Tuesday, January 5, 2010

दशम पिता श्री गुरु गोबिन्द सिंह

नमस्कार बच्चो ,
आपको पता है कौन सा दिन था - कल था गुर-पूर्व । सिक्ख धर्म के दशम गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म-दिवस । आपको संत ,सिपाही , कवि , तपस्वी और बलिदानी गुरु जी का संक्षिप्त जीवन परिचय करवाने का एक लघु प्रयास किया है काव्य-कथा के माध्यम से ,जिनके परिचय में ग्रन्थ भी लिखे जाएं तो कम ही पडेंगे ।
दशम पिता श्री गुरु गोबिन्द
माने जिनको पूरा हिन्द
नवम गुरु की जो संतान
उस जैसा न कोई महान
संत सिपाही जग रखवाला
मिटा दिया जिसने धुंध काला
सोलह शत छयासठ सन
पटना शहर हुआ पावन
मां गुजरी की गोदि में आए
सोढी गोबिन्द राय कहाए
बचपन से ही बहुत बलवान
कम आयु पर सोच महान
खेल-खेल में फ़ौज बनाते
दुश्मन से जाकर भिड जाते
सच्चाई की दिखाते राह
भरा था उनमें ग्यान अथाह
वीरता का पाठ पढाते रहते
न्याय की राह दिखाते रहते
देश और स्व कौम के हेतु
बन गए वो धर्म का सेतु
सोलह सौ पचहत्र सन
घर आए कशमीरी ब्राह्मण
नवम गुरु से की फ़रियाद
कराओ मुगलों से आजाद
जुल्म और न हम सह पाएं
कहो तो जीते जी मर जाएं
चाहिए ऐसा वीर महान
धर्म पे हो जाए जो कुर्बान
बाल गोबिन्द ने सुनी यह बात
नन्हे मन पर लगा आघात
पिता से करने लगे निवेदन
तुमसे बडा न कोई जन
धर्म की रक्षा में कुर्बान
करके बनो शहीद महान
नन्हे सुत की बात बडी
उठे नवम गुरु उसी घडी
सुत नें जो मार्ग दिखलाया
सीस दिया और धर्म बचाया
कोमल और कठोर का संगम
कवि ,वीर और अरि का यम
खालसा पंथ गुरु ने चलाया
स्वय़ं को गोबिन्द सिंह बनाया
चुनकर सभा में पांच प्यारे
दे दिए उनको रूप न्यारे
कंघा कडा केष किरपान
दे दी सिंहो को पहचान
कराया हाथ से अमत पान
सिंह सम भर दी उनमें जान
नहीं डरना न शीश झुकाना
कौम की खातिर बस मर जाना
जुल्मी का न देना साथ
सेवा में रत रखना हाथ
ऐसा गुरु नें पाठ पढाया
माना जो वो सिक्ख कहाया
जुल्म की खातिर तान के सीना
मुश्किल किया मुगलों का जीना
गढी चमकौर में हुई लडाई
दो लालों नें शहीदी पाई
हुए शहीद अजीत जुझार
फ़िर भी कभी न मानी हार
देश की खातिर मर जाएंगे
अकेले लाख से लड जाएंगे
कट जाएंगे नहीं झुकेंगे
जुल्म कभी न कोई सहेंगे
फ़तेह सिंह और जोरावर
छोटे सुत गुरु के बहादुर
जिन्दा नीवों में चिनवाया
फ़िर भी उन्होंने सिर न झुकाया
वीर पिता की वीर संतान
चारों सुत हो गए कुर्बान
आखिर में नन्देड में आए
कुछ दिन गुरु नें वहां बिताए
सरहिन्द नवाब खान वज़ीर
लगवा दिया गुरु को तीर
गुरु गोबिन्द गए सब जान
आया ईश्वर का फ़रमान
ग्रन्थ साहिब को गुरु बनाया
सब सिक्खों को हुक्म सुनाया
प्रक्ट है इसमें गुरु की देह
रखना न मन में सन्देह
मानो इसको पाओ विजय
वाहेगुरु का खालसा , वाहेगुरु की फ़तेह
गुरपूर्व की हार्दिक बधाई - सीमा सचदेव


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3 पाठकों का कहना है :

हृदय पुष्प का कहना है कि -

बच्चों के बेशक थोड़ी सी कठिन और लम्बी लगे लेकिन मुझे तो बहुत अच्छी लगी. सीमा जी आपको भी गुरु पर्व की बधाई, और नव वर्ष २०१० की मंगल कामना. कविता के लिए आभार और धन्यवाद्.
वाहेगुरु का खालसा, वाहेगुरु की फ़तेह.

Sujan Pandit का कहना है कि -

Kavita sargarvit hai. Achchi lagi - GURU PARB KI BADHAI.

neelam का कहना है कि -

seema ji gurupurav ki v navvarsh ki bahut -bahut badhaai,guru purav ki prastuti ke liye aabhar

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