Wednesday, September 30, 2009

दो एकम दो दो दूनी चार



दो एकम दो
दो दूनी चार
जल्दी से आ जाता
फिर से सोमवार ।

दो तीए छ:
दो चौके आठ
याद करो अच्छे से
अपना-अपना पाठ ।

दो पंजे दस
दो छेके बारह
आओ मिल कर बने
एक और एक ग्यारह

दो सत्ते चौदह
दो अटठे सोलह,
जिद नहीं करना
बेकार नहीं रोना

दो नामे अट्ठारह,
दो दस्से बीस,
करना अच्छे काम,
देंगें मात-पिता आशीष ।

--डॉ॰ अनिल चड्डा


Tuesday, September 29, 2009

बचपन के वह दिन

शन्नो जी, हमारी बाल-उद्यान की मॉनिटर हैं, आज वो हम सबके लिए लायी हैं, अपनी बचपन की यादें, बताना मत भूलिएगा कि किस-किस को क्या याद आया इस कविता को पढ़ कर -

'बचपन के वह दिन'

आज अचानक लगी खींचने उस बचपन की डोर
कहा चलो चलते हैं हम अपने अतीत की ओर।

मस्त सुहाने दिनों ने ली तब फिर से अंगड़ाई
मन में शोर उठा और यादें सजीव हो आयीं।

गुजर गया पर भुला न पाये बचपन का मौसम
जीवन में कुछ क्षण आते हैं खो जाते उनमें हम।

तो चलो आज ले चलती हूँ मैं सबको अपने साथ
बचपन की उस दुनिया की करने को कुछ बात।

पिछवाड़े के आँगन में था नीम का पेड़ बड़ा सा
निमकौरी से भरा-भरा और जहाँ पड़ा झूला था।

शीतल छाया में बैठें सब और कुँआ था उसके पास
पेड़ पपीते और अनार के और हवा में भरी सुवास।

कुछ पेड़ भी थे अमरूदों के उनमें थी बड़ी मिठास
कुएँ का शीतल जल था अमृत लगती थी जब प्यास।

कौवों की कांव-कांव छत पर आँगन में गौरैयाँ फुदके
डालो दाने चावल के तो वह खाती थीं सब मिलजुल के।

फूल-फूल मंडराएं तितली चढ़ें गिलहरी पेड़ों पर
शाम की बेला में आ जाएँ गायें वापस फिर घर पर।

पात-पात और डाल-डाल को चूमें समीर जब प्यारा
रात की रानी और बेला से तब महके आँगन सारा।

सुबह-सुबह झरने लगते थे हरसिंगार के फूल
भरी दुपहरी में थे उड़ते पत्ते और उनके संग धूल।

जितनी बार छुओ उसको तो छुईमुई शर्मा जाती
पेडों पर लिपटे गुलपेंचे की बेल सदा ही इतराती।

गुलाबास के पेड़ भी थे उस घर की क्यारी में
लाल, गुलाबी फूलों से आँगन लगता था सजने।

जब पड़ोस के पेड़ पर जामुन के फल आ जाते थे
चढ़कर छत पर हम सब जामुन तोड़ के खाते थे।

करी शिकायत किसी ने तो माँ डंडा लेकर आती थी
डांट-डपट कर कान खींचकर वापस वह ले जाती थी।

इन यादों में है एक दादी जो प्यार से हमें बुलाती थी
पिला के ठंडा शरबत हमको मीठे आम खिलाती थी।

घर के पीछे थी पगडंडी जो जाती थी बागों की ओर
कोयल करे कुहू-कुहू जब पेडों पर आ जाता था बौर।

दूध-जलेबी या हलवा खाकर हम सब जाते थे स्कूल
झाड़ बेर के रस्ते में थे और तालाबों में कमल के फूल।

पानी जब सावन में बरसे छा जाएँ घनघोर घटाएँ
उछल-कूदकर नाचें हम और कागज़ की नाव चलायें।

होली पर खेलें रंग की पिचकारी चेहरे पर मलें गुलाल
पांख लगाकर कहीं उड़ गये जीवन के वह सब साल।

एक सपने सा था वह जीवन और बचपन का संसार
महक प्यार की जिसमें थी और आँगन में सदा बहार।


शन्नो अग्रवाल


Monday, September 28, 2009

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी, बड़ी सयानी,
खाती है बस दाना-पानी,
चुपके से है आ जाती,
दाना चुगती, फुर्र उड़ जाती।

छोटा सा तो पेट है इसका,
सिर, पर, पैर भी छोटे से,
ज्यादा भूख नही लगती है,
होती गुजर है थोड़े से।

