Friday, August 31, 2007

मेरे सपनों का भारत

प्यारे बच्चो,

हर महीने के अंतिम दो-तीन दिनों में हमारा प्रयास है आपकी रचनाओं को भी हिन्द-युग्म के इस मंच पर जगह दी जाय ताकि आपकी रचानात्मकता भी निख़र कर बाहर आ सके। यदि आप भी लिखते हैं तो शर्माना छोड़िये और अपनी रचनाएँ, परिचय व फोटो सहित bu.hindyugm@gmail.com पर भेजिए। बच्चो, इसी कड़ी में आज आपके समक्ष औरंगाबाद, महाराष्ट्र के रौनक पारेख़ अपनी रचना "मेरे सपनो का भारत" लेकर आये हैं। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है -



-: नाम :-
रौनक पारेख़

-: कक्षा :-
दसवीं

-: विद्यालय :-
एस. बी. ओ. ए. पब्लिक स्कूल, औरंगाबाद, महाराष्ट्र



मेरे सपनो का भारत

मेरे भारत में न कोई भुखमरी से मरे
हर नौजवान काम मेहनत से करे
न कभी हिन्दुस्तानी का मन बिके
यहाँ सभी सिर्फ़ अच्छे गुण ही सीखे

यहाँ न हो भ्रष्टाचार का नामोनिशान
प्रगति का पथ सीखे इससे हर बेईमान
यहाँ का सैनिक करे दुश्मन को लहूलुहान
न कभी करे अपनी जान कुरबान

गरीबी अशिक्षा से मिले इसे छुटकारा
चमके हर बालक बनकर एक सितारा
कभी न बैठे कोई युवा यहाँ बेकार
यहाँ भी हो नौकरियों की भरमार

मेरा भारत बन जाते पृथ्वी का गहना
इसकी उन्नती का क्या कहना
बढ़ती रहे इस गहने की शान
हर हिन्दुस्तानी गर्व से कहे...
मेरा भारत महान

- रौनक पारेख़


Thursday, August 30, 2007

हम बच्चे


आज प्रस्तुत है तपन शर्मा जी की बाल कविता - हम बच्चे।


हम बच्चे प्यारे प्यारे हैं,
सब के राज दुलारे हैं।
मीठी हमारी बोली है,
मिसरी उसमें घोली है॥

चंदा हमारे मामा लगते,
सूरज अपने चाचा लगते।
खेल खिलौने हमारी दुनिया,
मम्मी पापा प्यारे लगते॥

टीचर के हम मन को भाते,
दीदी, भैया संग खेलने जाते।
नानी दादी से कहानी सुन कर,
हँसते और हँसाते जाते॥

-तपन शर्मा


Wednesday, August 29, 2007

दीदी! कैसी गिफ़्ट रहेगी?

दीदी प्यारी,सुनो हमारी
राखी लाना,सबसे न्यारी
चाकलेट उसमे लगवाना
टौफ़ी की झूमर बँधवाना
आज मुझे बिल्कुल न डाँटो
जो कुछ मैं बोलूँ, वो मानो
चक दे चक दे खूब करेंगे
हम दोनो फिर बहुत हँसेंगे

अरे! आपका गिफ़्ट?
अच्छा!

'सुनीता दी'* से बात करूँगा
मन के सब हालात कहूँगा
जहाँ गयीं वो लास्ट महीने
चाँद-तारों में रहीं महीने
एक वहीं का टिकट दिला दो
दीदी को भी वहाँ घुमा दो
दीदी! कैसी गिफ़्ट रहेगी?
बहना मेरी खूब हँसेगी
खूब हँसेगी
खूब हँसेगी
बोलो ना--
दीदी! कैसी गिफ़्ट रहेगी?

(*सुनीता विलियम्स)

---प्रवीण पंडित

नोट- यद्यपि यह कविता कल ही प्रकाशित होनी चाहिए थी, प्रवीण जी ने समय से भेज भी दिया था, मगर इंटरनेट की समस्या के कारण इसे कल प्रकाशित नहीं किया जा सका। हमें खेद है।


बाल कहानी: उसके बिना (लेखक: जाकिर अली 'रजनीश')


रूकइया ने अपने कमरे का दरवाजा खोला। बार्बी डाल, भौंकने वाला कुत्ता, चाबी वाली ट्रेन, टेडी बियर... और हां, उसकी मनपसंद डांसिंग डॉल ...सारा सामान करीने से सजा हुआ था।

रूकइया हौले से मुस्करा पडी। सहसा उसकी नजर शेरू पर जा पडी। शेरू यानी सेल वाला कुत्ता। वह इतनी जोर से भौंकता है कि बडे बडों की सिट्टी–पिट्टी गुम हो जाए। एक बार रूकइया ने पडोस के सोनू के कान के पास ले जाकर उसका बटन ऑन कर दिया था। शेरू की आवाज से बेचारा ऐसा डरा कि उसकी नेकर ही गीली हो गयी। रूकइया को यह देखकर बडा मजा आया। वह काफी देर तक हंसती रही।

“तुमने आज कहां देर कर दी ? मैं यहां कबसे बोर हो रहा हूं।” रूकइया को लगा शेरू उससे शिकायत कर रहा है।

वह बोली– “सॉरी शेरू। दरअसल आज मैं...”कहते–कहते रूकइया की नजर गुडिया के दाहिने हाथ पर जाकर ठहर गयी। वह कोहनी के पास से टूटा हुआ था।

उसे देखते ही रूकइया की सारी खुशी काफूर हो गयी। उसकी इस दशा के लिए छोटी बहन रानी जिम्मेदार थी। है तो वह अभी दो साल की, लेकिन लगती है पूरी शैतान की नानी। रूकइया के सामान की पक्की दुश्मन ही समझो उसे। अब तक वह रूकइया की दो कॉपियां, एक किताब और सिंगिंग बर्ड शहीद कर चुकी है। छोटी–मोटी जो भी चीज उसे मिल जाए, सीधे उसके मुंह में जाती है। उसके बाद तो उसका भगवान ही मालिक।

