Tuesday, November 6, 2007

दीपावली विशेषांक-भाग-१


प्रिय बच्चो,
दीपक उजाला देता है, वह भी स्वयं जल कर। दीपक के स्वयं जलने से भी बड़ी बात है वह कहावत कि “चिराग तले अंधेरा”। दीपक अपने लिये कुछ नहीं रखता, अपना सबकुछ मानवता और जगत के कल्याण में अर्पित कर देता है। दीपावली का महत्व जगमग करते दीपकों के बिना अधूरा है। किंतु दूसरों के लिये अपने जीवन को अर्पित करने की यह सीख उसकी चकाचौंध में कहीं खो न जाये इस लिये अपनी फुलझड़ी जलाने से पहले आओ बैठें और थोड़ा विचार करें।

दशहरे से ठीक बीस दिन बाद दीपावली मनायी जाती है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन राम अपना वनवास समाप्त कर अयोध्या वापस लौटे थे। राम को वनवास क्यों मिला यह तो आप सब जानते ही होगे, लेकिन क्या यह जानते हो कि राम केवल अपने पिता का सम्मान और उनके दिये गये वचन को व्यर्थ न जाने देने के लिये चौदह वर्ष तक दीपक की भाँति वन में जलते रहे? आप सबके भीतर एक राम हैं, आवश्यकता है कि उसे बाहर लायें। अपने मातापिता का सम्मान करें और अपने दादा-दादी, नाना-नानी की पूजा। यदि दादा-दादी और नाना-नानी नहीं होते तो आपके पापा मम्मी भी नहीं होते और फिर आप भी यह प्यारी दुनिया नहीं देख रहे होते। आप अपने प्यारे पापा-मम्मी में जो गुण देखते है दरअसल वे आपके दादा-दादी और नाना-नानी के सिखाये हुए हैं और वही शिक्षा आप तक भी पहुँच रही है। इसी को दीप से दीप जलाना कहते हैं और यही सच्ची दीपावली है। आज के दौर में परिवार छोटे होते जा रहे हैं और केवल पापा-मम्मी और आप तक सिमट रहे हैं किंतु क्या यह अच्छी बात है? घटते परिवार भारत की सांस्कृतिक परंपरा नहीं हैं, हम सब तो मिल-जुल कर रहने के लिये जाने जाते हैं।

तो दीपावली का जब पूजन हो तो पहला काम यह करें कि अपने घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य, यानी कि अपने दादा-दादी, नाना-नानी को तिलक लगायें, उनके चरण स्पर्श कर उनका आशीष प्राप्त करें। और यदि इनमें से कोई आपके साथ नहीं रहते तो पापा से अवश्य पूछें कि वे कहाँ हैं और हमारे साथ क्यों नहीं हैं? हमारे बुजुर्ग वो दीपक हैं जिन्होंने तमाम जलते हुए दीपकों को अपनी लौ से रौशन किया है। अब जब वे बुझने लगे हैं, उनकी लौ मद्धम हो गयी है तो नये दीपकों यानी कि प्यारे बच्चों आपका फर्ज बनता है कि उन्हे संभालें, उनकी लाठी बनें, उनकी प्रसन्नता बनें उनकी आँखें बनें, उनका दीपक बनें....इस दीपावली आपका यह संकल्प है न?



दीपावली का त्योहार निकट है और आप सब को ‘बाल-उद्यान परिवार’ की ओर से कोटिश: बधाई।

राजीव रंजन प्रसाद


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6 पाठकों का कहना है :

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ का कहना है कि -

आपने दीपावली का अर्थ बहुत सरल और सहज रूप में प्रस्तुत किया है। बधाई स्वीकारें।

महेंद्र मिश्रा का कहना है कि -

धन्यवाद दीपक का अर्थ ओर महत्व बताने के लिए

रंजू का कहना है कि -

राजीव जी बहुत अच्छे से बताया है आपने इस में हर चीज को .बहुत सी बातों का महत्व हम वक्त के साथ साथ खोते जा रहे हैं ..इस से बच्चे हर बात को अच्छे से समझ सकेंगे ...बधाई आपको शुभ दीपावली की !!

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

राजीव जी

त्योहारों के मनाने के उत्साह के साथ साथ यह भी अत्यंत आवश्यक है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को इसके महत्व एवं संदर्भ से भी जोड़ सकें. आपकी प्रस्तुति इस द्रष्टि से बहुत ही प्रासंगिक है

सजीव सारथी का कहना है कि -

rajeev ji, bahut sundar prastuti hai, sabhi bachon ke liye anukarniya

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

इस दीपावली पर राजीव अंकल की बात मानकर दीपावली मनाइए (यदि ऐसा नहीं करते तो)। आपको बहुत मज़ा आयेगा।

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