चुपके से ये बैठे आ कर,
दाने की बस ताक में रहती,
इक-इक दाना मुँह में डाले,
फुदक-फुदक है कूदा करती।

तिनका-तिनका करे जमा ये,
बनता घोंसला तब है जा कर,
देखो कितनी मेहनत करती,
थोड़ा सा ही दाना खा कर।

अंडों से बच्चे जब निकलें,
उनके लिये बचा कर रखती,
पेट भरे थोड़ा सा अपना,
बच्चों का है पेट भी भरती।

करे कभी न तंग किसी को,
अपने काम में रहे मगन ये,
चिड़िया की भाँति तुम बच्चो,
सभी काम तुम करो लगन से।

--डॉ॰ अनिल चड्डा


Sunday, September 27, 2009

शरद तैलंग की बाल कविताएँ उन्हीं की आवाज़ में

बच्चो,

आज रविवार-विशेष में हम आपके लिए लेकर आये हैं शरद तैलंग की तीन कविताएँ। तीनों को आप पढ़ भी सकते हैं और सुन भी सकते हैं।

(1) मेरी कितनी माताएं हैं?



माँ मुझको इक बात बताओ,
मेरी कितनी माताएं हैं?
तुम कहतीं भारत माता है,
सब कहते धरती भी माता,
गैया को भी समझें मैया,
देवी लक्ष्मी भी हैं माता।

सीता मैया, माँ अनुसुइया,
दुर्गा माता सिंह वाहिनी,
करुणामयी मदर टेरेसा,
माँ सरस्वती विद्या दायिनी।

माँ मुझको यह भेद बताओ,
मेरी कितनी माताएं हैं?

माँ बोली - सुन मेरे बेटे!
अपने बच्चों पर जिसने भी,
खुद दु:ख सह कर प्यार लुटाया,
पुत्र समान सभी भक्तों को,
जीवन का इक पाठ पढ़ाया,

सत्य अहिंसा की राहों पर,
जिसने चलना है सिखलाया,
दीन दुखी की सेवा करना,
अपने बच्चों को बतलाया-

वे सब तेरी माताएं हैं,
वे सब तेरी माताएं हैं।

(2) गधे की समस्या



दु:ख से पीडित गधा एक दिन,
पहुँचा ब्रह्मा जी के पास,
मुँह लटका कर खड़ा हो गया,
चेहरा भी था बहुत उदास।

बोला- जग में जो मूरख हैं,
कामचोर या हैं अज्ञान,
गधा उन्हें सब कहते हैं प्रभु!
यह तो मेरा है अपमान।

या तो मेरा नाम बदल दें
या फिर दे दें उन्हें सज़ा,
उनकी इस औछी हरकत पर,
आप चखा दें उन्हें मज़ा।

ब्रह्मा जी बोले - ऐसे जन,
इस धरती पर होते भार,
सच्ची मेहनत करने वालों
को जो समझें निपट गंवार।

नाम वाम में क्या रक्खा है,
यदि हों जिसके अच्छे काम,
इस जग में उस प्राणी का ही,
सबसे ऊँचा होता नाम।

(3) हे प्रभु कर दो यह उपकार!



एक दिवस सारे पशु पक्षी पहुँचे अपने राजा पास,
शेर ने उनके चेहरे देखे मुर्झाए थे और उदास।

सबसे पहले हाथी ने कागज़ का एक पुलिन्दा खोला,
फिर राजा के सम्मुख रख कर भरे गले से यूं कुछ बोला-

इंसानों के अत्याचारों के विरोध में मांग हमारी,
हमको भी अपने बचाव की करनी होगी कुछ तैयारी।

इसीलिए हम सब आए हैं इसी बात को देने तूल,
जंगल में भी हम निरीह पशुओं के लिए खुले स्कूल।

हमें सिखाया जाए बचना आग उगलती गोली से,
कैसे करें सामना हम सब किसी शिकारी टोली से।

उन सब की बातों को सुनकर शेर तनिक गम्भीर हुआ,
मन ही मन कुछ लगा सोचने किंचित नहीं अधीर हुआ।

कहा शेर ने- साथी ! यह संकट तब तक न होगा हल,
जब तक मानव के दिल से हिंसा की बात न जाए टल।

आओ हम सब करें प्रार्थना - हे प्रभु ! कर दो यह उपकार,
मानव के दिल में उपजा दो, पशुओं के प्रति असीम प्यार।