रूकइया को गुडिया पर दया आ गयी, “बेचारी, जब अपने हाथ को देखती होगी, तो उसे कितना दु:ख होता होगा?” उसने गुडिया को अपने हाथ में उठा लिया, “मन करता है कि इस रानी की बच्ची को...”तभी उसके विचारों में ब्रेक लग गये। अम्मी उसे खाने के लिए आवाज दे रही थीं। उसने गुडिया को उसकी जगह पर खडा किया, पीठ पर टंगा स्कूल बैग उतारकर मेज पर रखा और ड्रेस बदलने लगी।

खाने की मेज पर अम्मी उसे इंतजार करती हुई मिलीं। वह चुपचाप उनके पास जाकर बैठ गयी। उसने मेज पर नजर मारी– आलू के पराठे। वाह, मजा आ गया। उसने तेजी से प्लेट में झपट्टा मारा।

यह देखकर अम्मी ने उसे डांट दिया, “ये क्या? अब तुम रानी वाली हरकतें करने लगी?”रूकइया झेंप गयी। उसे अपने आप पर शरम आ गयी। उसने ऐसा क्यों किया? ऐसी हरकतें तो रानी करती है। इस समय तो वह नानी के पास होगी। वहां पर उसके खूब मजे...।

आखिर रूकइया से रहा न गया। वह बोली, “अम्मी, रानी कब आएगी?” “क्यों ? तुम्हें कब से रानी की फिकर होने लगी?” अम्मी ने उससे उल्टा सवाल पूछ लिया, “तुम्हारी तो कभी उससे पटती ही नहीं। हमेशा तुम उसकी शिकायत करती रहती थी। इसीलिए पापा उसे नानी के घर छोड आए हैं।”

रूकइया को पिछली घटना याद आ गयी, जब रानी ने उसकी मैथ और इंग्लिश की कापियां फाडी थीं। उस समय उसे रानी पर बहुत गुस्सा आया था। न जाने कितनी मुश्किल से उसने अपने आप को रोका था। उस दिन अम्‍मी ने रानी को खूब समझाया। लेकिन रानी ने इस कान से सुना और उस कान से बाहर निकाल दिया।

उसके कुछ ही समय बाद रानी ने एक दिन गुडिया का हाथ तोड दिया। उस दिन रूकइया का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। वह अपने आप को रोक नहीं पायी। उसने रानी के गाल पर दो चाटे जड दिये।

अम्‍मी को जब यह बात पता चली, तो उन्होंने रूकइया को खूब डांटा। उसके बाद रूकइया दिन भर अम्मी से रूठी रही। भला ये कौन सी बात हुई? रानी ने उसकी मनपसंद गुडिया का हाथ तोडा था। क्या वह उसकी इस गल्ती के लिए उसे दो चाटे भी नहीं मार सकती? पापा को जब रूकइया की नाराजगी का पता चला, तो उन्होंने झूठमूठ अम्मी को डांटा और रूकइया को उसकी मनपसंद चाकलेट भी दिलाई। तब कहीं जाकर शान्त हुआ था उसका गुस्सा।

बीती घटना याद आने से रूकइया का मन अशान्त हो गया। उसने रानी की कुर्सी पर नजर डाली। आज वह खाली थी। उसे मन के किसी कोने में खाली–खाली सा महसूस हुआ।

“क्या हुआ रूकइया ? तुम खाना क्यों नहीं खा रही हो?” अम्मी ने उसे टोका। रूकइया के सामने उसकी मनपसंद डिश थी, फिरभी उसका खाने का मन न हुआ। जैसे–तैसे उसने दो–चार निवाले खाए और फिर पानी पीकर उठ गयी।

रूकइया सीधे अपने कमरे में पहुंची। कमरे में घुसते ही उसकी नजर रानी के झूले पर पडी। झूला खाली थी। उसे लगा रानी झूले में छिप गयी है। वह उसके पास पहुंची। पर झूला वास्तव में खाली था। रूकइया ने अपना बैग निकाला और होमवर्क करने बैठ गयी। मैम ने सवाल हल करने के लिए कहा था। उसने कॉपी खोली और सवाल पढने लगी– एक चॉकलेट पांच रूपये की मिलती है, तो बताओ पांच चॉकलेट कितने की मिलेंगी?

चॉकलेट का ध्यान आते ही रूकइया का ध्यान भंग हो गया। अभी दो दिन पहले की ही तो बात है। शाम का समय था। वह टीवी पर कार्टून फिल्म देख रही थी। अचानक उसे चॉकलेट की महक आई। उसने पलट कर देखा। रानी उसके बैग के पास खडी चॉकलेट खा रही थी। यह देखकर उसका पारा गर्म हो गया। उसने रानी को एक चांटा लगाया और चॉकलेट छीनने लगी।

लेकिन रानी भी कहां कम थी। उसने जब देखा कि चॉकलेट उसके हाथ से निकलने वाली है, तो उसने रूकइया के दाहिने हाथ में दांत गडा दिये। रूकइया दर्द से बिलबिला उठी और रोने लगी।

रूकइया को रोते देखकर रानी भी सुबुकने लगी। तभी अम्मी भी वहां आ गयीं। उन्होंने रानी को गोद में उठा लिया और डपट कर पूछा, “रूकइया, ये सब क्या हो रहा है?”

