Friday, November 16, 2007

घमंडी बिल्ली ( दूसरा भाग)

बच्चों, लो मैं फिर से हाजिर हो गया....... क्या? नाराज हो.... पिछली दफा नहीं आया था , इसलिए.... अरे, मैं आना चाहता था, लेकिन ये जो इम्तिहान होते है ना, बुरे इम्तिहान, तु्म सब की तरह मुझे भी तंग करते हैं। इसलिए नहीं आ पाया।
चलो
अब कहानी को आगे बढाता हूँ।
तो हमलोग घमंडी बिल्ली की बातें कर रहे थे। भूल गए... लो यहाँ देखो। बच्चों, घमंडी बिल्ली ने दूध का घड़ा खुद हीं तोड़ दिया था। लेकिन देखो कितनी बेशर्म है बिल्ली, उसने सारा दोष चूहों के सर मढ दिया।

बिल्ली ने उनसे कहा कि....

तुम चूहे, किसी काम के नहीं,
दूध बचाकर रख ना पाए,
जो छींके पर रखते तुम तो
दूध को लेते सभी बचाए,
जान-बूझकर जमीं पर रखा,

ताकि मेरी पूँछ लग जाए,
अब तुमसब को सजा मिलेगी,
यही एक दिख रहा उपाय!

बेचारे चूहे, असमंजस में आ गए। उन्होंने तो सहीं इंतजाम किया था। गलती तो बिल्ली की थी। लेकिन कमजोर चूहे करते भी तो करते क्या? ऊपर से बिल्ली ने सजा देने की बात कर दी। कहीं बिल्ली उनसब को खा न जाए। चूहे पूरी तरह से डर गए थे।अपने बस में कुछ न जानकर,सारे चूहे शांत हो गए।

फिर बिल्ली ने कहा...

मन करता है मुझको कि
तुम सब को मैं खा जाऊँ,
तुम नन्हें शैतानों को खा-
अपने उदर की भूख मिटाऊँ,
फिर सोचूँ, तुम छोटे-छोटे,
क्यों न तुमपर दया दिखाऊँ,
एक मौका फिर से दे तुमको,
तुम सब को जीवन लौटाऊँ।


बिल्ली ने सारे चूहों को एक मौका और देने की बात कही। उनसे कहा कि वह अगले दिन दोपहर में आएगी। तब तक दूध घड़े में मौजूद होना चाहिए। अगर चूहे यह करने में कामयाब हो जाते हैं,तो वह चूहों को नहीं खाएगी। नहीं तो कल दिन में हीं वह सब को खा जाएगी।



बचने की इस राह को सुनकर
चूहों में उम्मीद-सी जागी,
पर सोचा,इस बार भी कहीं,
ना तोड़ दे घड़ा, बिल्ली अभागी!
तब तो वो हमें खा जाएगी,
अरे नहीं.... एक डर-सी लागी,
अब एक काम हीं करना होगा,
बनना होगा सब को बागी।

अरे बागी का मतलब नहीं जानते...... जो बगावत करता है ... जो बने-बनाए नियम-कानूनों को नहीं मानता, क्योंकि वे नियम-कानून दूसरों को हानि पहुँचाते हैं। चूहों ने भी बिल्ली रानी से बगावत करने की ठानी। बिल्ली को सबक तो सिखाना हीं होगा, नहीं तो वह हर बार सबको ऎसे हीं डराया करेगी।

चूहों के मुखिया ने सारे चूहों को एक जगह इकट्ठा किया। उनसे एक घड़े का इंतजाम करने को कहा। घड़े के आ जाने पर सारे चूहों ने मिलकर उसे छींके पर डाल दिया। लेकिन बच्चों....... उस घड़े में उन्होंने दूध नहीं डाला। बल्कि घड़े के मुँह पर एक रस्सी का फंदा बनाकर डाल दिया। रस्सी को उन्होंने इस तरह से डाला था कि वो रस्सी छींके का हीं टुकड़ा या फिर एक हिस्सा लगे। आगे क्या करना है , मुखिया जी ने सारे चूहों को बता दिया।

उन्होंने कहा....


कुछ चूहे हो उनके साथ
बिल्ली के संग-संग आएँगे,
शक ना हो बिल्ली रानी को
तनिक ना हाव-भाव दिखाएँगे,
बाकी चूहे पकड़ कर रस्सी,
टीले पर छुप कर बैठ जाएँगे,
घड़े में ज्यों वह मुँह डालेगी,
रस्सी को खींच नीचे लाएँगे।


मुखिया जी का यह "प्लान" बाकी चूहों को बहुत हीं अच्छा लगा। लेकिन फिर मुखिया जी को हीं यह बात थोड़ी बुरी लगी। उन्हें लगा कि ऎसे में तो बिल्ली मर जाएगी। हमें किसी को मारना नहीं है। लेकिन बिल्ली को सबक भी सीखाना था। बिल्ली को सबक सिखाने का यही एक उपाय भी था। तब मुखिया जी ने अपने "प्लान " में थोड़ा-सा फेरबदल किया।

उन्होंने
घड़े में दूध डालने को कहा। रस्सी को छींके में फँसा डाला और उसके दूसरे छोर पर एक बड़ा-सा पत्थर बाँध डाला। रस्सी के फंदे की पकड़ भी थोड़ी कमजोर कर डाली।

अब नए प्लान के मुताबिक.....