---शरद तैलंग


Saturday, September 26, 2009

टर्की और बैल



आओ पहले इस चिड़िया के बारे में बता दूं. टर्की एक बड़ी और मोटी चिडिया होती है जो जमीन पर ही चलती है और उड़ नहीं पाती. यह चिडिया इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देशों में पायी जाती है. और 25 दिसम्बर को क्रिसमस के दिन वहां के लोग इसे पकाकर खाते हैं, ऐसा वहां के लोगों में रिवाज है. हमारे यहाँ भारत में होली - दीवाली पर हम लोग तरह-तरह के पकवानों के साथ पूरी कचौरी भी बनाते हैं वैसे ही वह लोग खाने में तरह-तरह की चीजें बनाते हैं पर उस दिन ख़ास तौर से खाने में टर्की की प्रमुखता रखी जाती है.
अब कहानी भी सुनिये:

तो एक टर्की कहीं पर एक बैल से बातचीत कर रही थी. और बातों-बातों में एक पेड़ को देखकर बोली, ''मेरा बहुत मन करता है की मैं इस पेड़ की सबसे ऊंची डाली पर जाकर बैठूं, लेकिन मुझमे इतनी ताकत नहीं है की मैं उड़ सकूं.'' इसपर बैल बोला, ''मेरा कहना मानो तो तुम अगर मेरा चारा खाओ तो तुममें ताकत आ जायेगी, क्यों की इसमें बहुत पौष्टिक तत्व हैं.'' टर्की ने कुछ सोचा और फिर कुछ चारा खाया और उसे कुछ ताकत महसूस हुई तो फिर वह पेड़ की नीचे वाली टहनी पर जाकर बैठ गयी. अगले दिन उसने थोड़ा और चारा खाया तो और ताकत आई और वह पिछली वाली टहनी से भी ऊंची एक टहनी पर जाकर बैठ गयी. इस तरह रोज-रोज चारा खाकर उसमें इतनी ताकत आ गयी की पंद्रह दिन बाद वह पेड़ की एक सबसे ऊंची शाखा पर जा बैठी. और ठाठ से बैठ कर गर्वित होते हुये इधर-उधर देखने लगी. इतने में एक शिकारी उधर से गुज़रा बन्दूक हाथ में लिये हुये और तुंरत ही उसने टर्की पर गोली चला दी. टर्की छटपटाकर नीचे आ गिरी और मर गयी.

इस कहानी का भी अभिप्राय यह है बच्चों की किसी के कहने पर किसी तरह कहीं पहुँच भी गये तो कितनी देर टिक पाओगे वहां पर. इस बात पर भी गौर करना चाहिये. टर्की ऊपर पहुँच तो गयी पेड़ पर लेकिन शिकारी के हाथों से न बच सकी. है ना?


Thursday, September 24, 2009

राजा की वज़ीर- 3

दूसरे भाग से भाग

भाग-3

अगली सुबह ही राजा ने अपने सिपाहियों को पानी वाली औरत के पास भेजे और राज-दरबार में उसे बुलाया। जैसे ही वह औरत राजा के सामने पहुँची तो सामने राजा के रूप में अजनबी को देख कर अवाक रह गई। कल वाली सारी घटना उसके दिमाग में घूमने लगी-
अरे! यह तो वही अजनबी है जिसको मैंने कल कुएँ पर पानी पिलाया था और उसी के सामने न जाने राजा के बारे में कितना बुरा भला भी कहा था। अवश्य ही मुझे मेरी बात पर राजा द्वारा दण्ड दिया जाएगा। मन ही मन वह विचारने लगी।
राजा ने उसे देखते ही पूछा-
"क्या तुम हमें पहचानती हो?"
"जी महाराज" ( औरत हाथ जोड़कर सिर झुकाए खड़ी थी )
"तुमने कितनी बार हमें देखा है"?
"जी एक बार" ( औरत कंप-कंपाती हुई आवाज में बोली )
"क्या तुम जानती हो कि हमने तुम्हें दरबार में क्यों बुलाया है"?
"जी महाराज।"
"क्या तुम मानती हो कि तुमने कोई अपराध किया है"?
"जी महाराज"
"तो तुम यह भी मानती हो कि तुम्हें उस अपराध का दण्ड मिलना चाहिए"?
"जी नहीं महाराज"।
"क्यों? जब अपराध किया है तो उसका दण्ड तो अवश्य भुगतना पड़ेगा"।
महाराज! मैंने हुजूर के खिलाफ़ बोलने की गुस्ताखी अवश्य की है लेकिन ऐसा कुछ गलत नहीं कहा जिसके लिए मुझे दण्डित किया जाए। (औरत ने पूरे आत्म-विश्वास के साथ कहा) अगर आप एक सच्ची बात को मेरा अपराध मानते हैं तो मैं उसके लिए कोई क्षमा नहीं मागूँगी और आप मुझे जो सजा देंगे वो मुझे मंजूर होगी"।
"एक बार सोच लो, हम तुम्हें जो सजा देंगे तुम्हें भुगतनी पड़ेगी।"
"सोच लिया महाराज"।
"तो तुम्हारे अपराध दण्ड स्वरूप हम तुम्हें अपना वजीर घोषित करते हैं। आज से तुम हमारे राज्य कार्य में हमारा साथ दोगी। हमारे राज्य को तुम जैसी नेक, बहादुर और सत्यवादी और निडर वजीर की आवश्यकता है। जिस राज्य में तुम जैसी औरतें हैं उस राज्य की उन्नति में कोई भी बाधा आड़े नहीं आ सकती।"
औरत यह सुन कर हैरान थी और उसने राजा की दी हुई सजा को हँसकर स्वीकार कर लिया।
********
समाप्‍त