“इसने दांत से काटा है।” रूकइया सुबक पडी।

“तुमने इसे छेडा होगा?” अम्मी ने उल्टा उसे ही डांटा, “मैंने पचास बार कहा है कि तुम इसके पास मत जाया करो।”

“मैं इसके पास कहां गयी थी,” रूकइया बिफर पडी, “इसने मेरी चाकलेट खाई। मैंने तो इसे कुछ कहा भी नहीं, ये ही मेरे सामान के पीछे पडी रहती है।”

“ठीक है, मैं इसे नानी के पास भेज देती हूं। उसके बाद तुम आराम से रहना।” कहती हुई अम्मी रानी को लेकर वहां से चली गयीं।

रूकइया को झटका सा लगा। वह वर्तमान में लौट आई। उसने हाथ पर नजर मारी। अनचाहे ही उसका बायां हाथ उस जगह पर चला गया, जहां पर रानी ने दांत गडाये थे। वह उस जगह को सहलाने लगी। उसे अपना स्पर्श बडा अच्छा लगा। उसे रानी का मासूम सा चेहरा याद आ गया। चौडा सा माथा, बडी–बडी आंखें, तोते के टोंट जैसी नाक, मोती जैसे दांत और गोल–मटोल चेहरा। जैसे...जैसे गुलाबी रंग के दो बडे से सेब।

रूकइया के मन में ढेर सारा प्यार उमड आया। उसका मन हुआ कि वह रानी को अपनी गोद में लेकर उसे ढेर सारा प्यार करे। लेकिन, रानी तो.....।उसने खीझ और लाचारी में अपनी आंखें मींच लीं। उसे अपने आप पर गुस्सा आने लगा। क्यों उसने अम्मी से उसकी शिकायत की? न वह शिकायत करती, और न ही वह...।

रूकइया का मन भारी हो गया। उसने कापी किताबें एक ओर खिसकायीं और बेड पर लेट गयी। वह काफी देर तक पिछली बातों को याद करती रही और फिर न जाने कब उसे नींद ने आ घेरा।

हार्न की आवाज सुनकर रूकइया की नींद खुली। वह जल्दी से उठी और बाहर को भागी। गेट के पास पापा अपनी गाडी खडी कर रहे थे। उनके हाथ में एक बडा सा गिफ्ट पैक था। उसे देखकर वह हैरान होती हुई बोली, “पापा, ये क्या है?”

“मेरी रानी बिटिया का गिफ्ट। आज तुम्हारा जन्मदिन है न।”

रूकइया की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अरे, आज तो उसका बर्थ–डे है। ...और उसे बिलकुल याद ही नहीं रहा। उसने पापा के हाथ से पैकेट ले लिया और अपने कमरे की ओर भाग गयी।

रात के आठ बजे घर में जन्मदिन पार्टी का आयोजन था। रूकइया ने नई–नई ड्रेस पहनी। फिर उसने मोमबत्ती को फूंक मारकर बुझाया और केक काटा। सब लोगों ने तालियां बजायीं और ‘हैप्पी बर्थ डे’ वाला गाना गाया। उसके बाद सभी लोगों ने रूकइया को गिफ्ट दिये। ढेर सारे तोहफे देखकर रूकइया का मन खुशी से फूला नहीं समाया।

उसके बाद सभी लोग खाने–पीने में व्यस्त हो गये। पापा ने रूकइया के कमरे में सारे गिफ्ट रखवा दिये। रूकइया उन्हें देखने के लिए लालायित हो रही थी। वह चुपके से अपने कमरे में जा पहुंची और पैकेट खोल कर देखने लगी।

पहले पैकेट में एक सुंदर सी कार थी। वह उसे देखते ही चहक पडी, “हम तुम इसे साथ–साथ चलाएंगे रानी।” रूकइया इतनी खुश थी कि उसे यह याद ही नहीं रहा कि रानी वहां नहीं है। वह बडबडायी, “रानी, तुम इसे चलाओगी?”

अगले ही पल उसे अपनी गल्ती का एहसास हुआ। रानी तो वहां थी ही नहीं। यह देखकर उसका मन उचट गया। उसने अपने खिलौनों पर एक नजर मारी और कमरे से बाहर निकल गयी।

रूकइया सीधे अम्मी के पास पहुंची। वे किचन में चाय बना रही थीं। वह उनका हाथ हिलाती हुई बोली, “अम्मीजान, आपने तो हमें गिफ्ट दिया ही नहीं।”

“बेटे, पापा लाए तो हैं।” उन्होंने उसे टालना चाहा।

“लेकिन वो तो पापा का है। मुझे आपसे भी गिफ्ट चाहिए।”

“अचछा?” अम्मी ने प्यार से उसकी ओर देखा, “बोलो क्या चाहिए ?”

“पहले प्रॉमिस करिए कि आप मना नहीं करेंगी।” रूकइया ने शर्त रखी।

“अच्छा बाबा, प्रॉमिस । अब बोलो, क्या चाहिए ?”

“आप रानी को ले आइए, मुझे उसके बिना...।”

रूकइया की बाकी बातें उसके मुंह में ही रह गयीं। अम्मी ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उन्हें अपनी बेटी पर ढेर सारा प्यार आ रहा था।


Tuesday, August 28, 2007

हास्‍य बाल कविता: आओ बांध दूँ राखी (लेखक: जाकिर अली 'रजनीश')

बच्चों, रजनीश चच्चा रक्षाबंधन पर आपके लिये रची एक खूबसूरत कविता मुझे SMS के द्वारा भेजी है, आनन्द लीजिये -


बिल्ली बोली चूहा भय्या,
दे दो मुझको माफ़ी
आज पर्व है रक्षाबंधन,
आओ बांध दूँ राखी

बोला चूहा हाथ जोड़कर,
ओ बहना अलबेली
तुम हो राजा भोज, और
मैं ठहरा गंगू तेली
राजा के मैं बनूँ बराबर
मेरी नहीं है इच्छा
घर जाने को सूर्पनखाजी
मांग रहा हूँ भिक्षा
सुनकर के यह भड़क उठी
बिल्ली ने पंजा मारा
होशियार था चूहा लेकिन
हो गया नौ-दो-ग्यार।


Monday, August 27, 2007

गुड़िया आई


अंग्रेजी के छोटे-छोटे शब्दों से परिचित कराने के लिये भी हिन्दी कविता कारगर हो सकती है। इसका कारण यह है कि कविता के बोल चूंकि हिन्दी के हैं बच्चों को सुग्राह्य हो जाते हैं, जिसके कारण उन्हें न केवल अंग्रेजी के शब्दों के अर्थ समझने में मदद मिलती है अपितु उनके लिये पढाई, आनंद का विषय भी हो जाती है। मेरा एक एसा ही प्रयास प्रस्तुत है:

