Sunday, March 8, 2009

होली-कथा काव्य - श्री राधा-कृष्ण की होली

आओ बच्चो तुम्हें सुनाऊं
होली का इक भेद बताऊं
एक बार छोटे से कान्हा
माँ को देने लगे उलाहना
क्यों कुदरत ने भेद है पाला
राधा गोरी और मै काला
गोरे रंग पे उसे गुमान
करती है बहुत अभिमान
मुस्काई सुन जसुमति मैया
सुत की लेने लगी बलैया
हँसी हँसी में माँ यूँ बोली
राधा भी तेरी हमजोली
भ्रम कोई न मन में पालो
जाओ राधा को रंग डालो
कान्हा को मिल गया बहाना
ग्वालों संग पहुंचे बरसाना
सखियों संग राधा को पाया
गुलाल जा चुपके से लगाया
सखियों ने भी लट्ठ चलाया
इक दूजे को रंग लगाया
खेल खेल में खेली होली
बन गए वो सारे हमजोली
तब से यह हर वर्ष मनाएं
जब फागुन की पूनम आए

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पाठक का कहना है :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आत्मीय !
वन्दे मातरम.
रंगोत्सव पर सरस प्रसंग पर रचना के लिए बधाई. माँ बच्चे की 'बलैया' लेती है, नज़र उतारती है.
आपने 'बलाई' शब्द का प्रयोग किया है. 'बलाई' है का अर्थ कष्ट, आफत, मुसीबत है.--देखें वृहत हिंदी कोष, संपादक -कालिका प्रसाद,राज वल्लभ सहाय, मुकुन्दी लाल श्रीवास्तव, पृष्ठ ७९३. 'बलैया' को पदांत में रखने पर तुक मिलाने में कठिनाई होगी. यह शब्द पंक्ति के प्रारंभ या मध्य में हो तो सही शब्द के प्रयोग के साथ तुक भी सहजता से मिल सकेगी. आप जैसी समर्थ रचनाकार से शुद्धता की आशा है. कृपया अन्यथा न लें. रंगोत्सव की शत-शत शुभ कामनाएं

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