रोत ले कर चलता है। गुफा के भीतर गहरे उतरते हुए साँसे थम जाती है और पाताललोक में प्रवेश जैसा भान होता है।



गाईड के निर्देशों का पालन करते हुए एक बार आप गहरे उतरे नहीं कि ज्ञान और सौदर्य के द्वार आपके लिये खुल जाते हैं। चूनापत्थर ने (लाईम स्टोन) पानी के साथ क्रिया करने के बाद गुफा की दरारों से रिस रिस कर स्टेलेक्टाईट अथवा आश्चुताश्म (दीवार से नीचे की ओर लटकी चूना पत्थर की रचना: छत से रिसता हुवा जल धीरे-धीरे टपकता रहता हैं। इस जल में अनेक पदार्थ घुले रहते हैं। अधिक ताप के कारण वाष्पीकरण होने पर जल सूखने लगता हैं तथा गुफा की छत पर पदार्थों जमा होने लगता हैं । इस निक्षेप की आक्र्ति परले स्तंभ की तरह होती हैं जो छत से नीचे फर्श की ओर विकसित होते हैं)







स्टेलेक्माईट अथवा निश्चुताश्म (जमीन से दीवार की ओर उठी चूना पत्थर की संरचना: छत से टपकता हुवा जल फर्श पर धीरे-धीरे एकत्रित होता रहता हैं । इससे फर्श पर भी स्तंभ जैसी आकृति बनने लगती हैं। यह विकसित होकर छत की ओर बड़ने लगती हैं)



और पिलर अथवा स्तंभ (जब स्टेलेक्टाईट और स्टेलेक्माईट मिल जाते हैं) संरचनायें बनायी हैं। इस गुफा में खास देखी जाने योग्य है बिना आँख की मछली – “कैपिओला शंकराई” केवल इसी जगह पायी जाने वाली इस मछली का नाम उसके खोजी डॉ. शंकर तिवारी के नाम पर पड गया था। मछलियों में आँख का न होना गुफा के भीतर रोशनी के न होने के कारण है। गुफा के अंतिम छोर पर एक स्टेलेक्माईट का स्वरूप शिवलिंग की तरह है और पर्यटक वहा पहुँच कर पूजन भी करते हैं। मैं इस स्थल तक पहुँचने के रोमांच को कभी नहीं भुला सकती।



दोस्तों विज्ञान की इन्ही बातों के साथ हम अपने बस्तर भ्रमण के इस अंक को विराम देते हैं लेकिन अभी मेरी यात्रा पूरी नहीं हुई। बस्तर के और भी दुर्लभ स्थलों की यात्रा शेष है। तो अगले सप्ताह फिर मिलते हैं इसी कडी के तीसरे अंक के साथ।



- - आपकी कुहू।

प्रस्तुति : *** राजीव रंजन प्रसाद
29.11.2007





आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

6 पाठकों का कहना है :

रंजू का कहना है कि -

कुहू जी आपकी इस यात्रा के वर्णन ने मुझे तो बहुत रोमांचित कर दिया है .अभी जलप्रपात के जादू से बाहर आ भी नही पायी थी की गुफा के रोमांच में खो गई ..बहुत ही प्यारी जगह है यह तो :) हमारा भारत सच में बहुत सुंदर स्थानों से भरा हुआ है ..बहुत बेसब्री से इंतज़ार है मुझे आपके साथ अगली यात्रा वर्णन को जानने का
सस्नेह
रंजू

सजीव सारथी का कहना है कि -

kuhu beta aapne likha ki
यहाँ पहुँच कर यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं तो आप खो जायेंगे वैज्ञानिक सोच रखते हैं तो अपने आगे रहस्यों और ज्ञान की कई परतों को खुला पायेंगे और अगर कवि या साहित्यकार हैं तो फिर तौबा, आपको तो वहाँ से उठा कर ही लाना पडेगा।
aapke papa to yeh teeno hain, unka kya kiya aapne.....ha ha ha....
bhai bahut hi sundar varnan aur chitr dono

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

प्यारा इन्द्रधनुष भी देखा, देखा जल-प्रपात
भू-गर्भ की गुफा घुस गये लेकर गाइड साथ
लेकर गाइड साथ समां क्या अजब निराला
प्रकृति ने भी जाने कहाँ कहाँ क्या रच डाला
एक बार जो गया भूल नहीं सके उम्र भर
प्यारे भारतवर्ष का प्यारा सा ये बस्तर..

बहुत बहुत धन्यवाद राजीव जी को व प्यारी कूहू को..

tanha kavi का कहना है कि -

कुहू,
घुमने में बहुत हीं मजा आया होगा? है ना..हमें भी इन चित्रों को देखकर और उनके बारे में पढकर बहुत मजा आया। सजीव जी ने भी सही कहा है, तो बताओ तुमने अपने पापा को कैसे संभाला :)

-विश्व दीपक 'तन्हा'

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

फ़िर मैं कहूँगा, यह कूहू की शैली नहीं लगती।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

अद्भुत भ्रमण

अगली बार मुझे भी अपना कैमरा कलम सहित जाने का मन हो आया है प्रस्तुति के लिये धन्यवाद

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)