Wednesday, September 23, 2009

राजा की वज़ीर-2

प्रथम भाग से आगे

घूमते-घूमते वह एक गांव में पहुंचा। उसे बहुत प्यास लग रही थी। वह एक कुंए पर गया। कुंए पर गांव की औरतें पानी भर रही थी। राजा उनके पास गया और पानी माँगने लगा। एक अजनबी को प्यासा देखकर एक औरत को उस पर दया आ गई और वह उसे पानी पिलाने के लिए कुंए में डोल से पानी निकालने लगी। जब उसने डोल निकाला तो देखा कि डोल पूरा भरा हुआ था। उस औरत नें डोल का आधा पानी वापिस कुंए में डाल दिया और आधा डोल अजनबी को पीने के लिए दे दिया। राजा यह देखकर बहुत हैरान हुआ। पर उसे बहुत प्यास लग रही थी, इसलिए उसने बिना कुछ कहे पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई और फिर औरत से बोले- "बहन तुमने मुझ प्यासे को पानी पिला कर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। परन्तु मुझे समझ नहीं आया कि तुमने डोल का आधा पानी वापिस कुंए में डालकर मुझे आधा डोल ही क्यों दिया? जबकि पानी निकालने में तो तुम मेहनत कर चुकी थी।"
"भाई तुम्हारी प्यास तो आधे डोल से ही बुझनी थी, फ़िर आधा डोल पानी का व्यर्थ क्यों गंवाया जाए। किसी और के पीने के काम आ जाएगा।"
"लेकिन आधा डोल पानी से कुंए को क्या फ़र्क पड़ेगा। उसमें तो पानी का भण्डार है।"
"क्या आपने सुना नहीं बूंद-बूंद करके ही सागर बनता है। अगर हम ऐसे ही पानी को आधा-आधा डोल करके व्यर्थ करते रहे तो इस कुंए का पानी भी एक दिन खत्म हो जाएगा। फिर पानी तो हमें जिन्दगी देता है, अगर इस आधा डोल पानी से किसी और प्यासे की प्यास बुझ जाएगी तो उसमें बुराई क्या है।"
औरत बोलती गई और राजा उसकी बातें चुपचाप सुनता गया।
वह अपनी बात कहते हुए फिर से बोली- वैसे भी हम कोई राजा कर्णवीर तो हैं नहीं। अब देखिए न उसने अयोग्य व्यक्तियों को भी इतना माला-माल कर रखा है कि सब मेहनत और आवश्यकता से अधिक दौलत पाकर आरामप्रस्त हो गए हैं किसी को भी राज्य की चिंता नहीं है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पूरा का पूरा खजाना खाली हो जाएगा और राज्य हाथ से छिनते देर न लगेगी।"
कहकर औरत नें अपना घड़ा उठाया और चली गई। राजा उसे जाते हुए देखता रहा। और फिर अपने घोड़े पर सवार होकर अपने राज-दरबार की तरफ चला

शेष आगे.....


Tuesday, September 22, 2009

राजा की वज़ीर- 1

राजा की वजीर (भाग-1)

एक समय एक राजा था। वो अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था। उसके राज्य में धन-धान्य की कोई कमी न थी और कोई भी ऐसा व्यक्ति न था जो बेकार हो, जो भी थोडा-बहुत काम करता राजा उसको खूब धन-माल दे देता ताकि उसके परिवार का अच्छे से पालन-पोषण हो सके। परिणाम स्वरूप लोग आलसी और निट्ठले होने लगे। थोड़ा-बहुत काम करते और आराम से जीवन बिताते। उन्होंने मेहनत करना तो दूर दिमागी कसरत करना भी बन्द कर दिया। लोगों के पास दौलत तो खूब जमा होने लगी लेकिन योग्यता धीरे-धीरे नष्ट होने लगी। राजा को राज्य में भी अयोग्य कर्मचारी ही भरती करने पड़ते, फलस्वरूप राज्य का सारा कार्य-भार अयोग्य और आलसी लोगों के हाथ जाने लगा। अब न तो कोई कार्य समय पर होता और न ही सुचारु रूप से। अब राज्य के कार्यों से आम जनता को भी परेशानी झेलनी पड़ती। कोई भी ऐसा बुद्धिमान नहीं था जो राजा के कार्य में उसकी सहायता कर सके। अकेला राजा तो सब कार्य नहीं संभाल सकता था। राजा की उदारता से अर्थ-व्यवस्था भी डगमगाने लगी।

