Saturday, January 23, 2010

स्वेटर पर स्वेटर पहनाती है माँ

स्वेटर पर स्वेटर पहनाती है माँ
उस पर भी जैकेट लदवाती है माँ
मै कपड़ों का गठर नज़र आता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

गरम दूध बौर्नवीटा के संग भर देती है
आइसक्रीम कुल्फी सब बंद कर देती है
मै दूर से देख उनको लार टपकाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

माँ सुबह सुबह नहलाती है
हम पर कितना जुल्म ढाती है
अब तो पानी देख के घबराता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

खेल प्रारंभ करते ही ख़त्म होजाता है
सूरज भी ठण्ड में जल्दी ही सो जाता है
घर में बैठा बैठा बोर हो जाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

जेब से हाथ निकलते ही ठंडा हो जाता है
ठन्डे हाथों से पेन भी कहाँ पकड़ा जाता है
बहुत मुश्किल से थोडा ही लिख पाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

टीचर इतना होमवर्क देती है
सोचती नहीं की उम्र हमारी छोटी है
न हो पूरा काम तो मार खाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

जड़े की छुट्टी और लम्बी होनी चाहिए
हम को भी आज़ादी मिलनी चाहिए
सब को यही बात सुनाता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ

--रचना श्रीवास्तव


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6 पाठकों का कहना है :

Dipti का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर कविता...

रावेंद्रकुमार रवि का कहना है कि -

"स्वेटर पर स्वेटर पहनाती है माँ,
उन पर भी जैकेट लदवाती है माँ!
मैं कपड़ों का गट्ठर नज़र आता हूँ
ठण्ड में जब भी स्कूल जाता हूँ!"
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बहुत सुंदर और ताज़ा लगीं - ये पंक्तियाँ!

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क्यों हम सब पूजा करते हैं, सरस्वती माता की?
लगी झूमने खेतों में, कोहरे में भोर हुई!
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संपादक : सरस पायस

laxmi का कहना है कि -

simply Beautiful!!

rachana का कहना है कि -

aap sabhi ka kavita pasand karne ka bahut bahut dhnyavad
rachana

shanno का कहना है कि -

रचना जी,
इतनी प्यारी और सुन्दर रचना लिखने के लिये आप बधाई का पात्र हैं. बहुत, बहुत, बहुत बढ़िया लगी मुझे यह. आपको बधाई और गणतंत्र दिवस पर आपको व सभी को शुभकामनायें.

rachana का कहना है कि -

aap ko bhi bahut bahut badhai ho .
kavita pasand karne ke liye dhnyavad.
kahan rah gain thi aap thodi der kar di aane me.
saader
rachana

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