Friday, August 24, 2007

दो पहेलियाँ



शेर की है ये मौसी,
पर उससे खूब छोटी,
चुपके से घर पर आये
सारा दूध झट पी जाये,
चूहे इससे डरकर भागे,
क्योकी ये उनको खा ले,
बूझो करु मैं बात किसकी ?
बिल्ली मौसी,बिल्ली मौसी |



दिन मे छूप जाये कहीं,
ढूंढो तो दिखता ही नहीं,
रोज़ रात को वो आता ,
साथ अपने सितारे लाता ,
कभी नज़र आये आधा ,
कभी पूरा गोल हो जाता,
कौन है वो जरा नाम बताना ?
नहीं मालूम ? चंदा मामा |


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7 पाठकों का कहना है :

रंजू का कहना है कि -

:) मजेदार हैं यह पहेलियाँ कुछ और होती तो ज्यादा मज़ा आता ..शुभकामनाये

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

ऋषिकेश जी,

पहेली से अनूठी विधायें कम ही हैं। पहेली लिखना कविता भी है और बच्चों की ज्ञिज्ञासा को सकारात्मक और कल्पना की उडान देने का अप्रतिम माध्यम भी। आज पहेलियाँ कम ही लिखी जा रही हैं। आपकी दोनो ही पहेलियाँ प्रसंशनीय है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Seema Kumar का कहना है कि -

बहुत अच्छी हैं पहेलियाँ ।

कृपया 'खुब' को ठीक कर 'खूब' कर लें ।

- सीमा कुमार

shrdh का कहना है कि -

bachpan lout aaya hai sachi main maja aa gaya padh kar

rishikesh ji aapka ye rang bhaut achha laga

shobha का कहना है कि -

वाह ऋषिकेश जी
आप तो बाल जगत में भृपूर आनन्द उठा रहे हैं ।
बच्चों की दुनिया होती ही कुछ ऐसी है । सस्नेह

ऋषिकेश खोङके "रुह" का कहना है कि -

पाठको से मिल रही प्रतिक्रिया पढ कर अच्छा लग रहा है , बाल उधान के समस्त सहयोगी कवियो से प्रतिक्रिया की आशा कर रहा हूं

उर्मिला का कहना है कि -

ऋषिकेश जी,

अच्छा लिखा है, हमे पसंद आया।

कॄपया ऐसे ही लिखते रहें।

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