देखो बच्चों ग़ुडिया आई
संग अपने वो खुशियाँ लाई
ग़ुडिया के दो EYES प्यारे
EARS हैं दो न्यारे न्यारे
एक प्यारी सी NOSE है
LIPS दोनों CLOSE है
चूहे जैसी TEETHS है
HAIR देखो BROWN से
दो छोटे से HANDS है
HANDS में FINGERS, CROWN से
ग़ुडिया के दो LEGS है
जिनसे वो उधम मचाती है
थक के फिर वो सो जाती है।

-रचना सागर


Friday, August 24, 2007

दो पहेलियाँ



शेर की है ये मौसी,
पर उससे खूब छोटी,
चुपके से घर पर आये
सारा दूध झट पी जाये,
चूहे इससे डरकर भागे,
क्योकी ये उनको खा ले,
बूझो करु मैं बात किसकी ?
बिल्ली मौसी,बिल्ली मौसी |



दिन मे छूप जाये कहीं,
ढूंढो तो दिखता ही नहीं,
रोज़ रात को वो आता ,
साथ अपने सितारे लाता ,
कभी नज़र आये आधा ,
कभी पूरा गोल हो जाता,
कौन है वो जरा नाम बताना ?
नहीं मालूम ? चंदा मामा |


Thursday, August 23, 2007

चीनी चिड़ियों की कहानी

एक समय की बात है, दूर चीन देश में एक पहाड़ पर एक छोटा सा पेड़ था। उस पेड़ पर दो चीनी चिड़िया के बच्चे रहते थे। एक का नाम अन्नू था और दूसरे का था लूनू। दोनो एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनो हमेशा साथ साथ खेला करते।

एक दिन जब लूनू सो रही थी और अन्नू अपने घोंसले के छज्जे पर बैठी थी, तो अन्नू ने देखा कि दूर से एक बादल, जाने कहाँ से टहलता हुआ उसकी तरफ़ ही चला आ रहा है। बादल ने अपने सर पे दो मटके पानी के रखे हुये थे। बादल उनके घोंसले तक जैसे ही आया। अन्नू ने बादल से पूछा "क्यों भैया कहाँ जा रहे हो "? बादल ने कहा "मैं तो होली खेलने जा रहा हूँ "। और यह कहते ही उसने दो मटकी पानी अन्नू पर उड़ेल दिया और अन्नू पूरी गीली हो गई। अन्नू को ज़ुकाम हो गया। उसे सर्दी लग गई थी। वो दुबक के अपनी रजाई में बैठ गई। उसने लूनू को जगाया और कहा "बहना ज़रा एक कप चाय तो बना कर ला दे। मुझे सर्दी लगी है। " तो लूनू झट से रसोई में गई और एक गिलास लाकर अन्नू को देकर बोली "गरम गरम दूध पिया करो क्योंकि चीनी चिडिया कभी चाय नहीं पीतीं" !

कुछ दिन बाद फिर वो शरारती बादल आया। अबकी बार उसने लूनू के ऊपर पानी डालने की कोशिश की। लूनू को अन्नू की बहती हुई नाक याद हो आई। उसे ज़ोर का गुस्सा आया। वो अपना बल्ला उठा कर बादल के पीछे भागी। फिर क्या था मोटा बादल आगे आगे और लूनू पीछे पीछे। थोडी ही दूर जाके छोटी सी लूनू चिडिया गिर पड़ी। वो रोने लगी। उसके घुटने में चोट लग गई थी। अन्नू चिडि़या पीछे खडी यह सब देख रही थी, वो झट से दौड़ी आई। उसने लूनू को उठाया और उसके घुटने से मिट्टी साफ़ करते हुये बोली "चीनी बच्चे रोते नहीं हैं। अगर वो कभी गिर भी जाते हैं तो मिट्टी साफ़ करके हंसते हुये फिर से दौड़ने लगते हैं "! फिर क्या दोनो चिड़िया के बच्चे चीं चीं चीं चीं चीं चीं करते हुये फिर से खेलने लगे।

- उर्मिला


अनुरोध...


प्रिय मित्रो,
बाल-उद्यान में सभी मित्रों के उत्साह प्रदर्शन से प्रसन्नता है। अभी बच्चों के लिये प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री सदस्य मित्रों के निश्चित दिवस पर ही उपलब्ध हो पाती है, किंतु निजी व्यस्तता के कारण यदि विलंब हो अथ्वा रचना पोस्ट न की जा सके, तब बाल उद्यान पर आने वाले नियमित पाठकों का उत्साह कम होता है। ऐसे में आग्रह है कि जिन सदस्य मित्रों एवं पाठकों के पास 0 से 13 वर्ष के बच्चों के लिये मौलिक सामग्री है, वे इसे bu.hindyugm@gmail.com पर प्रेषित कर सकते हैं ताकि समय-समय पर उन्हें प्रकाशित किया जा सके।

रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा में - आपका अपना बाल उद्यान।


Wednesday, August 22, 2007

कुतुब मीनार और लौह स्तम्भ की सैर

आओ आज तस्वीरों से कुतुब मीनार की सैर करें । यह कुछ तस्वीरें हैं जो मैंने कुतुब मीनार की सैर के समय ली थी ।
कुतुब मीनार पत्थर से बनी हुई सबसे ऊँची मीनार है भारत में । यह दक्षिण दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्तिथ है। इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था । कुतुब मीनार की ऊंचाई ७२.५ मीटर है । इसका आधार १४.३ मीटर व्यास का है जो ऊपरी सिरे तक जाकर २.७ मीटर रह जाता है। इस स्मारक को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है।
क़ुतुब मीनार के बहुत निकट 'लौह स्तम्भ' भी स्थित है । घूमते समय यह कुतुब मीनार के परिसर में आता है । लोहे की इस स्तम्भ को चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल में बना गया था । लौह-स्तम्भ में लोहे की मात्रा करीब ९८% है और अब तक जंग नहीं लगा है जबकि इसके ऊपर कोई छ्त नहीं है । १६०० बर्षों से यह हर मौसम में यह खुले आसमान के नीचे है - चाहे गर्मी हो, जाड़ा या बरसात । है न यह अद्भुत ! इतने सालों पहले हमारा धातु-विज्ञान कितना विकसित था :) ।

पत्थर पर बहुत अच्छी नक्काशी भी देखने में बहुत आनंद आता है । कैसे बनाया होगा छेनी-हथौड़ी से शिल्पकारों ने इतनी अच्छी-अच्छी नक्काशी ?


