Monday, February 2, 2009

पढ़ना आसान है


प्यारे बच्चों
आज मैने श्री विकेश बेनीवाल जी की एक किताब पढ़ी, उसके कुछ अंश मुझे बहुत अच्छे लगे। आपके साथ बाँटना चाहती हूँ। पढ़ें और बताएँ कि आपको कैसा लगा।
आपको शायद मेरी बात अटपटी लगे लेकिन वह सत्य है कि पढ़ना आसान है और मैं इसे सिद्ध भी कर सकता हूँ। अच्छा चलिए यह बताइए कि जो बच्चे पढ़ते नहीं वे क्या करते हैं ? ढ़ाबों पर बर्तन साफ करते हैं, घरों में झाड़ू-पोंछा लगाते हैं, रिक्शा चलाते हैं या इसी तरह के कुछ और काम करते हैं जैसे बेलदारी करना, वज़न ढोना, मालीगिरी करना, सड़क बनाना आदि-आदि। अब आप खुद सोच कर देखिए कि यह सब आसान है या पढ़ना ? जो बच्चे नहीं पढ़ते उन्हें ऐसे ही काम करने पड़ते हैं। इस बात को दिमाग में बैठा लो कि पढे-लिखे लोग ज्यादा सुखी, ज्यादा मज़ेदार,ज्यादा आनन्दमय, ज्यादा सम्मानित तथा ज्यादा शान्ति पूर्ण जीवन जीते हैं। तो आप सब भी अच्छा और सुखी जीवन जीना चाहते हैं ना ? फिर देर किस बात की है। उठाओ किताबें और कर दो पढ़ना शुरू। भगवान आपकी मनोकामना पूर्ण करेगा।
साभार
(उठो जागो और बढ़े चलो )
लेखक-विकेश बेनीवाल


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5 पाठकों का कहना है :

manu का कहना है कि -

जी शोभा जी,
एक बात मुझे और भी लगती है ...के हम जो टी . वी. वगैरह देखते हैं...उस की अपेक्षा पढ़ने से हमारी रचनात्मकता बढती है.....किसी भी चीज के बारे में हमें अपनी कल्पना का मौका मिलता है.....जो के फ़िल्म या टी वी से उतना संभव नहीं हो पाता

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) का कहना है कि -

धन्यवाद,
बच्चों को शिक्षा की तरफ़ ले जाने के लिए रोचक और सटीक उदाहरण हैं.
जारी रहिये रोचक और उत्प्रेरक विवरण के साथ.

संगीता पुरी का कहना है कि -

अच्‍छा सिखलाया है बच्‍चों को.....

neelam का कहना है कि -

मन लगाकर पढ़ना ,सबसे कठिन काम है ,और उसे आसान बनाना ही हम सभी का काम है |
शिक्षा सभी को सुलभ हो इसी कामना के साथ आपकी अपनी |

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

पढत पढ़त पत्थर भये, लिखत लिखत कमजोर
चढ़ जा बेटा छ्त्त पर ले पतंग और डोर...
ले पतंग और डोर , दनादन पेच लडावे
रोटी अच्छी लगे ना भैया पानी भावे...
प्यास लगे तो पीवे बींड़ी.............
ऐसो पूत सपूत तार दे सातों पीड़ी..........

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