Saturday, January 30, 2010

राष्ट्रीय प्रतीक

प्यारे बच्चो कल मैने आपको भारत के कुछ राष्ट्रीय चिन्हों की जानकारी दी थी । आज देखिए कुछ और राष्ट्रीय प्रतीक

८.राष्ट्रीय गीत

वन्दे मातरम मां का वंदन
गाए हर इक भारतीय जन
बंकिम चन्द्र चैटर्जी का गान
राष्ट्रीय गीत हिन्द का महान

९. राष्ट्रीय-वाक्य
'सत्यमेव जयते' वाक्य
कहता सत्य की सदा विजय
सत्य पथ पर बढते जाओ
जीवन में सदा सुख पाओ
१०. राष्ट्रीय नारा
'श्रमेव जयते' नारा
श्रम करना ही कर्म हमारा
श्रम से जीतें सकल जहान
जय जवान और जय किसान
११. राष्ट्रीय भाषा
राष्ट्रीय भाषा अपनी हिन्दी
भारत मां के भाल की बिन्दी
पूरे देश में बोली जाती
तभी तो सबकी मां कहलाती
१२.राष्ट्रीय पर्व
पंद्रह अगस्त बच्चो जब आए
हम आजादी दिवस मनाएं
आए जब जनवरी छब्बीस
होता तब गणतंत्र दिवस

१३. राष्ट्रीय खेळ


हाकी अपना राष्ट्रीय खेल
बढाए इक दूजे से मेल
हर बच्चे से इसका नाता
गली-गली में खेला जाता
१४.राष्ट्रीय फ़ल


राष्ट्रीय फ़ल का सुनलो नाम
बच्चो फ़लों का राजा आम
मीठा-मीठा आम रसीला
दिखने में है पीला-पीला
१५. राष्ट्रीय नदी


राष्ट्रीय नदी है गंगा पावन
निर्मल करती सबका मन
शीतल बच्चो इसका जल
धो देती तन-मन का मल
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Thursday, January 28, 2010

राष्ट्रीय प्रतीक

नमस्कार बच्चो ,
आप सबने गणतंत्रता दिवस धूम-धाम से मनाया । आप इतना तो जान ही गए होंगे कि गणतंत्रता दिवस २६ जनवरी को मनाया जाता है और इस दिन हमारा संविधान लागु हुआ था । हमारे संविधान के साथ और भी कुछ ऐसे प्रतीकों को मान्यता मिली हुई है जिनको हम राष्ट्रीय प्रतीक कहते हैं । आओ आज मैं आपको उनकी संक्षिप्त में जानकारी देती हूं कि हमारे राष्ट्रीय चिन्ह कौन-कौन से हैं -
१. राष्ट्रीय ध्वज
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तीन रंग झण्डॆ को सजाते
सब अपनी पहचान बताते
बलिदानी , शान्ति ,हरियाली
तीन रंग की बात निराली
कहता चक्र रहो गतिमान
सत्य पथ को लो पहचान
२. राष्ट्रीय चिन्ह


खडे चार शेर मुंह खोल
चक्र है नीचे गोल-गोल
दाईं ओर इक बैल खडा
बाएं भाग रहा इक घोडा
शौर्य ,मेहनत और शक्ति
चक्र विकास धर्म की गति
३. राष्ट्र गान

जन-गन-मन है राष्ट्र गान
करना सब इसका सम्मान
जब भी इसकी धुन बजे
सावधान हो जाओ खडे
४.राष्ट्रीय फूल

राष्ट्रीय फ़ूल कमल कहलाता
भारत मां की शान बढाता
विद्या देवी इस पर बैठे
खिले कमल कीचड में रह के
५. राष्ट्रीय पक्षी

राष्ट्रीय पक्षी बच्चो मोर
पक्षी इससा कोई न और
कितना सुन्दर और चमकीला
नाच दिखाए रंग-रंगीला
६.राष्ट्रीय पशु

राष्ट्रीय पशु बाघ कहलाता
फ़ुर्ती से भागा ही जाता
ताकत का इसको वरदान
पीला रंग इसकी पहचान
७.राष्ट्रपिता

राष्ट्रपिता हैं बापु गांधी
दिलाई हमें जिसने आजादी
सत्यव्रती अहिंसा का पुजारी
माने जिसको दुनिया सारी