इस स्थल पर हिन्दू और जैन मन्दिरों के अवशेष भी हैं । बगीचे और पेड़-पौधों के बीच घूमने का अच्छा स्थान भी है और साथ ही भारत के इतिहास को देखने का मौका भी ।

तो कहो, कैसी रही कुतुब मीनार और लौह स्तम्भ की सैर ?

- सीमा कुमार


Tuesday, August 21, 2007

बाल कविता ( बन्दर और मगरमच्छ)


बन्दर और मगरमच्छ



शिप्रा नदी के किनारे,
एक वृक्ष था जामुन का,
उसी वृक्ष की डाल पर,
एक घर था बंदर का॥



बंदर वृक्ष पर बैठे-बैठे,
मीठे-मीठे जामुन खाता,
कुछ जामुन मुह में जाते,
कुछ नदी में गिराता॥



उसी नदी के अन्दर,
एक मगरमच्छ रहता था,
बंदर के फ़ेंके जामुन खाकर,
दोस्त उसे वह कहता था॥






एक दिन मगर ने जाकर
कुछ जामुन पत्नी को खिलाये,
खाकर जामुन पत्नी के मुह में,
रह-रह कर पानी आये॥


बोली पत्नी मगरमच्छ से,
अपने दोस्त को घर पर लाओ
दावत है घर पर हमारे,
जाकर तुम उसको बतलाओ॥


मीठे जामुन खाने वाले का,
दिल भी कितना मिठा होगा,
सोचो तो उस दावत का,
आनंद ही कैसा होगा॥




सुनकर पत्नी की बातें,
मगरमच्छ को गुस्सा आया,
बोला खबरदार जो तुमने,
इतना घटिया विचार बनाया॥


बंदर मेरा दोस्त है प्यारा,
उससे जामुन रोज मै लाऊँ
एसा दगाबाज नही मै,
दोस्त का कलेजा खा जाऊँ॥
मुझसे प्यारा दोस्त तुम्हारा,
कहकर पत्नी ने भी बात न मानी,
मर जाने की धमकी देकर,
करने लगी अपनी मनमानी॥

हार गया मगर भी आखिर,
पत्नी के इस हठ को देख,
सोचा पत्नी का मन रखने,
देनी होगी ये परीक्षा एक॥



पत्नी का संदेशा लेकर,
चला मगर बंदर के घर,
बोला दोस्त निमन्त्रण है,
तुझे दावत का मेरे घर॥



सुनकर बंदर प्रसन्न हुआ,
बोला चलने को चल सकता हूँ
मगर तैरना आता नही,
कैसे घर तेरे चल सकता हूँ॥

बोला मगरमच्छ बंदर से,
एक तरीका है मेरे भाई,
बैठ जा पीठ पर मेरे तू,
कह कर पीठ दिखलाई॥


सुनकर बन्दर ने झट से,
पीठ पर छ्लांग लगाई,
और मगर ने उसको,
नदी की सैर कराई॥


मझधार में जा मगर ने सोचा,
दोस्त को सच्ची बात बतादूँ
पत्नी खायेगी कलेजा बताकर,
दोस्ती का हक भी जता दूँ॥


कुछ सोचकर मगरमच्छ बोला,
दोस्त सुनो राज की बात,
तुम्हारा कलेजा खायेगी
मेरी पत्नी आज की रात॥



जब सुना बंदर ने एसा,
झटका खाया मूर्ख दोस्त पाकर,
फ़िर संयत होकर बोला,
ओह्ह अच्छा किया बताकर॥


पहले कहते तो अच्छा था,
फ़िर भी चलो वापिस मुड़ जाओ,
टंगा हुआ है कलेजा पेड़ पर
जल्दी मुझको पेड़ तक पहुचाओ...



मूर्ख मगरमच्छ चला वापिस,
लेकर बंदर को अपनी पीठपर,
सोचा कितना अच्छा दोस्त है,
दे रहा कलेजा जान बूझकरे॥

पहुँच किनारे बंदर ने,
पेड़ पर छलाँग लगाई,
दो डंडे तोड़ डाल से,
कर दी मगर की पिटाई॥




बच गये मूर्ख दोस्त से,
बोलो राम दुहाई
मूर्ख दोस्त न बनाने की,
बंदर ने कसम उठाई॥








सुनीता(शानू)




Monday, August 20, 2007

कुछ मेरी चित्रकारी

मित्रों आजकल मेरी परीक्षाएं चल रही है अतः मै बाल-उद्यान के लिये कुछ कहानियाँ,कवितायें नही लिख पाया हूँ


प्रस्तुत है मेरी कुछ चित्रकला, शायद आप सभी को पसंद आयेगी-------




मैने यह चित्र अपने बड़े भैया के सहयोग से बनाया था जब मै बहुत छोटा था ।



ये है मेरी प्यारी गाड़ी जब मै बड़ा हो जाऊँगा एसी ही गाड़ी बनाऊँगा जिसमे मै अपनी माँ को डैडी और भैया को सैर कराऊँगा



ये तो हीरो है गोहान मेरा प्यारा हीरो




गोहान का पिता गोकु मुझे बहुत पसंद है


अक्षय चोटिया


Sunday, August 19, 2007

सबक..


