Friday, December 5, 2008

गिलहरी का घर


एक गिलहरी एक पेड़ पर
बना रही है अपना घर
देख-भाल कर उसने पाया
खाली है उसका कोटर|


कभी इधर से, कभी उधर से
कुदक-फुदक घर-घर जाती,
चिथड़ा-गुदड़ा, सुतली, तागा
ले जाती जो कुछ पाती |

ले जाती मुँह में दाबे
कोटर में रख-रख आती,
देख बड़ा सामान इकट्ठा
किलक-किलककर वह गाती |

चिथड़े-गुदडे, सुतली, धागे --
सब को अन्दर फैलाकर,
काट कुतरकर एक बराबर
एक बनाएगी बिस्तर |

फिर जब उसके बच्चे होंगे
उस पर उन्हें सुलायेगी ,
और उन्हीं के साथ लेटकर
लोरी उन्हें सुनाएगी


--हरिवंशराय बच्चन


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2 पाठकों का कहना है :

devendra का कहना है कि -

कविता पढ़कर मगन हुआ!
चौंका कि हिन्दयुग्म पर
किस महाकवि का आगमन हुआ!
"हरिवंश राय बच्चन" पढ़कर
ठहरी सांस लगी चलने!
'नीलम जी' के इस चुनाव पर
क्या कहने, भई क्या कहने!
इस प्रयास की जितनी तारीफ करूँ कम है
बच्चों को जीना सिखला दे
इस कविता में इतना दम है।
--देवेन्द्र पाण्डेय।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

नीलम जी,

हरिवंश राय बच्चन की बाल-कविताएँ भी उनके शेष साहित्य की तरह उम्दा हैं। यह उपलब्ध कराकर आप बहुत नेक काम को अंज़ाम दे रही हैं।

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