ऐसा प्यारा सुखद पर्व २६ जनवरी

26 जनवरी 2010

२६ जनवरी,मंगलवार,हिंद युग्म संबाददाता
राष्ट्र पर्व का ध्वज आज मन को हर्षाता
आदर्श कुञ्ज, रोहिणी का यह सेक्टर १३
कैमरा मैन के साथ, सुबह-सुबह आ घेरा
अल्प सुबह भी, बावजूद गहरे कोहरे के
आते जाते सहस्र बाल जन हमने देखे
कॉलोनी के वरिष्ठ, सहर्ष फहराया तिरंगा
हुआ मिजाज आदर्श कुञ्ज,का रंग बिरंगा
सावधान सब खड़े, राष्ट्र की शान मान में
राष्ट्रगान की ध्वनि गूँज रही आसमान में
बावन सेकेण्ड का,आखों देखा हाल सुनो अब
दक्ष मुद्रा लिए खडे थे, जब सबके सब
एक बच्चे की पेंट खिसकती देखी नीचे
पोजीशन को चेंज किये बिन, कैसे खींचे
ऐनीवे, प्रिय राष्ट्रगान जब हो गया पूरा
शर्माते हुए उस बच्चे ने मुझको घूरा
प्रश्न राष्ट्र का हो तो सब कुछ अपना अर्पण
पेंट क्या.. यह सांस देश के हेतु समर्पण
खुशी खुशी यह जीवन अपना जाने देंगे
राष्ट्र आन पर कभी आँच ना आने देंगे
रंग बिरंगे परिधानों में बच्चे आये
वेस्ट से बने हुए कुछ बेस्ट नमूने लाये
देखो कुछ भी वेस्ट कहाँ है, भाई जग में
कितना कुछ है छुपा हुआ करने को सब में
डालो एक नजर चित्रों पर, लगे साथ में
छुपे हुए है कलाकार, बच्चों के हाथ में
कितना जज्बा,लगन,भरी कितनी उत्सुकता
रेडी..स्टेडी..कहते ही कोई उठ भगता
आखिर'गो'कर सकीं मेम दो चार बार में
दो बच्चे और टांग तीन दौड़े कतार में
लगी रेस बच्चों की देखो पैर बांधकर
आगे बढते होशियारी से साध-साध कर
बच्चों की मम्मियाँ भी कहाँ पीछे रहती है
छब्बीस,छत्तीस,छ्यालीश हों, १६ कहती हैं
अन्यंत्र नहीं लेना यह बात कहना अच्छा है
छुपा हुआ हर एक नारी नर में बच्चा है
माइक लेकर हाथ गजब पेट्रीयोटिक गाये
सुने सभी ने मंत्रमुग्ध हो कान लगाए
कौन सी मम्मी ज्यादा ज्यादा शब्द लिखेगी
२६ जनवरी की झलक जिन जिन में दिखेगी
किसी ने लिखे २ शब्द किसी ने पूरा एस्से
सभी को बहुत बधाई,लिखा सबने ह्रदय से
एक मम्मी ने शब्द, पूरे ग्यारह लिख डाले
हुई विजेता,फर्स्ट प्राइस कर लिया हवाले
पाकर के उपहार बहुत खुश बच्चे सारे
आनन्दित प्रफुल्लित थे, जीते या हारे
खेल भाव था, प्रश्न नहीं था हार जीत का
यही भाव रहे हर बच्चे में राष्ट्र प्रीत का
नहीं देख सकता तिरंगे को, कोई कुदृष्टि
यही प्रीत बन जायेगी फिर अग्नि-वृष्टि
ध्वज को देकर एक बार फिर पुनः सलामी
निकल पड़े करने को कार्य फिर कुछ आगामी
अथक प्रयास था इसके पीछे नीलम जी का
ह्रदय से आभार, मिला सहयोग सभी का
सुबह से लेकर शाम हुई बहतरीन मरमरी
ऐसा प्यारा सुखद पर्व २६ जनवरी
ऐसा प्यारा सुखद पर्व २६ जनवरी


जय हिंद-जय हिन्दी

- भूपेन्द्र राघव
दिल्ली-हिन्द युग्म

अन्य झलकियाँ-




















































Tuesday, January 26, 2010

अपना देश

आओ हम सब सोचें मिलकर
अपने जीवन के बारे में
जीवन में क्या बनना हमने
क्या देखा है अपने सपनों में.

हम आजाद देश के वासी हैं
आजादी से ही रहेंगे हम
कभी घमंड न करना बच्चों
पर गर्व जरूर रहे हरदम.

देश भक्ति और सदाचार के
गुण हम हर दिन ही गायें
हँसी ख़ुशी के बादल हम पर
खुशियाँ हर पल बरसायें.

उन महान लोगों ने मिलकर
आजाद यह देश कराया था
आजादी के झंडे को सबने
मिलकर शीश झुकाया था.

लड़ी लड़ाई देश की खातिर
और जंजीरों से मुक्त किया
रहे नहीं गुलाम किसी के
और अंग्रेजों को भगा दिया.

अच्छे-अच्छे काम करो तो
देश की उन्नति जिससे हो
सुन्दर रखो भावना अपनी
तुम इस देश के हिस्से हो.

ऊँच-नीच और भेद-भाव को
मन में ना तुम अपने रखना
कभी किसी को नहीं सताना
मिलजुलकर तुम सब रहना.

