Friday, March 20, 2009

चंदामामा

चंदा रहते हो किस देश ।
लगते हो तुम सदा विशेष ।

रहते हो तुम भले ही दूर ।
मुख पर रहता हर पल नूर ।

दिखते हो तुम शीतल शांत ।
सागर हो तुम्हे देख अशांत ।

बने सलोनी तुमसे रात ।
करते हैं सब तुमसे बात ।

घटते बढ़ते हो दिन रात ।
समझ न आये हमको बात ।

कभी चमकते बन कर थाल ।
गायब हो कर करो कमाल ।

शीतलता का देते दान ।
नही चाँदनी का उपमान ।

तारों को है तुमसे प्रीत ।
रात बिताते बन कर मीत ।

धवल चांदनी का आभास ।
मन में भरे हर्ष उल्लास ।

करवा चौथ भले हो ईद ।
देख तुम्हे मनते यह तीज ।

पूरा छिप जाते जिस रात ।
बन जाती वह काली रात ।

थकते नही तुम्हारे अंग ।
घूम घूम कर धरती संग ।

चंदा रहते हो किस देश ।
लगते हो तुम सदा विशेष ।

कवि कुलवंत सिंह


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3 पाठकों का कहना है :

अनिल कान्त : का कहना है कि -

यह बाल कविता पढ़ बचपन लौट आया

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

सीमा सचदेव का कहना है कि -

कवि जी बहुत हे प्यारी कविता है , इसे पढकर तो गाने को मन कर रहा है |

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

बंधु! मजा आ गया, इस रसमय रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई. एक-एक शब्द चुन-चुनकर आपने समूचा बिम्ब जीवंत कर दिया.

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