सभी बच्चों को पता है कि खरगोश और कछुवे के बीच जो दौड़ हुई थी उसमें खरगोश हार गया था। हारने के बाद भी खरगोश नें कछुवे को चिढ़ाना नहीं छोडा। जब भी वह कछुवे को देखता तो उसपर हँसने लगता। भगवान में नें तुम्हारी पीठ की जगह पेट लगा दिया है, खरगोश, कछुवे को देखते ही कहता। कछुवा इससे बहुत दुखी हुआ और उसने खरगोश से बात करना भी छोड़ दिया।

एक दिन खरगोश एक किसान के खेत में चुपके से घुस गया। उसने खेत से एक लाल- लाल गाजर तोड़ा और कचर-कचर खाने लगा। किसान का बेटा पास ही पेड़ के नीचे सो रहा था। खरगोश की आहट से उसकी नींद खुल गयी। वह चुपके से उठा और खरगोश को चोरी-चोरी गाजर खाते देख, उसे बहुत गुस्सा आया। उसने अपनी गुलेल से खरगोश पर निशाना साधा। लेकिन खरगोश नें किसान के बेटे को गुलेल उठाते देख लिया था। खरगोश “सर पर पाँव” रख कर सरपट भागा। बच्चों हँसों मत! खरगोश नें कोई सचमुच सर पर पाँव थोडे ही रखे थे। सर पर पाँव रखना एक “मुहावरा” है जिसका मतलब होता है बहुत तेज भागना। वादा करो मुहावरा किसे कहते है आज अपनी टीचर से तुम जरूर पूछोगे।

भागते हुए, खरगोश खेत से किसी तरह बाहर निकला लेकिन पास कीचड़ भरे तालाब में गिर पड़ा। खरगोश जब दलदल में धसने लगा तो वह बहुत ड़र गया और जोर जोर से रोने लगा। उसकी आवाज सुन कर बहुत से जानवार इकट्ठे हो गये। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह खरगोश को बचाये क्योंकि दलदल बहुत खतरनाक था और बहुत से जानवर उसमें फँस कर मारे गये थे। तभी कछुवा वहाँ आया। खरगोश को इस हाल में देख कर उसे बहुत दुख हुआ, आखिर खरगोश से उसकी पुरानी दोस्ती थी। लेकिन उसने खरगोश को सबक सिखाने के लिये जोर जोर से हँसना शुरु कर दिया। खरगोश और भी जोर से रोने लगा। बोला मैं यहाँ मुसीबत में हूँ और तुम मुझ पर हँस रहे हो। लेकिन तुरंत उसे अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने कछुवे से माफी माँगी और कहा कि मुझे समझ में आ गया है कि किसी पर हँसना अच्छी बात नहीं है। कछुवा इस पर बहुत खुश हुआ और उसने खरगोश को माफ कर दिया। फिर कछुवे नें तालाब के किनारे उगे सरकंडे उखाडे और खरगोश की ओर बढाये जिन्हें खरगोश ने जोर से पकड लिया। कछुवे नें जोर लगा कर खींचा और तब खरगोश दलदल से बाहर निकल आया। खरगोश और कछुवा अब पक्के दोस्त हो गये थे।

*** राजीव रंजन प्रसाद
19.08.2007


Saturday, August 18, 2007

मेरे नन्हे दिल की यह अभिलाषा ***


मेरे नन्हे दिल की यह अभिलाषा है
कि नदिया सी कल- कल बहती जाऊँ
करके नेक काम मैं जग में
चारों दिशाओ में अपना नाम फैलाऊँ

सूरज से लूं उसकी लालिमा
चाँद सितारो को छू आऊँ
आशा का दीप जला कर हर पल
हर अंधकार को दूर भगाऊँ

पर्वत सी कठोरता हो दिल में
निर्झर झरने का प्यार लुटाऊँ
यही कामना है प्रभु मेरी तुझसे
उज्जवल अपने देश का भाविष्य बनाऊँ

मेहनत और उल्लास से झूम उठे धरती सारी
हरियाली की चाद्दर अब बंजर ज़मीन पर बिछाऊँ
कतरा -कतरा अपने लहू का लूटा अपनी भूमि पर
सागर सा विशाल,हृदय लेकर हर दिल को अपनाऊँ

रंजना [रंजू]


इस कविता को पूरा बहुत रोचक ढंग से किया गया है..
15 शब्द बच्चो को दिए थे उसको कविता में ढाल के पूरा करना था..
जैसे . अभिलाषा ,नदिया,दिशाओ ,सूरज ,चाँद ,दीप,अंधकार,पर्वत , झरने .उज्जवल,मेहनत,धरती,हरियाली
कतरा, सागर.भाविष्य
मेरी बहन के बच्चों और मैने मिल के इस कविता को पूरा किया ,इसलिए जैसी यह लिखी गई उसी रूप में इसे यहाँ दे रही हूँ:):)

यूँ हम बच्चो को विविध शब्द दे के उन में कविता या लेख लिखने का बढ़ावा दे सकते हैं बच्चे इस को बहुत ख़ुशी से करते हैं ..ज़रा आज़मा के देखिए :)