मेहनत करके जीवन में तुम
कुछ अच्छा बनके दिखलाओ
दीपक जैसे टिमटिम करके
हर दिन प्रकाश को फैलाओ.

-शन्नो अग्रवाल


Saturday, January 23, 2010

स्वेटर पर स्वेटर पहनाती है माँ

स्वेटर पर स्वेटर पहनाती है माँ
उस पर भी जैकेट लदवाती है माँ
मै कपड़ों का गठर नज़र आता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

गरम दूध बौर्नवीटा के संग भर देती है
आइसक्रीम कुल्फी सब बंद कर देती है
मै दूर से देख उनको लार टपकाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

माँ सुबह सुबह नहलाती है
हम पर कितना जुल्म ढाती है
अब तो पानी देख के घबराता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

खेल प्रारंभ करते ही ख़त्म होजाता है
सूरज भी ठण्ड में जल्दी ही सो जाता है
घर में बैठा बैठा बोर हो जाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

जेब से हाथ निकलते ही ठंडा हो जाता है
ठन्डे हाथों से पेन भी कहाँ पकड़ा जाता है
बहुत मुश्किल से थोडा ही लिख पाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

टीचर इतना होमवर्क देती है
सोचती नहीं की उम्र हमारी छोटी है
न हो पूरा काम तो मार खाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

जड़े की छुट्टी और लम्बी होनी चाहिए
हम को भी आज़ादी मिलनी चाहिए
सब को यही बात सुनाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

--रचना श्रीवास्तव


Wednesday, January 20, 2010

सुनिए- हमको ऐसा वर दो माँ वीणावादिनी

बच्चो,


आज बसंत पंचमी हैं। मतलब बसंत का मौसम पाँचवे दिवस तक अपनी यात्रा पूरी कर चुका है। आज ही के दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की भी पूजा होती है। नीलम आंटी और तुम सबकी दोस्त पाखी मिश्रा ने सीमा सचदेव आंटी द्वारा लिखित और पिछले साल प्रकाशित सरस्वती वंदना को अपनी आवाज़ों में रिकॉर्ड किया है। आप भी इनके साथ देवी सरस्वती की स्तुति कीजिए-


Monday, January 18, 2010

मेरी पहचान


मेरी पहचान
दो आंखें और दो ही कान
एक नाक मेरी पहचान
दो बाहें और दो ही हाथ
मिलकर काम करें ये साथ
सिर पर भूरे लम्बे बाल
चिकने चिकने मेरे गाल
दो टांगें और दो ही पैर
भागुं जिससे लगे न देर


नन्हे मुन्नों की कहानियां - बडों के लिए - (१) कुर्सी

नन्ही-मुन्नी कहानियां उन छोटी-छोटी कहानियों का संग्रह है जिन्हें पहले बिना सोचे सुनाया गया और फ़िर लिखा गया । इसका श्रेय जाता है मेरे चार साल के बेटे शुभम को जिसको हर चीज में मुझसे कहानी सुनने का शौंक है और मै उसके लिए कोई न कोई कहानी गढने पर मजबूर हो जाती हूं । आज जब मैं अनजाने में ही पल में बिना सोचे समझे कहानी गढकर सुना देती हूं , सच कहुं तो खुद नहीं जानती कि मैं क्या बोलने वाली हूं और बोलते-बोलते कहानी बन जाती है तो सोचती हूं कि शायद हितोपदेश/पंचतंत्र की कहानियां भी ऐसे ही लिखी गई होंगी । खैर जो भी हो जो कहानियां मैं आपको सुनाने जा रही हूं यह बहुत ही कम उम्र के बच्चों के माता-पिता के लिए हैं । अगर आपके भी दो से पांच साल के बच्चे हैं और आपसे भी कहानी सुनने की जिद्द करते हैं , और हर प्रश्न का जवाब मांगते हैं तो निश्चय ही यह कहानियां आपके अवश्य काम आएंगी ।
(१) कुर्सी