दूध पीने को घड़े के अंदर
बिल्ली ज्योंहि मुँह डालेगी,
चूहे मिल पत्थर ढकेलेंगे-
रस्सी नीचे को आ लेगी,
गले मे फंदा लिए वो बिल्ली
जब हमसे मुँह को खा लेगी,
हमसे बचाने को बोलेगी,
कब तक वो घमंड पालेगी।


मखिया जी ने ऎसा उपाय बताया था, जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। चूँकि छींका भी संग-संग गिरने वाला था और उसे गिराना चूहों के लिए आसान नहीं था। इसलिए बिल्ली चूहों पर शक नहीं कर सकती थी। चूहों ने उसके लिए दूध का भी तो इंतजाम किया था, वो कैसे उन पर आरोप डालती। और फंदे से निकालने वाले चूहे हीं थे....... तो बताओ , चूहों का प्लान कैसा था।


चूहों ने मुखिया जी के कहे अनुसार हीं किया। बिल्ली रस्सी में फँस गई। अब अगर बिल्ली चूहों को नहीं बुलाती , तो फंदे में उसकी साँसें बंद हो जाती और अगर बुलाती तो उसके घमंड का क्या होता।

सोचो, बिल्ली ने क्या किया होगा? अरे भाई, किसको जान नहीं प्यारी है। बिल्ली का घमंड चूर-चूर हो गया। वह शर्मिंदा होकर चूहों को छोड़कर चली गई।

देखा बुद्धि का कमाल और उससे बढकर एकता का बल.... चूहों ने मिलकर वह बड़ा-सा पत्थर नहीं ढकेला होता, तो यह कैसे होता? एक चूहे के बस में तो यह बात थी नहीं।और हाँ, चूहों ने बिल्ली की जान की भी फिक्र की....जबकि वो चाहते तो उसे मार सकते थे। लेकिन किसी को मारना अच्छा नहीं होता।

तो चलो , तुमने इस कहानी से बहुत-सी बातें सीखीं। अब अपने विश्व दीपक भैया को टाटा बोलो। अगली बार कुछ नया लेकर आऊँगा। तब तक के लिए "बाय"।

-विश्व दीपक 'तन्हा'


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9 पाठकों का कहना है :

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

विश्व दीपक भैया

आपसे बहुत-सी बातें सीखीं।
टाटा टाटा ....
अगली बार जल्दी आना..

रंजू का कहना है कि -

कहानी के साथ साथ बहुत सुंदर शिक्षा भी दी दीपक आपने ..बच्चों के साथ साथ हमने भी खूब मेज़ से इसको पढ़ा :)

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ का कहना है कि -

आपने कविता और कहानी का मजा एक साथ दे दिया है। इस नवीन प्रयोग के लिए बहुत बहुत बधाई।

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

वाह!

बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ "एकता की शक्ति", "मानवता", "घंमड के नुकसान"... बहुत कुछ कितनी सरलता से सीखा गये हो... मजा आ गया भाई!

बहुत-बहुत बधाई!!!

रचना सागर का कहना है कि -

तनहा जी,

बहुत सुंदर सीख... मजा आ गया।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

कविता-कहानी का यह मिश्रित प्रयोग बहुत अच्छा बन पडा है। बच्चों को सीख देने में भी आपने पर्याप्त समय लिया है और गंभीरता पूर्वक सोचा है जो आपकी रचना में प्रकट भी होता है। बधाई...

*** राजीव रंजन प्रसाद

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

मजेदार कविता
संग, मजेदार कहानी
बिल्ली को सबक सिखाने की
चूहों ने मन में ठानी
बुद्धि से युक्ति से
संगठन की शक्ति से
बिल्ली का घमंड टूटा
चूहों का पीछा छूटा
ना किसी की जान गयी
ना कोई हानी
मजेदार कविता
संग, मजेदार कहानी

दीपक भैया, सुन्दर प्रयोग.

anuradha srivastav का कहना है कि -

रोचक..... मजा आ गया चुहे -बिल्ली की कहानी वो भी इतनी नवीनता के साथ .....आप अपने उद्देश्य में सफल रहें। शैली की विविधता आकर्षित करती है।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

इसे संगीतबद्ध भी किया जा सकता है, बस कोई पुचकार कर सुनाने वाली आवाज़ मिल जाय।

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