अब तो राजा अपने राज्य की बिगडती हुई कार्य-प्रणाली और अर्थ-व्यवस्था पर दुखी रहने लगा। वह समझ ही नहीं पाता था कि किस तरह से इस हालात से निपटा जाए। मन ही मन वह सोचता रहता-
"अरे मैने तो प्रजा में बहुत धन बाँटा है, किसी को निराश नहीं होने दिया। राज्य में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है जो सुखमय जीवन व्यतीत न करता हो। सब को उनके कार्य से कहीं अधिक मेहनताना दिया जाता है फिर भी राज्य व्यवस्था में अनुशासन हीनता है। मुझे और ऐसा क्या करना चाहिए जिससे मेरे राज्य का कार्य सुधर जाए। क्या मेरे इतने बड़े राज्य मे एक भी ऐसा योग्य व्यक्ति नहीं है जो मेरे कार्य में मेरा हाथ बँटा सके?"

यही सोच-सोच कर वह परेशान रहने लगा। एक दिन वह अपना वेश बदलकर घोड़े पर सवार होकर योग्य व्यक्ति की तलाश में राज्य भर का चक्कर लगाने निकल पड़ा।
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॰॰॰शेष आगे


Sunday, September 20, 2009

प्रेमचंद की बूढ़ी काकी और बाल-चित्रकारी

बच्चो,

आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं एक खास कहानी। इस कहानी को लिखा है मशहूर उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद। कहानी को अपनी आवाज़ दी है नीलम आंटी ने। कहानी का शीर्षक है 'बूढ़ी काकी'। यह कहानी हमें बड़ों का सम्मान करने की सीख देती है। इसी विषय पर पाखी मिश्रा ने चित्र भी बनाया है। हमें उम्मीद है कि आप पसंद करेंगे।

सुनें-





Saturday, September 19, 2009

हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-ख़ुदा

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को सभी बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के प्रणेता के रूप में जानते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि उन्होंने इसे स्थापित करने के लिये क्या जतन किया? आइये आज आपको उनके जीवन की एक प्रेरणादायक घटना सुनते हैं।

महामना उस समय एक बहुत अच्छे विश्वविद्यालय का सपना साकार करने की योजना बना रहे थे, और उन्हें बहुत सी तकलीफों और अवरोधों से गुजरना पड़ रहा था, किन्तु वे दृढ़ प्रतिज्ञ होकर विश्वविद्यालय को बनाने के काम में जुटे हुए थे। उनके पास पूंजी का अभाव था, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, वे शहर-शहर जाकर धनाड्य व्यक्तियों और बड़े व्यापारियों से मिलते और उनसे चंदा एकत्रित करते थे।
इसी क्रम में एक बार वे हैदराबाद के निजाम से मिलने गये और उनसे कुछ पूंजी सहायतार्थ देने हेतु आग्रह किया। निजाम साहब आग बबूला हो गये, और कहने लगे कि, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमसे चंदा मांगने की और वो भी एक हिन्दू विश्वविद्यालय के लिये?" और गुस्से में निजाम ने अपना जूता उतार कर पंडित जी के ऊपर दे मारा।
आगे बढ़ने से पहले, यहाँ रुक कर अब आप सोचिये कि अगर आप पंडित जी की जगह होते तो क्या करते?

पंडित जी ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप वो जूता उठा कर बाहर चले आये। वहाँ से सीधा वे बाज़ार में गये और उस जूते की नीलामी करने लगे, क्योंकि वो निजाम का जूता था तो बहुत से लोग आगे बढ़ कर उस जूते को खरीदना चाहते थे। इस तरह नीलामी की बोली बढ़ती गयी और जूते का दाम भी बढ़ता गया।

जब निजाम ने यह सुना तो वो व्याकुल हो उठा। उसे लगा कि अगर किसी ने बहुत कम कीमत पर उस जूते को खरीद लिया तो उनका अपमान हो जायेगा। अतः उन्होंने अपने एक सेवक को यह हिदायत देकर जूता खरीदने भेजा कि "चाहे कितनी भी बड़ी बोली लगानी पड़े पर तुम ही वो जूता खरीद कर आना।"

