Monday, November 9, 2009

सूरज की ज़िद

ज़िद कर बैठा सूरज एक दिन,
अब नही करूँगा सेवा
चाहे धरती अम्बर मिलकर
जितना भी दे मुझे मेवा


मेरे कारण दिन होते है
मेरे कारण राते
मैं गर्मी में तपता रहता
फिर चाहे कितनी हो बरसातें

सुन लो देवी और देवताओ
और धरती के पुत्रो....
इस गर्मी ने छीन लिया है
मेरा सुख और चैना


मेरा हाल नही अच्छा है
और मैं क्या बतलाऊँ
सोंच रहा हूँ इस गर्मी में
हिल स्टेशन हो आऊँ

--प्रिया चित्रांशी


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4 पाठकों का कहना है :

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

प्रकृति का बदलता रूप
सूरज पसीने से तर बतर
किया ऐलान छुट्टी का
या खुदा !
चाँद की ड्यूटी ही डबल कर दे..........
इतनी अच्छी कविता को मेरी नन्हीं तुकबंदी का तोहफा

vandana का कहना है कि -

waaaaaaaw gr88888 one

मेरा हाल नही अच्छा है
और मैं क्या बतलाऊँ
सोंच रहा हूँ इस गर्मी में
हिल स्टेशन हो आऊँ

sach me bahut nainsafi ho rahi hai bechare sooraj k saath to

rajiv का कहना है कि -

कविता के भाव बहुत अच्छे हैं लेकिन..
हमें तो शरद की रात अच्छी लगती है
गुनगुनी धूप में फूलों की बारात अच्छी लगती है
गर्मी हो या सर्दी फिर भी हिल स्टेशन की बात अच्छी लगती है

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) का कहना है कि -

बहुत अच्छी कविता... सूरज चाचू की नाराज़गी जायज है..

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