Monday, April 21, 2008

कौआ और कबूतर


एक कबूतर एक था कौआ
रहते थे उपवन में भैया
पास-पास थे दोनों के घर
बातें करते दोनों अकसर
दोनों ही की अलग थी जाति
पर सुख-दुख के अच्छे साथी
कबूतर बड़ा ही सुस्त था भैया
बैठा रहता पेड़ की छैया
पर उतना ही चतुर था कौआ
न देखे वह धूप न छैया
कौआ सुबह-सुबह ही जाता
जो भी मिलता घर ले आता
दोनों मिलकर खाना खाते
गाना गाते और सो जाते
कभी-कभी कहता था कौआ
तुम भी चलो साथ मेरे भैया
बड़ा आलसी था वो कबूतर
बोलता मैं बैठूँगा घर पर
एक बार गर्मी का मौसम
सूख गया था सारा उपवन
ख़त्म हो गया पानी वहाँ पर
रहते थे वे दोनों जहाँ पर
गला सूखता था हर पल ही
पर कबूतर तो था आलसी
प्यास से वह बेहाल हो गया
और देखते ही निढाल हो गया
कौए ने जब देखा उसको
नहीं रहा था होश भी उसको
उड़ गया कौआ पानी लाने
लग गया उसकी जान बचाने
दूर गाँव वह उड़ कर आया
चोंच में भर कर पानी लाया
पानी जो कबूतर को पिलाया
तो वह थोड़ा होश में आया
कौए की मेहनत रंग लाई
और कबूतर को सोझी आई
वह भी अगर आलस न करता
तो इतनी तकलीफ़ न जरता
आज अगर कौआ न होता
तो वह बस प्यासा ही मरता
ठान लिया अब तो कबूतर ने
नहीं बैठेगा वो भी घर में
वह भी कौए संग जाएगा
अपना खाना खुद लाएगा
अब वो दोनों मिलकर जाते
जो भी मिलता घर ले आते
दोनों ही मिलजुल कर खाते
गाना गाते और सो जाते
...............................................
बच्चो तुमने सुनी कहानी
तुम न करना यह नादानी
कभी भी तुम न करना आलस
बढ़ते रहना आगे हरदम

*******सीमा सचदेव*******


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4 पाठकों का कहना है :

प्रभाकर पाण्डेय का कहना है कि -

रोचकता से परिपूर्ण शिक्षाप्रद बालोपयोगी रचना। सुन्दरतम।

Kavi Kulwant का कहना है कि -

सीमा जी ! बहुत खूब.. आप से मुलाकात की इच्छा है..

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

सुन्दर..

बहुत बहुत बधाई

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आपकी बाल कविताएँ बहुत रोचक होती हैं।

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