मम्मी मम्मी कुल्सी(कुर्सी) की बात बताओ न ।
बेटा कुर्सी वह होती है जिस पर हम बैठते हैं ।
जैसे मेले पास है ......
हां बेटा जैसे आपके पास है ।
कुल्सी पल बैते(बैठते) हैं ?
हां बेटा
क्यों , खले क्यों नहीं होते ?
कुर्सी पर खडे होने से गिर जाते हैं और चोट लग जाती है ।
फ़िर कुल्सी मालती(मारती) है ?
हां.....
मालने से क्या होता है ?
मारना गंदी बात होती है , किसी को मारना नहीं चाहिए ?
क्यों....?
अब तो मेरे पास किसी क्यों का जवाब नहीं था और शुभम प्रश्न पे प्रश्न करते जा रहा था । मुझे थोडा गुस्सा आने लगा लेकिन नन्हे मन में इतने सारे प्रश्न आए कहां से और अगर उसको शान्त नहीं किया गया तो कहीं यह प्रश्न बच्चे के बाल-मन में दब कर न रह जाएं , यही सोचकर मैं जैसे तैसे जवाब दे रही थी । स्वय़ पर जैसे तैसे काबु किया ही था कि शुभम नें फ़रमाईश दाग दी ......
मम्मी कुल्सी की बात बताओ न ......
अब कुर्सी के बारे में मेरे पास बताने को कुछ नहीं था ।
(और बताती भी तो क्या कि सब कुर्सी का खेल है । एक कुर्सी की खातिर हम क्या-क्या कर जाते हैं और नन्हा-मन यह सब बातें समझे भी तो कैसे ?)
लेकिन हिम्मत करके बोलना शुरु किया तो पता ही न चला कि कहानी बन गई......
एक नन्हा-मुना बेबी था ।
जैसे मैं ....
हां जैसे शुभम ।
उसके पास एक कुर्सी थी ।
जैसे मेले पास है ?
हां ,जैसे आपके पास है , वैसी ही सुन्दर-सुन्दर कुर्सी बेबी के पास भी थी ।
वह उस पर बैठ कर खाना खाता , लिखता , पढता और होम-वर्क करता था ।
जैसे मैं भी कलता हूं न ?
हां जैसे आप करते हो वैसे ही बेबी भी करता ।
कुर्सी भी बेबी के अलावा किसी और को अपने ऊपर नहीं बैठने देती थी । जो भी उस पर बैठता उसे गिरा देती और गिरने वाले को चोट लग जाती । यह देखकर कुर्सी को बडा मजा आता ।
कुल्सी बेबी को भी गिला देती
नहीं , कुर्सी को बेबी का उस पर बैठना अच्छा लगता था पर वह किसी और को नहीं बैठने देती ।
जो भी उस पर बैठ कर गिरता उसे बहुत दर्द होता ,पर कुर्सी हर बार ऐसा ही करती ।
एक दिन पता है क्या हुआ ?
क्या....?
( बाल-मन नें बडी उत्सुक्ता से पूछा नहीं जनाता था कि मैं जो पूछ रही हूं कि क्या हुआ , वो खुद नहीं जानती कि क्या हुआ , जब आगे कोई बात नहीं सूझती तो हम शायद ऐसी बात करते हैं कि बोलने के लिए शायद कुछ सूझ ही जाए या फ़िर सामने वाला कोई ऐसी बात करदे कि बोलने के लिए कोई शब्द मिल जाएं )
बस इतने में मुझे भी सूझ ही गया और कहानी आगे बढाई.......
एक दिन कुर्सी पर जैसे ही बेबी का एक फ़्रैण्ड बैठने लगा तो बेबी ने उसे झट से मना कर दिया ...
नहीं नहीं मेली कुल्सी पल मत बैतना , तुम गिल जाओगे ।
और उसका फ़्रैण्ड जो बस बैठने ही वाला था एकदम से खडा हो गया ।
कुर्सी को रोज की तरह लगा कि उस पर कोई बैठ गया है और धडाम से गिर गई , उसे पता ही नहीं चला कि बेबी का फ़्रैण्ड तो उस पर बैठा ही नहीं है ।
फ़िल (फ़िर ) क्या हुआ ?
फ़िर जैसे ही कुर्सी धडाम से गिरी उसकी एक टांग टूट गई ।
अब उसकी कितनी टांगें रह गईं ?
कितनी ?
काऊंट करो...
वन , टू , थ्री.......
हां अब कुर्सी की थ्री टांगें रह गईं और थ्री टांगों पर तो कुर्सी खडी नहीं हो सकती थी ।
उसको चोट लग गई थी ।
फ़िल उसको पी (पीडा ) हुई ।
हां फ़िर उसको पी हुई और उसे कुर्सी के डाक्टर के पास लेकर गए । जैसे चोट लग जाए तो डाक्टर के पास जाना पडता है ।
फ़िल दाकतल (डाक्टर) इंजैक्श्न लाता(लगाता) है ।
हां बेटा जैसे डाक्टर चोट को ठीक कर देता है वैसे ही कुर्सी के डाक्टर नें भी कुर्सी को ठीक कर दिया ।
कुल्सी को पी हुई..?
हां.... कुर्सी को बहुत पी हुई । अगर वो दूसरों को नहीं मारती तो कुर्सी को भी पी नहीं होती और उसे डाक्टर के पास नहीं जाना पडता ।
जो दूसरों को मारते हैं उनको खुद को पी हो जाती है ।
इसलिए...
दूसलों को मालना नहीं चाहिए ........कहकर शुभम खिलखिला कर हंसने लगा । शायद उसकी सारी जिग्यासा शान्त हो चुकी थी ।


