Friday, April 4, 2008

जय हो ! भारत माँ की जय हो !

मुकुट शीश उन्नत शिखर
पदतल गहरा विस्तृत सागर
शोभित करती सरिताएं हों
जय हो ! भारत माँ की जय हो !

सत्य, अहिंसा, त्याग भावना
सर्वमंगल कल्याण प्रार्थना
जन - जन हृदय महक रहा हो
जय हो ! भारत माँ की जय हो !

पुरा संस्कृति उत्थान यहीं पर
धर्म अनेक उद्गम यहीं पर
पर उपकार सार निहित हो
जय हो ! भारत माँ की जय हो !

विद्वानो, वीरों की पुण्य धरा
बलिदानों से इतिहास भरा
तिलक रक्त मस्तक धरा हो
जय हो ! भारत माँ की जय हो !

साहित्य, खगोल, आयुर्विज्ञान
योग, अध्यात्म, अद्वैत, ज्ञान
ज्ञानी, दृष्टा, ऋषि, गुणी हों
जय हो ! भारत माँ की जय हो !

राष्ट्र उत्थान भाव निहित हो
धर्म दया से अनुप्राणित हो
जग में भारत विस्तारित हो
जय हो ! भारत माँ की जय हो !

कवि कुलवंत सिंह


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4 पाठकों का कहना है :

seema sachdeva का कहना है कि -

JAI HO BHARAT MAA KI , Aapki kavita desh bhakti se bharpoor hai ,lekin jis shabdaavali ka pryog hai vah bachcho ke star se kahee upar hai , bachcho ke liye desh-bhakti bharpoor saahitay hona chaahiye ,thodi aasaan bhaasha me jise bachche aasaani se samajh sake ,mai yah nahi kah rahi ki kavita me koi kami hai , balki uch-striya hai aapki kavita aur namn hai aapki kalam ko jisase itani pyaari kavita rachi gai.....seema sachdev

शोभा का कहना है कि -

कुलवन्त जी
बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

कुलवंत जी,

मैं सीमा जी के विचारों से सहमत हूँ। आप भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करके देशभक्ति की भावना जगाने में न सफल होकर डराने में ज़रूर सफल हो रहे हैं।

Anonymous का कहना है कि -

क्या कहें,ह्म्म्म्म..क्ल्वंत जी यू ही बच्चों को अच्छे अच्छे सबक देते रहिए
आलोक सिंघ "साहील'

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