Tuesday, June 2, 2009

धरती






तितली भौंरे इस पर झूमें
रोज हवाएं इसको चूमें
चंदा इसका भाई चचेरा
बादल के घर जिसका डेरा
रोज लगाती सूरज फेरा
रात कहीं है, कहीं सवेरा
पर्वत, झील, नदी, झरने
नित पड़ते पोखर भरने
लोमड़, गीदड़ शेर-बघेरे
करते निशि-दिन यहां चुफेरे
बोझ हमारा जो है सहती
वही हमारी प्यारी धरती


--श्याम सखा 'श्याम'


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3 पाठकों का कहना है :

manu का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर लिखा है,,,,

Shamikh Faraz का कहना है कि -

चंदा इसका भाई चचेरा
बादल के घर जिसका डेरा

क्या खूब रिश्तेदारी बताई है आपने. रचना के लिए बधाई.

TechGape.Com का कहना है कि -

बहुत ही प्‍यारी कविता और उतना ही प्‍यारा संदेश।

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