Thursday, January 14, 2010

मकर संक्रान्ति

नमस्कार बच्चो ,
कल मैं आपको लेकर गई थी पंजाब जहां लोहडी का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा था और हम सबने कल खूब लड्डु और रेवडियां भी खाए थे । अब बताओ भला आज कौन सा दिन है ....? बिलकुल सही आज है मकर संक्रान्ति , इसे माघ पूर्णिमा भी कहा जाता है । आज के दिन भी घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं , मुख्य रूप से खिचडी । तो खिचडी हम बाद में खाएंगे पहले यह तो जान लें कि यह त्योहार मनाया क्यों जाता है । इसके साथ भी अनेक कथाएं जुडी हैं । जैसे .......
१) इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उसके घर जाते हैं । शनि क्योंकि मकर राशि के स्वामी हैं तो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर इसे मकर संक्रान्ति कहा जाता है । इसे सूर्य वर्ष का प्रारम्भ माना जाता है ।
२) वसंत आगमन के साथ भी इस त्योहार का संबंध जोडा जाता है , सर्दी का मौसम खत्म होते ही वसंत रितु प्रारम्भ हो जाती है ।
३) इसे पतंगोत्सव भी कहा जाता है । इस दिन लोग खूब पतंगें भी उडाते हैं । पतंग उडाने के पीछे भी यही मान्यता है कि भगवान सूर्य के उत्तरायण होने पर पतंगें उडाकर उनका स्वागत किया जाता है । लोक कथा है कि भगवान श्री राम नें भी इस दिन पतंग उडाई थी और तभी से इस दिन पतंगें उडाने का प्रचलन है ।
४) इस दिन को महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह की मत्यु के साथ भी जोडा जाता है । कहते हैं कि भीष्म पितामह नें अपनी मत्यु के लिए यही दिन चुना था और यह भी माना जाता है कि जिनकी मत्यु इस दिन होती है उसे फ़िर कभी जन्म नहीं लेना पडता और वह मुक्त हो जाता है ।
५) एक और मान्यता है कि इस दिन भागीरथ गंगा जी को कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर तट तक लाए थे , इस लिए इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्त्व है । लाखों श्रद्धालु इस दिन पावन गंगा में स्नान करते हैं । लोग गंगा सागर जाकर स्नान करते हैं । इस दिन वहां श्राधालुओं की बहुत भीड होती है । तभी कहा जाता है कि -
अन्य तीर्थ बार-बार
गंगासागर एक बार
६) इसका एक भौगोलिक कारण भी है कि इस दिन के बाद दिन बडे और रातें छोटी होने लगती हैं यानि अंधेरे से प्रकाश की ओर अग्रसर होने का संकेत मिलता है । सभी प्राणियों मे नव-चेतना और नव-स्फ़ूर्ति का संचार होता है । इस लिए लोग अपने-अपने ढंग से पूजा- अर्चना करते हैं ।
७) एक पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु नें असुरों का सिर काट कर मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया था और धरती से नकारात्मकता का विनाश किया था ।
८) इस दिन को सुहागिनो के साथ भी जोडा जाता है । माना जाता है कि इस दिन से दिन तिल-तिल कर (थोडा-थोडा ) बढना शुरु होते हैं तो महिलाएं भी अपने पति की लम्बी आयु के लिए हल्दी कुंकुम का टीका लगाती तथा तथा की मिठाई बांट्ती हैं ।
९) मान्यता यह भी है कि भगवान श्री कष्ण जी को पाने के लिए यशोदा जी नें भी इस दिन व्रत किया था ।
१०) इसको उत्तर-प्रदेश में दान का पर्व भी कहा जाता है ।हर वर्ष १४ जनवरी को माघ मेला प्रारम्भ होता है और शिवरात्रि तक लगभग एक माह तक चलता है । इसे खिचडी पर्व भी कहा जाता है ।
११) भारतीय पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित होते हैं किन्तु मकर-संक्रान्ति सूर्य की गति पर आधारिर होता है , इस लिए यह हर वर्ष १४ जनवरी को ही पडता है ।
आपको पता है बच्चो कि तमिलनाडु में यह चार दिन का त्योहार मनाया जाता है । पहले दिन (भोगी पोंगल )घर का कूडा-करकट जलाया जाता है ।दूसरे दिन (सूर्य- पोंगल)लक्षमी जी की पूजा की जाती है । तीसरे दिन (मट्ठू -पोंगल)पशु धन की पूजा की जाती है तथा चौथे दिन(कन्या पोंगल) आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर पकाई जाती है जिसे पोंगल कहा जाता है । सूर्य को नैवेद्य देने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण किया जाता है ।असम में मकर संक्रान्ति को माघ-बिहूया भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं। राजस्थान में सुहागिन महिलाएं सुहाग की चौदह वस्तुओं का दान करती हैं ।
इस तर्ह यह त्योहार भारत के लगभग हर राज्य में अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है ।
प्यारे बच्चो त्योहार कोई भी हो और चाहे उसे किसी भी ढंग से मनाया जाए लेकिन इसका एक मुख्य उद्देश्य होता है भाईचारा तथा प्रेम का संदेश देना । त्योहार हमारे नीरस जीवन में खुशियों का संचार तो करते ही हैं साथ में मिलजुल कर रहने और खुशियां बांट्ने का संदेश भी देते हैं तो चलिए हम भी इन खुशियों में शरीक हो जाएं और खुशी से त्योहार मनाएं ।
आप सब को मकर-संक्रान्ति की हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएं ।
आपकी
सीमा सचदेव