इस तरह पंडित जी ने निजाम का अपना जूता उन्हें ही बहुत बड़ी कीमत पर बेच कर विश्वविद्यालय के लिये धन एकत्रित किया। बाद में इसी पूंजी से उन्होंने बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय की स्थापना की।

देखा आपने, जब इंसान हिम्मत करके अपनी मदद स्वयं करता है तो ईश्वर भी उसकी मदद करते हैं।

प्रस्तुति- पूजा अनिल


Friday, September 18, 2009

रानी बिटिया सो जा

रानी बिटिया सो जा

रानी बिटिया सो जा
रात हुई है सो जा
सारे पक्षी सो गये
तू भी बिटिया सो जा .

पेड़ पौधे सो गये
पशु सारे सो गये
सूरज भी है सोया
तू भी बिटिया सो जा .

मीठी नींद आयेगी
मधुर स्वप्न लायेगी
परियां उड़ आएंगी
गोद में खिलाएंगी .

चांद तारे आ गये
सारे नभ में छा गये
टिम टिम कर के बोले
अब तो बिटिया सो जा .

सुबह सूरज आयेगा
सबको वह जगाएगा
रात हो गई ज्यादा
तू भी बिटिया सो जा .

कवि कुलवंत सिंह


Thursday, September 17, 2009

रोज नया इक पेड़ लगा रे



आओ मिल कर पेड़ लगायें,
हरे-भरे मैदान बनायें,
रंग-बिरंगे फूल खिलायें,
धरती माँ को खूब सजायें।

शांति बहुत पेड़ हैं देते,
मूक हैं, फिर भी बात हैं करते,
प्रदूषण को ये दूर भगाते,
वायु को हैं स्वच्छ बनाते।

पेड़ हमें हैं भोजन देते,
लकड़ी, कपड़ा, कागज देते,
और दवा के काम भी आते,
छाया से हैं सुख पहुँचाते।

पेड़ों से है वर्षा आती,
और बाढ़ भी है रुक जाती,
मिट्टी को उपजाऊ बनाते,
पत्थर खा ये फल हैं खिलाते।

पेड़ों की तुम रक्षा करना,
अच्छा नहीं है इनका कटना,
दोस्त हमारे पेड़ हैं सारे,
रोज नया इक पेड़ लगा रे।

--डॉ॰ अनिल चड्डा


Wednesday, September 16, 2009

हँसना मना है


एक बार एक तोते को खरीदने एक पंडित गया था .उसने सुना था कि एक अनूठा तोता आया है .वो तोते वाले की दुकान पर पहुँचा ,दुकानदार ने बताया कि यह गायत्री मंत्र बोलता है ,नमोकार मंत्र बोलता है ,बड़ा शुद्ध उसका उच्चारण था .उसने दुकानदार से पूछा कि क्या इशारे से यह गायत्री मंत्र बोलेगा ?तो दुकानदार ने कहा :आप देखते हैं ,इसके बाएँ पैर में छोटा सा धागा लटका हुआ है वह किसी और को दिखाई नही पड़ता ,पतला सा धागा ,कला सा धागा ,बस आप जरा सा खीच देंगे तो यह गायत्री मन्त्र बोल देगा और अगर नमोकार मन्त्र सुनना हो ,तो दायें पैर का धागा खीच देना ,किसी को पता भी नही चलेगा आर वो उसी क्षण नमोकार मन्त्र बोल देगा .पंडित ने पूछा :और अगर ये दोनों धागे एक साथ खीच दे तो :तो तोता बोला ,अबे गधे !दोनों एक साथ खीचोगे तो मै नही गिर जाऊँगा
साभार
(ओशो टाईम्स )


Monday, September 14, 2009

हिन्दी दिवस

हिन्दी दिवस पर ......................
१.दुनिया भर में शायद ही ऐसी विकसित भाषा हो जो सरलता में और अभिव्यक्ति की क्षमता में हिन्दी की बराबरी कर सके
फादर कामिल बुल्के


२.हिन्दी देश की एकता की कड़ी है
डा.जाकिर हुसैन

३.देश के सबसे बड़े भू भाग में बोली जाने वाली हिन्दी ही राष्ट्र भाषा की पद कीअधिकारिणी है
सुभाष चंद्र बोस

४.राज भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है ,कोई भी देश अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी भाषा में ही अच्छी तरह व्यक्त
कर सकता है
महात्मा गांधी

५.हिन्दी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक व्यवहार में आने वाली भाषा है


