Friday, December 12, 2008

हितोपदेश -8 लालची ब्राह्मण और चीता

प्यारे बच्चो
इससे पहले मैंने आपको हितोपदेश की कुछ कहानियाँ सुनाई, जिनको आपने कभी मन से तो कभी बुझे मन से पढ़ा। शायद उपदेश सुनना अच्छा नहीं लगता न इसी लिए। तो हमने इसे काव्य-शैली मे लिखा कि आप उपदेश भी आसानी से सुन सको। इन को अगर आप अच्छे से पढ़ोगे तो हर कहानी में अपने हित में छुपा हुआ संदेश मिलेगा, जिसे हम अपने जीवन मे अपना कर बहुत सारी दुविधाओं और मुश्किलों से बच सकते हैं। इसी लिए तो इसका नाम ही हित+उपदेश ( हितोपदेश ) है। यह कहानी पढ़ के जरूर बताना कि आप को कैसी लगी फिर मैं आपको घुमाने भी ले जाऊँगी। तो आप सब तैयार हैं न मेरे साथ घूमने के लिए तो अगली बार चलते है, अब सुनो हितोपदेश का कथा-काव्य-


लालची ब्राह्मण और चीता

एक बार था एक ब्राह्मण
घूमने-फिरने को हुआ मन
हाथ मे पकड़ लिया एक थैला
चल पड़ा वो घर से अकेला
मार्ग में आया घना वन
डर गया ब्राह्मण मन ही मन
पर फिर खुद को ही समझाया
मन पक्का कर कदम बढ़ाया
पहुँचा अभी थोड़ी ही दूर
देखा चीता एक क्रूर
बैठा था तालाब के कूल
खिले वहाँ पर थे कुछ फूल
चीते ने ब्राह्मण को बुलाया
और अपना सब हाल सुनाया
देखो मैं हूँ बूढ़ा चीता
घास और पत्तों पे जीता
दाँत नहीं हैं मेरे पास
नहीं खा सकता हूँ अब मास
खोया मैंने सब परिवार
छूट गया सारा घर-बार
किए है मैंने बहुत ही पाप
शायद वही बन गए शाप
अब न रही है मुझमें शक्ति
करता हूँ बस प्रभु की भक्ति
करता रहता हूँ पुन्न-दान
ताकि मेरा हो कल्याण
मेरे पास सोने का कंगन
और तुम दिखते हो ब्राह्मण
करो जो तुम इसको स्वीकार
तो मेरा होगा उद्धार
कहकर कङ्गन भी दिखाया
और ब्राह्मण का मन ललचाया
लेने को आगे हाथ बढ़ाया
पर चीते ने फिर फरमाया
देखो तुम ब्राह्मण हो ज्ञानी
बात है सच्ची जानी-मानी
किया नहीं है तुमने स्नान
ले सकते हो कैसे दान
देखो इस तालाब का जल
पहले हो जाओ तुम निर्मल
आया ब्राह्मण को ध्यान
बोला करेगा वो स्नान
कहकर यह तालाब में उतरा
आया अब प्राणों पे खतरा
बातों में ब्राह्मण गया फँस
गया वो अब कीचड़ में धँस
अब चीते को मिल गया मौका
और ब्राह्मण को दे दिया धोखा
पकड़ के उसको मार गिराया
और फिर बड़े मजे से खाया
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बच्चो तुम सबको समझाना
लालच में कभी न आना
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5 पाठकों का कहना है :

विवेक सिंह का कहना है कि -

अच्छी कहानी .

तपन शर्मा का कहना है कि -

ऐसी न जाने कितनी ही कहानियाँ भूल चुका हूँ। याद दिलाने का धन्यवाद सीमा जी.

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत पहले ये कहानी अपनी संस्कृत की पाठ्य पुस्तक में पढी थी आज फिर याद ताजा करा दी आपने उन बीते दिनों की..

बहुत ही बढिया हितोपदेश...
बहुत बहुत धन्यवाद

sahil का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर कहानी.
आलोक सिंह "साहिल"

संजीव सलिल का कहना है कि -

पढी कहानी, रुची भी, पाठ रहेगा याद.
जो लालच ज्यादा करे, वह होता बर्बाद.

विप्र देवता स्वर्ण लख, भूल गए यह सत्य.
जीव न तजे स्वभाव निज, तजे न अपने कृत्य.

'सलिल' सीख यह रखेगा, सकल जिन्दगी याद.
कपटी कितनी भी करे, सुनो नहीं फरियाद.

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