Friday, March 20, 2009

घमण्डी बाला


घमण्डी बाला


एक कहानी आज सुनाऊँ
शीश महल का राज बताऊँ

शीश महल मे रहती बाला
पर बाला का दिल था काला

थी वो बाला बडी घमण्डी
गुस्से मे दिखती थी चण्डी

शीश महल के अन्दर रहती
और लोगो को गन्दा कहती

सारी दुनिया मै देखुँगी
पर ना किसी से बात करूँगी

यहाँ से देखुँगी आकाश
बन्द कमरे मे भी प्रकाश

मेरा घर है कितना सुन्दर
मै तो रहुँगी इसके अन्दर

फैन्कती ऊपर से वह पत्थर
लोगो के घायल होते सिर

मार के पत्थर वो हँस देती
खुद को अन्दर बन्द कर लेती

बडे दुखी थे लोग बेचारे
करते क्या सारे के सारे

पर बच्चो यह करो विश्वास
फलता नही घमण्ड दिन खास

इक दिन एक परिन्दा आया
कङ्कर उसने मुँह मे दबाया

शीश महल उसने जब देखा
देख के रह गया वो भौच्चका

हुई थी उसको बहुत हैरानी
खुली चोञ्च ,कर दी नादानी

गिरा वो कङ्कर शीश महल पर
जिससे टूटा बाला का घर

देखती रह गई उसको बाला
लग गया उसके मुँह पे ताला

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बच्चो तुम भी सीखो इससे
बुरा करम न हो कोई जिससे

शीशे के होते जिनके घर
नही फैन्कते दूसरो पे पत्थर

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यह कहानी आप नीलम मिश्रा की आवाज़ में सुन भी सकते हैं-


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3 पाठकों का कहना है :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

सीमाजी! इस जीवंत और उपयोगी रचना के लिए हार्दिक बधाई. आपकी रचनायें युग्म को निखारती हैं. सहज-सरल बोधगम्य शब्द संयोजन सराहनीय है

manu का कहना है कि -

सीमा जी, कामाल की कथा और कमाल का चित्र ,,,,,काफी देर तक देखा और फिर हैरान रह गया,,,,के आपने कहाँ से ढूंढकर फिट किया है,,,,,या शायद चित्रा पर ये शानदार कविता लिखी है,,,,पर जो है लाजवाब है,,,,
आचार्य को प्रणाम,
पिछली पोस्ट पर ( आप दो धुरंधरों ) के जोरदार मीठे बाण देखे,,,,, उस समय बीच में आना मुनासिब ना समझा,,,( वाकई आनद आ रहा था,,,) दोनों ही एक से बढ़कर एक ,,, ऐसी ही प्यारी सी नोकझोंक का मौका कभी फिर दीजियेगा,,
राजनैतिक दलों को जीवन में केवल एक बार ही वोट दिया है,,,,,( वो भी युग्म के बहकावे में आकर :::))),,,,,,,,,,,,,,,
पर यदि यहाँ पर वोट देने की बात हो तो नारी के पक्ष में सदा की तरह दूंगा,,,,,बराबर का नहीं ,,
मुझे कुछ ऊंचा दर्जा लगता है नारी का,,,,,,

neelam का कहना है कि -

seema ji ,
ghamandi bala kavita hume behad pasand aayi hai.

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