Wednesday, January 13, 2010

लोहडी का त्योहार

नमस्कार ,
आज कौन सा दिन है ? आज है - लोहडी का दिन - पंजाब का सुप्रसिध त्योहार । यह त्योहार मुख्य रूप से पंजाब में बडी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है । इस दिन लोग रेवडी , तिल के लड्डु , मुंगफ़ली , गुड और खूब सारी मिठाईयां खाते है और बांटते भी हैं । मुंह में पानी भर आया । चलो मैं आपको घुमाने ले चलती हूं पंजाब में जहां पर आज यह त्योहार मनाया जा रहा है , और आप भी मेरे साथ खूब सारे तिल के ल्ड्डु और रेवडी खाना । पर उससे पहले यह तो पता लगाएं कि यह त्योहार मनाया क्यों जाता है ।
1.दिन को लोग अपने नायक को याद करते हुए मनाते हैं और वो नायक पता है कौन था- एक डाकु । हैरान मत होना , वो एक डाकु ही था लेकिन बहुत ही विचित्र डाकु था , जिसे गरीबों का मसीहा माना जाता था और उसका नाम था - दूला भट्टी । दूला भट्टी अमीरो का खजाना लूटता और गरीबों में बांट देता , इस तरह वह गरीबों का हीरो कहलाता । एक बार उसने किसी अपहरण्कर्ता से दो लडकियों सुन्दरी और मुन्दरी को छुडवाया था और फ़िर उनका विवाह भी किया और जिस तरह एक पिता अपनी पुत्रियों को विदाई देता है वैसे ही उसने उनको सम्मान सहित अपने घर से विदा किया और उपहार स्वरूप उनको दे थी - एक सेर (किलो) शक्कर । तभी से लोग उस की याद में यह दिन मनाने लगे और इस दिन युवा लडके घर-घर जाकर लोहडी मांगते हुए गीत गाते हैं-
सुन्दर मुन्द्रिए ---हो
तेरा कौन विचारा---हो
दुल्ला भट्टी वाला------हो
दुल्ले धी व्याही-------हो
सेर शक्कर पाई------हो
कुडी दा सालु पाटा------हो
कुडी दा जीवे चाचा ----हो
इस तरह गीत गाते हुए वह पूरे गांव से लकडी , गाय के गोबर की पाथी ----आदि इक्कठा करके रात को जला कर लोहडी का त्योहार मनाते हैं ।

२. लोहडी का त्योहार सूर्य और अग्नि देव की पूजा करते हुए मनाया जाता है । पूस मास में क्योंकि ठण्डी बहुत होती है और सर्दी को भगाने के लिए अग्नि जला कर सूर्य देवता को तपिश देने की प्रार्थना की जाती है । अग्नि से क्योंकि ठण्डॆ मौसम मे राहत मिलती है तो लोग आग जलाकर मिठाईयां , रेवडियां , तिल आदि खाते हुए इसका खूब आनन्द लेते हैं ।

३. प्यारे बच्चो आपने अपनी बुक्स में पढा होगा कि प्राचीन काल में लोग अग्नि की पूजा करते थे तो लोहडी के त्योहार को उसके साथ भी जोडा जाता है । प्राचीन युग में लोग जंगलों में रहकर मांस खाकर गुजारा करते थे । पहले वह कच्चा मांस ही खाते थे लेकिन आग की खोज के बाद वह मांस को भून कर खाने लगे , इसके लिए युवा लडके-लडकियां जंगल में जाकर लकडियां चुनकर लाते थे और उसी तरह आज भी गांवों में युवा लडके-लडकियां घर-घर जाकर लोहडी मांग कर लकडियां मांग कर लाते हैं और रात को उन्हीं लकडियों से लोहडी जलाई जाती है ।

