Friday, June 5, 2009

बाल कविताओं का समन्‍दर


बाल कविता वह नहीं है, जिसे बड़ों के साथ साथ बच्‍चे भी पढ़ते हैं, बाल कविता वह है, जो बच्‍चों के मनोविज्ञान को ध्‍यान में रखकर उनके लिए लिखी जाए। और आदर्श बाल कविताऍं कैसी होनी चाहिए, यह देखना हो तो बचपन एक समन्‍दर से अच्‍छी जगह कोई नहीं हो सकती है।

बच्‍चों के समर्थ कवि और बाल कविता में नित नए प्रयोग करने वाले रचनाकार श्री कृष्‍ण शलभ द्वारा सम्‍पादित यह पुस्‍तक बाल कविताओं का महासागर है, जिसमें उन्‍होंने बड़े श्रम के साथ 293 रचनाकारों की 666 प्रतिनिधि बाल कविताओं का संकलन किया है।

इस खजाने में जहॉं एक ओर मॉं कह एक कहानी (मैथिलीशरण गुप्‍त), चाह नहीं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं (माखनलाल चतुर्वेदी), हठ कर बैठा चॉंद एक दिन (रामधारी सिंह दिनकर) और यदि होता किन्‍नर नरेश मैं (द्वारिका प्रसाद माहेश्‍वरी) जैसी बाल साहित्‍य की बेहद चर्चित रचनाएं संकलित हैं, तो दूसरी ओर मौसम की चिडिया लाई है लो खुशियों के फूल (आसिम परीजादा), धूप न निकली आज कहीं बीमार तो नहीं (नागेश पाण्‍डेय संजय), बापू तुम्‍हें कहूँ मैं बाबा या फिर बालूं नाना (ज़ाकिर अली रजनीश) और पवन झकोरा कितना नटखट, दरवाजों को खोला खटपट (मो0 अरशद खान) जैसी आज की प्रयोगधर्मी रचनाऍं भी संजोई गयी हैं।

बाल कविताओं के इस महासागर में यूँ तो सभी रचनाऍं अपनी शैली और बुनावट के आधार पर एक से बढ़कर एक हैं, पर उनमें से बहुत सारी कविताऍं तो लाजवाब ही कर देती हैं। ऐसी ही कुछ रचनाओं की बानगी देखिए-

नटखट हम हॉं, नटखट हम, करने निकले खटपट हम। (स्‍वर्ण सहोहर)

ऑंधी आई जोर से, डालें टूटीं झकोर से।
उड़ा घोंसला अंडे फूटे, किससे दुख की बात कहेगी,

आज उठा मैं सबसे पहले।
सबसे पहले आज सुनूंगा,
हवा सवेरे की चलने पर, हिल पत्‍तों का करना हर-हर।
देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले, लाल सुनहले। (हरिवंश राय बच्‍चन)

अगर-मगर दो भाई थे, लड़ते खूब लड़ाई थे। (निरंकार देव सेवक)

इब्‍न बतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में।
थोड़ी हवा नाक में झुस गयी, घुस गयी थोड़ी कान में। (सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना)

खिड़की ज्‍यों ही खुली कि आकर अंदर झांकी धूप।
आकर पसर गयी सोफे पर, बॉंकी-बॉंकी धूप। (दामोदर अग्रवाल)

पापा तंग करता है भैया। (प्रकाश मनु)

अले, छुबह हो गई। (रमेश तैलंग)

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी कहॉं हमारी?
रोज अकेले आते हो, मामी को न लाते हो।
सच्‍ची-सच्‍ची बात बताओ, ऐसी क्‍या लाचारी? (हरीश निगम)

आकर बैठी दरवाजे पर, उछली पहुंच गयी छज्‍जे पर,
वह नन्‍हीं चिडिया सी धूप। (सूर्य कुमार पाण्‍डेय)