Friday, August 17, 2007

स्त्री और दाढी मूँछ

आज दो बातेँ है । पहला लोककथाएँ क्यों ? तो वह सब जो हमारे इतिहास संस्कृति और भाषा का हिस्सा है वह ज़रूर हमारे बच्चों का भी उतना ही है जितना कि हमारा ।
जातक कथाएँ ,लोककथाएँ और मिथक बच्चों के लिए बहुत विस्मयकारी होती हैं ।हमें याद है ऐसी किसी कथा को किसी बडे बूढे के मुख से सुनते हुए हमारे गोल खुले मुह और चकित आँखें हो जाया करती थीं ।आज इन लोक कथाओं से शहर के मॉलों की तरफ भागते बच्चों को ये कहानियाँ देना ज़रूरी जन पड रहा है ।दूसरी बात कहानी के बाद ।सो प्रस्तुत है एक बघेली मिथकथा ---
स्त्री और दाढी मूँछ
बहुत पहले स्त्री और पुरुषों के समान रूप से दाढी और मूँछ हुआ करती थी ।शेर उस समय भी वन का राजा था शेर को अपने लडके के लिए दुल्हन की ज़रूरत थी।उसने घोषणा कराई कि जिसकी कन्या उसकी पुत्रवधू बनेगी वह इनाम पाएगा। बकरी ने सुना, उसने अपनी मालकिन से उसके गहने माँगे ताकि सुन्दर बन कर वह शेर की पुत्रवधू बन सके। उसकी मालकिन ने गहने तो क्या दिये ,अपनी धरोहर मूँछें उसे दे दीं। वह शेर की दुल्हन बनी और फिर कभी अपनी माँद में वापस नही लौटी-तभी से स्त्रियों को दाढी मूछ से छुट्टी मिल गयी ।
{प्रस्तुति :आदित्य प्रसाद सिँह,नया ज्ञानोदय ,अक्तूबर 2006}
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दूसरी बात ।इस कहानी से हमे क्या शिक्षा मिली ? सबसे पहले तो यही कि कहानी सुना कर यह अपेक्षा करना कि इसके पीछे कोई सीख होगी ही और जिसे बच्चों को बताना और समझाना ज़रूरी है ;अपने आप में एक गलत प्रवृत्ति है।कहानी खुद बहुत कुछ बोलती है ।भाषा स्वयम अपनी संरचनाओं मेँ छुपे सत्य तक पहुँ चने का रास्ता बताती है ।जब हम बडे कहानी सुना कर कोई व्यव्हारिक बुद्धि बच्चों को देना चाहते हैं तो कहानी को खत्म कर रहे होते हैं ।बच्चे की वह सहज सी जिज्ञासा –जिसमें वह कहानी के बाद हमसे कई सवाल पूछेगा जैसा कि ढेला और पत्ती पढ कर राजीव रंजन जी की बिटिया ने पूछे – उस सहज जिज्ञासा को हम कहानी का सन्देश सुना कर नष्ट कर देते हैं ।कहानी साहित्य की विधा नही रह जाती और न मनोरंजन की ही और न ही समाज व परिवेश की । बच्चे की जिज्ञासा ही कहानी को आगे बडाती है और यही जिज्ञासा बडे बडॆ सत्यों और दर्शन तक पहुँचाती है ।कहानी में बच्चा हमेशा कहता है—फिर ?- और बाद में कहता है- क्यों?
इन सवालों के उठने से पहले ही हम उनका शमन कर देते हैं ।
सो बच्चों के लिए कहानी सीख देने का ज़रिया मत बनाइए । उसे कहानी से मत उबाइए ।कहानी के जीवन और कल्पना को ,परिवेश और मिथ को उसे स्वयम डीकोड करने में मदद करिये ।


बच्चे और तुकबंदी..


नोटपैड (सुजाता जी) किसी कार्यवश व्यस्त हैं और वे अपनी पोस्ट शाम के पाँच बजे के पश्चात ही कर पायेंगी। इस अवसर का लाभ यह सोच कर मैंनें उठा लिया कि खाली समय में पाठकों से थोडी चर्चा ही हो जाये।

बच्चे स्वाभाविक कवि होते हैं। आप बच्चों के सम्मुख गुनगुना भर दीजिये, फिर देखिये कैसे आपका नन्हा मुन्ना या नन्ही मुन्नी अनगढ शब्दों को गढ गढ कर तुक मिलाती है। तुकबंदी असाधारण कला है और इसे परिष्कृत करने का दायित्व है माता-पिता और अध्यापकों का। तुकबंदी साधारण सी और प्यारी लगने वाली प्रकृया होते हुए भी चमत्कृत करने वाले परिणाम दे सकती है, यदि आपके बाल-गोपाल का उसमें मन रम जाये। यह मानसिक विकास में भी सहायक है। कल्पना शक्ति और बच्चों की तुकबन्दी का गहरा रिशता है। एक उदाहरण देखिये। यह कविता मेरी बेटी कुहू कि अपनी तुकबंदी है जो माता-पिता से उसके स्वाभाविक नोकझोंक की परिणति थी:

कुहू:

सबसे प्यारे मेरे पापा
सबसे अच्छी मेरी मम्मी

पापा:

मुझे पढाते मुझे हँसाते
मिलकर लेते मेरी चुम्मी


पापा:

जब मैं बडी हो जाऊंगी
डाक्टर बन कर दिखलाउंगी

कुहू:

पापा को दवाई खिलाउंगी
मम्मी को सूई लगाउंगी
बच कर रहना मुझसे पापा
बच कर रहना मुझसे मम्मी

यह सामान्य तुकबंदी जुडते हुए एक सुन्दर कविता बन गयी। इस कविता से मेरी बिटिया का रुझान तुकबंदी की ओर इस तरह बढा कि वह चार वर्ष की छोटी सी उम्र में छोटी-छोटी कवितायें गढ लेती है। चाहे उसके गढे शब्दों के कुछ अर्थ निकलते हों अथ्वा नहीं किंतु वे अनमोल हैं।

मित्रों बच्चों को समय दें। उनके भीतर की कल्पना को पंख प्रदान करना आपका दायित्व है। तुकबंदी मजेदार खेल है बच्चों के साथ जरा खेल कर तो देखें :)

*** राजीव रंजन प्रसाद


Thursday, August 16, 2007

मैं प्यार सभी को दूंगा




निश्चय रहा अब मेरा
आदर्श विद्यार्थी बनूंगा
सब लोगों का प्यारा बनकर
मैं प्यार सभी को दूँगा

हिस्से की जिम्मेदारियाँ
मैं हमेशा निभाऊंगा
हो जाने पर ही पूरा
काम मैं दम लूंगा

समय की कद्र करना
मैं कभी नहीं भूलूंगा
सब लोगों का प्यारा बनकर
मैं प्यार सभी को दूँगा