४. बच्चो इस दिन लोहडी जलाकर तिल रेवडी उसमें डाल कर बुराई को खत्म करने का संकल्प भी लिया जाता है । जितनी बुराईयां हैं वो अग्नि में जलकर भस्म हो जाती हैं और नई ऊर्जा और उत्साह मन-मस्तिष्क में भर जाती है । आल्स्य का त्याग और स्फ़ूर्ति प्रदान करने वाला यह त्योहार बडे उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है ।
यह त्योहार देश के अन्य राज्यों जैसे तामिलनाडु में पोंगल , असाम में बिहु आंध्रा-प्रदेश में भोगी --आदि नाम से मनाया जाता है ।
यह फ़सलों की पकाई की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है ।
लेकिन समय के साथ-साथ आज इसको मनाए का तरीका बदल गया है । आज यह त्योहार फ़िल्मीं गानों की तरज़ पर नाचते गाते हुए मनाया जाता है । तो चलो हम भी अपने अंदाज में मनाएंगे और गुनगुनाएंगे



लोहडी आई लोहडी आई
तिल रेवडी साथ में लाई
ठण्डी दूर भगाएंगे
नई ऊर्जा पाएंगे
घर-घर जाकर
लकडियां लाकर
रखदें सब कुछ
चौराहे पर
शोर मचाते , गाना गाते
हाथ पकड कर सबको नचाते
लोहडी खूब जलाएंगे
मिलकर मौज मनाएंगे


चलो अब हम भी तिल के लड्डू और रेवडियां खाते हैं और लोहडी की आप सबको ढेर सारी शुभ-कामनाएं ।
आपकी
सीमा सचदेव


Tuesday, January 12, 2010

सच्ची शान्ति

एक राजा ने शान्ति पर सर्वोत्तम चित्र बनाने वाले कलाकार को पुरस्कार देने की घोषणा की .अनेक कलाकारों ने प्रयास किया .राजा ने सबके चित्रों को देखा परन्तु उसे केवल दो ही चित्र पसंद आए और उसे उनमे से एक को चुनना था ।
एक चित्र था शांत झील का .चारों ओर के शांत ऊंचे पर्वतों के लिए वह झील एक दर्पण के सामान थी .ऊपर आकाश में श्वेत कोमल बादलों के पुंज थे .जिन्होंने भी इस चित्र को देखा उन्हें लगा कि यह शान्ति का सर्वोत्तम चित्रण है ।
दूसरे चित्र में भी पर्वत थे परन्तु ये उबड़ -खाबड़ एवं वृक्ष रहित थे .ऊपर रूद्र आकाश था जिससे वृष्टिपात हो रहा था और बिजली कड़क रही थी .पर्वत के निचले भाग से फेन उठाता हुआ जलप्रपात प्रवाहित हो रहा था ,यह सर्वथा
शान्ति का चित्र नही था ।
परन्तु जब राजा ने ध्यान से देखा ,तो पाया कि जलप्रपात के पीछे की चट्टान की दरार में एक छोटी सी झाड़ी उगी हुई है .झाडी पर एक मादा पक्षी ने अपना घोसला बनाया हुआ था .वहाँ ,प्रचंड गति से बहते पानी के बीच भी वह मादा पक्षी अपने घोसले पर बैठी थी -पूर्णतया शांत अवस्था में !
राजा ने दूसरे चित्र को चुना .उसने स्पष्ट किया ,शान्ति का अभिप्राय किसी ऐसे स्थान पर होना नही है ,जहाँ कोई
कोलाहल ,संकट या परिश्रम न हो ,शान्ति का अर्थ है इन सब के मध्य रहते हुए भी ह्रदय शांत रखना ।
शान्ति का सच्चा अर्थ यही है
योग मंजरी से साभार


Monday, January 11, 2010

हितोपदेश 18- चूहे ने मारी बिल्ली

एक बार बिल्ली थी एक
चूहे खा जाती अनेक
दुःखी थे उससे चूहे सारे
इक दिन सारे मिल के विचारे
सोचा मिलकर एक उपाय
बिल्ली को जा दिया बताय
बोले अपने मन में विचारो
रोज क्यों इतने चूहे मारो
इतने चूहे रोज मारोगी
कितने दिन तक पेट भरोगी
खत्म हो जाएंगे चूहे जब
बोलो क्या करोगी तब
इक चूहा जब तेरा खाना
बाकी सबको क्यों सताना
मानो जो हमारा कहना
अपने घर आराम से रहना
रोज एक चूहा आएगा
पेट तेरा तो भर जाएगा
हम सब भी खुश रह पाएंगे
कुछ दिन तक तो जी पाएंगे
बात यह बिल्ली के मन भाई
सुनकर मन ही मन मुस्काई
बोली अपना वचन निभाना
ठीक समय पर पहुँचे खाना
रोज एक चूहा वहाँ जाता
बिल्ली का भोजन बन जाता
बिल्ली उसे मजे से खाती
पानी पीती और सो जाती
एक बार इक चूहा सयाना
सोचा अब तो है मर जाना
क्यों न सोचे कोई उपाय
जिससे बाकी सब बच जाएँ
जहरीला कुछ खाना खाकर
रुका वो बिल्ली के पास में जाकर
झपट के उसको बिल्ली खा गई
खाते ही धरती पर गिर गई
हो गए सब चूहे आजाद
करते उस शहीद को याद
पर हित खातिर दे दी जान
यही तो वीरों की पहचान
मर कर स्वयं वो सबको बचाए
तभी तो अमर शहीद कहाए