Saturday, September 12, 2009

'देखो बच्चों'

'देखो बच्चों'
देखो, देखो, देखो बच्चों
देखो चाँद सितारों को
निरख रही हैं सभी
दिशाएँ देखो उन सब चारों को।

धरती उपजाती है अन्न
माँ हम उसको हैं कहते
सहती रहती सारे बोझे
हम सब उस पर ही रहते।

रात में चमकें चंदा तारे
चमक चांदनी आती है
दिन में फिर सूरज निकले
तो किरने भी मुस्काती हैं।

सूरज से गर्मी मिलती है
चंदा से मिलती शीतलता
गंगा का पावन जल देता
सबके मन को निर्मलता।

पत्थर से कठोर बनो ना
फूलों से सीखो कोमलता
ना करो घमंड कभी पैसे का
बेबस होती कितनी निर्धनता।

सीख-सीख अच्छी बातों को
करो सार्थक जीवन को अपने
संस्कार अच्छे हों तब ही तुम
पूरे कर पाओगे अपने सपने।

झगड़ा कभी न करो किसी से
और बुराई करना भी छोड़ो
कभी जरूरत पड़े अगर तो
कर्तव्यों से ना मुंह मोडो।

हर दिन कुछ नया सीखकर
आशाओं को जी लो तुम
फूलो से खिलकर मुस्काओ
कभी ना रहना फिर गुमसुम।

करो सार्थक यह जीवन अपना
सीखो तुम सब अपनी भूलों से
निश्छल होकर कुछ देना सीखो
धरती नदिया, और फूलों से।

शन्नो अग्रवाल


Thursday, September 10, 2009

बारिश बरसे




टप, टप, टप, टप, टपप, टपप,
बारिश बरसे टप, टप, टप,
गरजे बदरा घनन, घनन,
बिजली चमके शनन, शनन।

देख के बारिश की बौछार,
झूमें पौधे बारम्बार,
सूखे से छुटकारा मिला है,
नदियाँ भी मारें फुँकार

चहुँ और हरियाली बिछी है,
ठंडी हवा की धूम मची है,
कोयल मीठे गान सुनाये,
जंगल में मंगल की घड़ी है ।

मोर खुशी से नाच दिखाये,
बगिया भी है फूल खिलाये,
आओ, हम सब हाथ पकड़ कर,
झूमें, नाचें, मौज मनायें ।

--डॉ॰ अनिल चड्डा


Wednesday, September 9, 2009

मेरी टीचर

मेरी टीचर

प्यारे बच्चों ,
खुशी बंसल ने भी शिक्षक दिवस पर अपनी टीचर को याद किया है ,और हमे भी अपनी कविता प्रेषित की है , खुशी बंसल कक्षा चार की छात्रा हैं .



