Friday, March 6, 2009

होली का त्यौहार

होली का त्यौहार ।
रंगों का उपहार ।

प्रकृति खिली है खूब ।
नरम नरम है दूब ।

भांत भांत के रूप।
भली लगे है धूप ।

गुझिया औ मिष्ठान ।
खूब बने पकवान ।

भूल गये सब बैर ।
अपने लगते गैर ।

पिचकारी की धार ।
पानी भर कर मार ।

रंगों की बौछार ।
मस्ती भरी फुहार ।

मीत बने हैं आज
खोल रहे हैं राज ।

नीला पीला लाल ।
चेहरों पे गुलाल ।

खूब छनी है भांग ।
बड़ों बड़ों का स्वांग ।

मस्ती से सब चूर ।
उछल कूद भरपूर ।

आज एक पहचान ।
रंगा रंग इनसान ।

कवि कुलवंत सिंह


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6 पाठकों का कहना है :

neelam का कहना है कि -

भूल गये सब बैर ।
अपने लगते गैर

kulwant ji ye panktiyaan galat hai ,
inhe phir se dekhiye

संगीता पुरी का कहना है कि -

बहुत सुंदर ... होली है ही आखिर होली।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

भूल गये सब बैर ।
अपने लगते गैर ।

दूसरी पंक्ति में एक अल्प विराम चाहिए. यदि अपने के बाद अल्प विराम हो तो अर्थ होगा की गैर भी अपने लग रहे हैं- यही कवि का आशय है.
अल्प विराम लगते के बाद हो तो अर्थ होगा कि अपने भी गैर लग रहे हैं- यह कवि का आशय नहीं है. विराम न होने से अर्थ ग्रहण करना में गलतफहमी हो सकती है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक का कहना है कि -

आयी होली, आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।

मुन्नी आओ, चुन्नी आओ,
रंग भरी पिचकारी लाओ,
मिल-जुल कर खेलेंगे होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

मठरी खाओ, गुँजिया खाओ,
पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,
मस्ती लेकर आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

रंगों की बौछार कहीं है,
ठण्डे जल की धार कहीं है,
भीग रही टोली की टोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

परसों विद्यालय जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
मेहनत से पढ़ना हमजोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

manu का कहना है कि -

yaa,
bhool gaye sab bair,
kise kahein ab gair

Kavi Kulwant का कहना है कि -

thanks dear friends! for your love..

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