Tuesday, January 5, 2010

दशम पिता श्री गुरु गोबिन्द सिंह

नमस्कार बच्चो ,
आपको पता है कौन सा दिन था - कल था गुर-पूर्व । सिक्ख धर्म के दशम गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म-दिवस । आपको संत ,सिपाही , कवि , तपस्वी और बलिदानी गुरु जी का संक्षिप्त जीवन परिचय करवाने का एक लघु प्रयास किया है काव्य-कथा के माध्यम से ,जिनके परिचय में ग्रन्थ भी लिखे जाएं तो कम ही पडेंगे ।
दशम पिता श्री गुरु गोबिन्द
माने जिनको पूरा हिन्द
नवम गुरु की जो संतान
उस जैसा न कोई महान
संत सिपाही जग रखवाला
मिटा दिया जिसने धुंध काला
सोलह शत छयासठ सन
पटना शहर हुआ पावन
मां गुजरी की गोदि में आए
सोढी गोबिन्द राय कहाए
बचपन से ही बहुत बलवान
कम आयु पर सोच महान
खेल-खेल में फ़ौज बनाते
दुश्मन से जाकर भिड जाते
सच्चाई की दिखाते राह
भरा था उनमें ग्यान अथाह
वीरता का पाठ पढाते रहते
न्याय की राह दिखाते रहते
देश और स्व कौम के हेतु
बन गए वो धर्म का सेतु
सोलह सौ पचहत्र सन
घर आए कशमीरी ब्राह्मण
नवम गुरु से की फ़रियाद
कराओ मुगलों से आजाद
जुल्म और न हम सह पाएं
कहो तो जीते जी मर जाएं
चाहिए ऐसा वीर महान
धर्म पे हो जाए जो कुर्बान
बाल गोबिन्द ने सुनी यह बात
नन्हे मन पर लगा आघात
पिता से करने लगे निवेदन
तुमसे बडा न कोई जन
धर्म की रक्षा में कुर्बान
करके बनो शहीद महान
नन्हे सुत की बात बडी
उठे नवम गुरु उसी घडी
सुत नें जो मार्ग दिखलाया
सीस दिया और धर्म बचाया
कोमल और कठोर का संगम
कवि ,वीर और अरि का यम
खालसा पंथ गुरु ने चलाया
स्वय़ं को गोबिन्द सिंह बनाया
चुनकर सभा में पांच प्यारे
दे दिए उनको रूप न्यारे
कंघा कडा केष किरपान
दे दी सिंहो को पहचान
कराया हाथ से अमत पान
सिंह सम भर दी उनमें जान
नहीं डरना न शीश झुकाना
कौम की खातिर बस मर जाना
जुल्मी का न देना साथ
सेवा में रत रखना हाथ
ऐसा गुरु नें पाठ पढाया
माना जो वो सिक्ख कहाया
जुल्म की खातिर तान के सीना
मुश्किल किया मुगलों का जीना
गढी चमकौर में हुई लडाई
दो लालों नें शहीदी पाई
हुए शहीद अजीत जुझार
फ़िर भी कभी न मानी हार
देश की खातिर मर जाएंगे
अकेले लाख से लड जाएंगे
कट जाएंगे नहीं झुकेंगे
जुल्म कभी न कोई सहेंगे
फ़तेह सिंह और जोरावर
छोटे सुत गुरु के बहादुर
जिन्दा नीवों में चिनवाया
फ़िर भी उन्होंने सिर न झुकाया
वीर पिता की वीर संतान
चारों सुत हो गए कुर्बान
आखिर में नन्देड में आए
कुछ दिन गुरु नें वहां बिताए
सरहिन्द नवाब खान वज़ीर
लगवा दिया गुरु को तीर
गुरु गोबिन्द गए सब जान
आया ईश्वर का फ़रमान
ग्रन्थ साहिब को गुरु बनाया
सब सिक्खों को हुक्म सुनाया
प्रक्ट है इसमें गुरु की देह
रखना न मन में सन्देह
मानो इसको पाओ विजय
वाहेगुरु का खालसा , वाहेगुरु की फ़तेह
गुरपूर्व की हार्दिक बधाई - सीमा सचदेव


नन्हा मुन्ना

मै नन्हा सा मुन्ना प्यारा
सबकी आंखों का तारा
बेशक हूं मैं छोटा बच्चा
किन्तु नहीं अक्ल में कच्चा
सबको नाच नचाता हूं
रोकर सब मनवाता हूं
प्यार से जो भी मुझे बुलाए
मैं उसका हो जाता हूं ।