तुषार जोशी


Wednesday, August 15, 2007

आओ बच्चो हम चित्र बनाना सीखें

भला चित्र बनाना किसे अच्छा नही लगता। पैंसिल, कागज और रबर हाथ में हो तो चित्र बना कर किसी को भी अपनी कला से सम्मोहित किया जा सकता है। अपने मित्रों व सबंधियों को उनके जन्मदिन पर ग्रीटिंग कार्ड बना कर दिया जा सकता है। आज हम एक पक्षी बनाना सीखेंगे।


पक्षी बनाने के लिये सबसे पहले हम एक गोला बनायेंगे जो पक्षी का शरीर बनायेगा -



उसके बाद उस गोले के ऊपर एक और गोला बनायेंगे जो कि पक्षी का सिर बनेगा -


अब हम पक्षी की चोंच और उस की पूंछ बनायेंगे, जैसा नीचे चित्र में दिखाया गया है -


अब हम पक्षी के पंख बनायेंगे जो कि नीले रंग से दिखाये गये हैं -


अब हम कुछ लाईनो को जो जरूरी नहीं है और लाल रंग से दिखाई गयी हैं मिटा देगें और कुछ और लाईन जोडेगे जो कि नीले रंग से दिखाई गयी हैं -




अब हमारा पक्षी रंग भरने के लिये पूरा तैयार है और ऐसा दिखाई देगा -


अब आप उस में मन चाहे रंग भर सकते हैं... मैने जो भरे हैं उस में पक्षी ऐसा दिखाई देता है -


आप भी कोशिश करके बडी आसानी से इसे बना सकते हैं|
अगली कडी में हम एक और चित्र बनाना सीखेंगे|


Wednesday, August 1, 2007

फूल मुस्कारने लगे

Photo Sharing and Video Hosting at Photobucketहर दोपहर बच्चे स्कूल से आ के एक बाग़ीचे में खेलते....वो बाग़ एक राक्षस का था| कई महीनों से वो अपने दोस्त के घर गया था सो बच्चों की मौज़ बन आई और वो वहाँ जा के खेलते यहाँ कई फूल थे पेड़ थे जो वसंत आते ही खिल जाते ख़ूब फल लग जाते पक्षी इन पर आ के चहचाहते और बच्चे उनके साथ मिल कर गीत गाते|

एक दिन राक्षस वापस आ गया| वो ज़्यादा बोलता नही था पर ग़ुस्सा बहुत करता था। उसने जब बच्चों को वहाँ खेलते देखा तो उसको ग़ुस्सा आ गया।Photo Sharing and Video Hosting at Photobucket उसने कहा यह बाग़ीचा मेरा है यहाँ से भाग जाओ, यहाँ फिर आए तो मैं तुम सब को मार दूँगा। गंदा राक्षस कह कर बच्चे वहाँ से डर के भाग गये।

बेचारे बच्चे अब कहाँ खेलते? उनके पास कोई जगह ही नही बची। वो सड़क पर खेलते तो वहाँ उनको डर लगता की कोई कार उनको मार ना दे। सब एक-दूसरे से कहते की हम सब कितने ख़ुश थे वहाँ। फिर वसंत ऋतू आई, सब जगह फूल खिले पर राक्षस के यहाँ वसंत नही आया। वहाँ सर्दी थी अभी भी, पेड़-फूल खिलना भूल गये। एक बार एक सुंदर फूल ने घास से सिर बाहर निकाला परन्तु जैसे ही देखा की यहाँ कोई बच्चा नही है वो दुबारा ज़मीन के नीचे जा के सो गया। राक्षस को सर्दी से बहुत नफ़रत थी। वह ओलो, बर्फ़ और ठंडी हवा से बहुत तंग हो जाता।Photo Sharing and Video Hosting at Photobucket
सिर्फ़ ख़ुश थे तो बर्फ़ और पाला की वसंत इस बाग़ को भूल गयी, अब हम यहाँ रहेंगे। उसने सफ़ेद बर्फ़ की चादर से सब ढ़क दिया उधर वो राक्षस बहुत परेशान था की वसंत क्यूं नही आया उस के बाग़ में। Photo Sharing and Video Hosting at Photobucketवो उदास एक दिन अपने बिस्तर पर लेटा था की उस को एक मीठे से गाने की आवाज़ आई। उसने बाहर जा के देखा तो एक चिड़िया गाना गा रही थी। उसको बहुत अच्छा लगा। आख़िर उसके बाग़ में वसंत आ ही गया। तभी उसने देखा की उसके बाग़ की दीवार में एक बड़ा सा छेद है और सब बच्चे वहाँ से अंदर आ गये हैं, फूल खिल गये, पेडो पर फल लग गये हैं। सिर्फ़ एक कोने मैं अभी भी सर्दी थी। वहाँ एक छोटा सा बच्चा खड़ा था। वो पेड़ पर चढ़ नही पा रहा था। राक्षस ने मन में सोचा की मैं भी कितना गंदा हूँ, स्वार्थी हूँ, बच्चो को क्यू रोका मैने यहाँ आने से। Photo Sharing and Video Hosting at Photobucketउसने उस छोटे बच्चे को उठाया और पेड़ पर बिठा दिया। वो कोना भी फूलों से महक उठा। उस छोटे से बच्चे ने उस राक्षस को प्यार किया तो ख़ुश हो गया और बोला -

"बच्चू! आज से यह बाग़ तुम्हारा है, तुम हर वक़्त यहाँ खेल सकते हो"

वो अब हर मौसम से प्यार करता, सर्दी से भी, क्यूं की वो जानता था की सोई हुई वसंत ऋतू ही सर्दी होती है, उस वक़्त फूल आराम करते हैं और वसंत तभी आता है जब फूल जैसे बच्चे मुस्कराते हैं गाते हैं।[आस्कर वाइल्ड]