प्यारी -प्यारी मेरी टीचर

लवली -लवली उनका नेचर

हमको देती अच्छी शिक्षा

इनसे पढ़ना लगता अच्छा

शिक्षा का हर पाठ पढाती

आगे बढ़ना हमे सिखाती

यही कामना तो करते

रहे हमारी मैडम सुख से


खुशी बंसल

क्वीन- मेरी स्कूल
कक्षा चार







Tuesday, September 8, 2009

शिक्षक और शिष्य

शिक्षक और शिष्य
बच्चों आओ सबसे पहले हम उस महान शिक्षक व नेता की याद में कुछ पलों को मनन करें और सर झुका कर नमन करें जिसकी जीवन-गाथा और सीखों से आज भी देश के तमाम शिक्षकों व विद्यार्थिओं को प्रेरणा मिलती है और जिनका जन्म-दिवस ही हर साल ५ सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है...... ऐसी ही उनकी मनोकामना थी. तो जैसा की आप सबको पता ही होगा की उनका नाम है.......राधा कृष्णन.हाँ बच्चों, टीचर ही हमें शिक्षा देते हुये जीवन में सही मार्ग दर्शन कराता है. उनकी दी हुई तमाम सीखें और बातें हमें सदैव याद आती हैं और जीवन में कई बार उनसे आगे बढ़ने में प्रेरणा मिलती है. और शिक्षक का कर्तव्य है की बच्चों को सही मार्ग-दर्शन करायें. बच्चे एक छोटे से बीज के समान होते हैं यदि बीज को ठीक से मिटटी में न जमाया जाय और सिंचाई न की जाय व खाद न दी जाय तो वह ठीक से अंकुरित और विकसित नहीं हो पाते हैं. उसी प्रकार यदि बचपन की आरम्भिक शिक्षा के दौरान यदि शिक्षक के द्वारा ठीक से शिक्षा ना मिली या विद्यार्थी ही आलसी और कामचोर निकला तो वह आने वाले भविष्य में अपने जीवन में मजबूती से कदम रखने में असमर्थ होगा. कई बार हमें स्वयं अपनी छिपी हुई प्रतिभा के बारे में नहीं पता होता है किन्तु शिक्षक के प्रोत्साहन से वह श्रोत खुद व खुद वह चलता है.शिक्षक और शिष्य का स्कूल में शिक्षा के दौरान आपस में वही सम्बन्ध होता है जो एक बच्चे का घर के जीवन में माता-पिता के साथ. शिक्षक की महानता होती है की बिना भेद भाव किये हुये सभी शिष्यों को समान रूप से ज्ञान की बातें बताना, उनपर समान रूप से दृष्टि रखना और शिक्षा के स्तर को बनाये रखना. मेरा जन्म-स्थल एक छोटी सी जगह थी जो अब काफी विकसित हो गयी है. लेकिन जगह और स्कूल चाहें छोटे हों पर शिक्षक के महान बिचार और ज्ञान देने से कोई फर्क नहीं पड़ता. उसी प्रकार मेरे भी स्कूल में हर विषय के शिक्षक थे. हालांकि कंप्यूटर आदि के बारे में तब कोई नहीं जानता था. किन्तु मैं अपने सभी शिक्षकों का बहुत मान करती थी और हमेशा कहना मानने को तत्पर रहती थी. मैं बचपन से ही पता नहीं क्यों अनजाने में ही अन्याय के विरूद्व बोलने लगती हूँ. कई बार सब टोक भी देते हैं इस बारे में. किसी का दुख भी नहीं वर्दाश्त होता मुझसे. मैं अपना होमवर्क हमेशा पूरा रखती थी जिससे टीचर खुश रहते थे.एक बार मेरी मुख्य-अध्यापिका बीमार पड़ गयीं जो मेरे घर के कुछ पास रहती थीं. तो मैं जाकर उनसे पूछकर उनके घर का काम कर देती थी और अक्सर जाकर उनके हाल पूछती थी. उनके कोई बच्चे नहीं थे और कोई देखभाल करने वाला भी न था.....शादी भी नहीं करी थी उन्होंने. शिक्षक माता-पिता के समान ही तो होते हैं. यदि वह हर बच्चे का हित चाहते हैं तो हम क्यों नहीं उन्हें माता-पिता का दर्जा देकर उनकी मुसीबत में काम आ सकते हैं? आओ, हम सब आज अपने-अपने शिक्षकों के सम्मान में कुछ देर को नत मस्तक हों. वही हमारे जीवन की आधार शिला हैं.
शन्नो अग्रवाल


Saturday, September 5, 2009

शिक्षक दिवस पर बाल-उद्यान के बच्चों की विशेष प्रस्तुति

आज पाँच सितम्बर है यानी शिक्षक दिवस। आज हम सभी उन अध्यापकों, गुरुओं, आचार्यों, शिक्षकों, मास्टरों, टीचरों को बधाइयाँ देते हैं, याद करते हैं, जिन्होंने हमारे जीवन-दर्शन को कहीं न कहीं से प्रभावित किया। तो इस दिवस को मनाने में बाल-उद्यान के पाठक बच्चे भी क्यों पीछे हटें? गगन और लक्ष्य ने अपने चित्र हमें भेजे हैं।

गगन द्वारा बनाया गया डा. सर्वपल्ली राधाकष्णन का चित्र


लक्ष्य द्वारा बनाया गया टीचरों का चित्र


Friday, September 4, 2009

अमृत प्यार

अमृत प्यार

माँ के प्यार की महिमा का, करता हूँ गुणगान,
कभी कमी न प्यार में होती, कैसी है यह खान .
कष्ट जन्म का सहती है, फिर भी लुटाती जान,
सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान .

छाती से दूध पिलाती है, देती है वरदान,
पाकर आंचल की छांव, मिलता है सुख बड़ा महान.
इसके प्यार की महिमा का, कोई नही उपमान,
अपनी संतति को सुख देना ही इसका अरमान .

अंतस्तल में भरा हुआ है, ममता का भंडार,
संतानों पे खूब लुटाती, खत्म न होता प्यार .
ले बलाएं वह संतति की, दे खुशियों का संसार,
छू न पाए संतानों को, कष्टों का अंगार .

दुख संतति का आंख में बहता, बन कर अश्रुधार,
हर लेती वह पीड़ा सुत की, कैसा हो विकार .
संकट आएं कितने भारी, खुद पर ले हर बार,
भाग्य बड़े हैं जिनको मिलता, माँ का अमृत प्यार .

कवि कुलवंत सिंह