पुस्‍तक के प्रारम्‍भ में 52 पृष्‍ठों में दी गयी आलोचनात्‍मक भूमिका इस ऐतिहासिक महत्‍व की पुस्‍तक की उपयोगिता में चार चॉंद लगाती है। साथ ही साथ यह इस बात को भी प्रमाणित करती है कि एक अच्‍छा रचनाकार ही एक अच्‍छा सम्‍पादक भी हो सकता है। पुस्‍तक का अध्‍ययन करने के बाद यह कहा जा सकता है कि बच्‍चों, बालसाहित्‍यकारों, पुस्‍तकालयों, बच्‍चों के स्‍कूलों, सामाजिक संस्‍थाओं, अभिभावकों और कविता के प्रेमियों के लिए यह अपरिहार्य कृति है।

730 पृष्‍ठों की इस अद्वितीय पुस्‍तक की अगर कोई कमी है, तो वह है इसका दाम (750 रू0)। लेकिन यदि आप वास्‍तव में इस पुस्‍तक को प्राप्‍त करना चाहते हैं, तो संपादक जी को फोन लगाऍं और उनके इस सम्‍बंध में बात करें। मेरा विश्‍वास है कि वे सुधि पाठकों के लिए इसमें उचित छूट प्राप्‍त करने का रास्‍ता अवश्‍य बताएंगे।

पुस्‍तक- बचपन एक समन्‍दर
सम्‍पादक- कृष्‍ण शलभ (9358326621)
प्रकाशक- नीरजा स्‍मृति साहित्‍य न्‍यास, 245, नया आवास विकास, सहारनपुर 247001 (उ0प्र0)
वितरक- मेधा बुक्‍स, X-11, नवीन शाहदरा, दिल्‍ली 110032 (फोन 22323672)
प्रथम संस्‍करण- 2009


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6 पाठकों का कहना है :

बालसुब्रमण्यम का कहना है कि -

बच्चों में पुस्तकें पढ़ने की आदत डालना महत्वपूर्ण है। इस पुस्तक का परिचय देने के लिए आभार।

Shamikh Faraz का कहना है कि -

बल कविता क्या है. सही मायनों में मुझे आज पता रजनीश जी के इस लेख से. खासतौर पर जो पंक्ति सबसे अच्छी लगी वो यह रही

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी कहॉं हमारी?

Manju Gupta का कहना है कि -

Shri Krishna ji ko badhai. Prathistit kaviyo ki kavita ka
sankalan pathakon ko ek hi pustak mei mil jayega.
Pratiyogita ke liye aur gyan badane ke liye uttam pustak hai.

Manju Gupta.

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

बाल कविता वह नहीं है, जिसे बड़ों के साथ साथ बच्‍चे भी पढ़ते हैं, बाल कविता वह है, जो बच्‍चों के मनोविज्ञान को ध्‍यान में रखकर उनके लिए लिखी जाए।
बहुत जरूरी सलाह है बाल साहित्य लिखने वाले साहित्यकारोंके लिये
इस संग्रह में अच्छी कविताएं हैं और भी अनेक लोग बहुत सुन्दर बाल साहित्य लिख रहे हैं जैसे
डॉ०-अजय जनमेजय बिजनौर न केवल लोकप्रिय व कुशल शिशु रोग विशेष्ज्ञ व प्रसिद्दःगजल कार हैं अपितु
बाल साहित्य पर उनकी ४-५ पुस्तकें काफ़ी सराही गई हैं-
उनका दो शे‘र देखें
माना वो अपवाद रहा
लेकिन सबको याद रहा
उसको भूली दुनिया सारी
पत्थर जो बुनियाद रहा
श्याम सखा श्याम

रानी पात्रिक का कहना है कि -

पुस्तक के बारे में सभी बातें विस्तार से बताने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। अब तो इसे खरीदना ही होगा। क्या कोई ई-मेल की सुविधा है संपादक जी से संपर्क करने के लिए?

Disha का कहना है कि -

अच्छी जानकारी देने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया.
आजकल के माहौल में जहाँ बच्चे भी बडो़ सा व्यवहार करने लगे है यह संग्रह बच्चों को वापस बचपन की गलियों में अठखेलियां करने देगा.

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