Thursday, January 15, 2009

हितोपदेश-१२ साधु की पुत्री


किए थे उसने पुण्य अनेक
करता रहता प्रभु की भक्ति
अद्भुत थी उस साध की शक्ति
पर न थी उसकी सन्तान
साधवी समझे यह अपमान
एक बार इक नदी के तीर
साधु बैठा था गम्भीर
कौआ इक उड़ता हुआ आया
मुँह में चुहिया को दबाया
चुहिया उसके मुँह से छूटी
आ के गिरी साधु की गोदि
साधु का हृदय गया भर
ले आया उसे अपने घर
लड़की उसे जादू से बनाया
और पत्नी के सामने लाया
बेटी मान के उसको पाला
हो गया जीवन मे उजाला
इक दिन बेटी हुई स्यानी
अब साधु ने मन मे ठानी
क्यों न उसका ब्याह रचाए
कन्यादान से पुण्य कमाए
वही बनेगा इसका वर
होगा जो सबसे ताकतवर
सोच के गया सूर्य के पास
बोला मेरी बेटी खास
तुम दुनिया में सबसे महान
और मेरा यह है अरमान
मेरी सुता से ब्याह रचाओ
उत्तम वर उसके बन जाओ
लिया सूर्य ने सबकुछ जान
बोला मैं नही हूँ महान
चाँद ज्यो ही नभ में आए
तो वो मुझको दूर भगाए
चाँद ही है वो उत्तम वर
बोलो तुम उससे जाकर
आया साधु चाँद के पास
बोला मेरा करो विश्वास
तुम ही हो वह उत्तम वर
बसाओ मेरी सुता संग घर
सुनकर चाँद ने यूँ फरमाया
उत्तम बादल को बताया
बादल जब नभ में छा जाएँ
तो वो मुझको भी ढँक जाएँ
जाओ तुम बादल के पास
वही होगा उसका वर खास
बादल पास अब आया साधु
बोला तुममे गजब का जादू
तुम ही तो हो सबसे महान
मेरी सुता का करो कल्याण
ठीक हो तुम बादल यूँ बोला
सकुचा के अपना मुँह खोला
मुझसे बड़ा तो पर्वत राज
उसके सिर ही सजेगा ताज
जब भी मैं उससे टकराऊँ
खाली होकर वापिस आऊँ
अब साधु-पर्वत के पास
बोला तुम तो सबसे खास
मेरी पुत्री को अपनाओ
जीवन उसका सफल बनाओ
सुनकर पर्वत कुछ ललचाया
पर साधु को यूँ फरमाया
मुझसे बड़े है चूहे राज
पहनाओ उसके सिर ताज
चीर के रख दे मेरा सीना
मुश्किल कर दे मेरा जीना
बड़ी-बड़ी जो बिल बनाए
तो कोई कुछ न कर पाए
साधु को बात समझ मे आई
चूहे को जा दी दुहाई
थाम लो मेरी सुता का हाथ
दो जीवन भर उसका साथ
बेटी को फिर चुहिया बनाया
चूहे-चुहिया का ब्याह कराया
...................
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बच्चो कभी न जाना भूल
नहीं छूटे कभी अपना मूल
इक दिन अपना रँग दिखाए
चाहे कोई कितना भी भरमाए
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चित्रकार-मनु बेतख्लुस जी


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6 पाठकों का कहना है :

Udan Tashtari का कहना है कि -

रोचक एवं प्रेरणादायक!!

शोभा का कहना है कि -

बहुत सुन्दर। कथा काव्य में आपका मुकाबला नहीं। बहुत सुन्दर और ग्यानवर्धक कथा के लिए बधाई।

संजीव सलिल का कहना है कि -

काव्य रूप देकर किया, है स्तुत्य प्रयास.
सम वजनी हों पंक्तियाँ. तो बढ़ सके मिठास.

मात्र लय का भी रखें, ध्यान तनिक सायास.
बच्चे अनुभव कर सकें, पढ़-गा अधिक हुलास.

neelam का कहना है कि -

बच्चो कभी न जाना भूल
नहीं छूटे कभी अपना मूल
इक दिन अपना रँग दिखाए
चाहे कोई कितना भी भरमाए
कविता तो बहुत अच्छी है , इसमे मनु जी के चित्रों ने तो और भी चार चाँद लगा दिए दिये हैं |

Anonymous का कहना है कि -

bahut achhi kavita hai . jab chhota tha to kahani ke roop mein padhi thi
-raman

rachana का कहना है कि -

शब्द जो आपने दिए रंग जो मनु जी ने दिए दोनों का संगम लाजवाब है
बहुत खूब
सादर
रचना

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