Monday, December 22, 2008

मोर

मोर
जब छाएँ बादल घनघोर
देखो रँग-बिरँगा मोर
अपने सुन्दर पँख फैलाकर
नाचे यह कैँ-कैँ-कैँ गाकर
लम्बी पूँछ यह जब फैलाए
चाँद सा इक आकार बनाए
पूँछ पे इसकी सुन्दर सितारे
लगते कितने प्यारे-प्यारे
सुन्दर सी कलगी है सिर पर
नाचे जब यह पँख फैलाकर
देख के बच्चे खुश हो जाएँ
आओ मिलकर नाचेँ-गाएँ

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पाठक का कहना है :

तपन शर्मा का कहना है कि -

आजकल शहरों में मोर दिखते ही कहाँ हैं... :-( आज के बच्चे केवल चित्र और कविता/कहानी के द्वारा ही मोर को समझ सकते हैं...
आपने अच्छे से समझाया सीमा जी.

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