Sunday, April 13, 2008

वैसाखी का मेला


वैसाखी का लगा है मेला
खुश सारे क्या गुरु क्या चेला
आओ सुनाऊँ पुरानी बात
वैसाखी का है इतिहास
सिख धर्म के दश गुरु थे
दशम गुरु श्री गोबिन्द सिंह थे
होता लोगों पे अत्याचार
आया उनको एक विचार
क्यो न ऐसा पंथ बनाएँ
और लोगो की रूह जगाएँ
जिससे समझे खुद को लोग
मिटाएँ अत्याचार का रोग
उसमें सबको शिक्षा देंगे
मानवता के लिए लड़ेंगे
ऐसा पंथ उन्होंने साजा
जिसमें ना परजा ना राजा
होंगे सारे गुरु के शिष्य
सँवारेगे देश का भविष्य
शिष्य चुने उन्होने पाँच
की पहले उन सबकी जाँच
क्या वो देश पे मर सकते है ?
सच्च के लिए क्या लड़ सकते है?
कराया सबको अमृतपान
कड़ा,केस,कञ्घा,किरपान
देकर उनको सिख नवाजा
ऐसे खालसा पंथ था साजा
वैसाखी का दिन था पावन
सन था सोलह सौ निन्यावन
सिख धर्म का यह उपहार
तब से ही मनता त्योहार
.................
.................
एक बात मैं और बताऊँ
एक और इतिहास सुनाऊँ
जब था अपना देश गुलाम
अंग्रेजों का था बस नाम
भारत माँ को बनाया दासी
दुखी थे इससे भारतवासी
किसी तरह भारत को बचाएँ
अंग्रेज़ों को दूर भगाएँ
सन था तब उन्नीस सौ उन्नीस
था वैसाखी का पावन दिन
लोगो ने मिलकर सभा बुलाई
होगी अंग्रेज़ों की विदाई
जगह थी जलियाँ वाला बाग
अमृतसर में है भी आज
अंग्रेजों को पता चला जब
हुए लाल-पीले सुन के तब
नहीं सभा वो होने देंगे
न ही भारत को छोड़ेंगे
आ गया वहाँ पे जनरल डायर
अचनचेत ही कर दिए फायर
लोगो की थी भीड़ अपार
जनरल खड़ा बाग के द्वार
सारा मार्ग बन्द कर दिया
और लाशों से बाग भर दिया
सैकड़ों लोग वहीं पर मर गए
बाकी सबको जागरूक कर गए
व्यर्थ न हुआ उनका खून
लोगों में भर गया जुनून
सबके खून का बदला लेंगे
अंग्रेजो को नहीं सहेंगे
सबने मिलकर लड़ी लड़ाई
अंग्रेज़ों से मुक्ति पाई
हो गया अपना देश आजाद
गए अंग्रेज़ देश से भाग
.................
..................
लगते हैं मेले हर साल
हो किसान जब मालामाल
फसलें जब सारी पक जाती
कट कर जब घर पर आ जाती
भर जाते हैं किसानों के घर
तब उनको नहीं होता कोई डर
वर्षा आए या तूफान
उनपे मेहरबान भगवान
सारे साल का मिल गया खाना
फिर क्यों न त्योहार मनाना
मिल कर सारे नाचे गाएँ
आओ हम वैसाखी मनाएँ
उन शहीदों को भी रखे याद
और ईश्वर से करे फरियाद
खुशियों के लगते रहे मेले
और सारे दुखों को हर ले

कवयित्री- सीमा सचदेव


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8 पाठकों का कहना है :

डॉ० अनिल चड्डा का कहना है कि -

ऽऐतिहासिक दृष्टि से बच्चों के लिये संदेशवाहक रचना ।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

सीमा जी,

आप बाल मनोविज्ञान बहुत खूब समझती हैं। क्या बताना है, कैसे बताना है इसपर आपको महारत है। बहुत-बहुत बधाई।

Kavi Kulwant का कहना है कि -

सीमा जी.. तहे दिल से मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.. कितनी ही बातें आप ने रख दीं..
पहली कविता में तेरह की जगह सोलह कर दीजिए... मेरा आपको नमन.. आप से भेंट का इच्छुक

seema sachdeva का कहना है कि -

Dhanyavaad Kavi Kulvant ji ,aapne meri galti pakad li ,na jaane yah bhool mujhse kaise ho gai ,khair thoda jaldi me likha tha aur aajkal mai out-of-city hoo to bas vaisaakhi ka tyohaar tha ,laga likhana jaroori hai , to jaldi me likh kar post kar diya , mai admn. BAAL-UDYAAN se request karoogi ki
SAN THA TERAH SAU NINYAANAV ki jagah
SAULAH SAU NINYAANAV
kar deejiye ,kyonki GURU GOBIND SINGH ji ne 13 april 1699 me KHALSA PANTH ki sathaapana ki thi , mai ek baar fir apni bhool ke liye kshama chaahungi....seema

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

सीमा जी,

सुन्दर बाल-रचानायें दी हैं आपने समयानुकूल
बहुत बधाई की पात्र है आप..

बधाई

pushpdeep का कहना है कि -

Seema ji,
bahut achhey awm saral dhang se baishkhi ka purn chitran ker diya ,,achha laga perkey,mai yahan MELBOURNE mai bhi rehker HINDYUGM SE JURNEY ..per apney ko apney BHARAT se her pal ,her PARV per bahut najdeek se uski khushbu mehsuus ker rahi huun, aap sab awm HINDYUGM badhai key patr hain

Dr. Zakir Ali Rajnish का कहना है कि -

इस प्यारी कविता के लिए बधाई।
पर मैं एक बिना मांगे सुझाव देना चाहतूं। हूँ। कविता जितनी छोटी होती है, उतनी अच्छी लगती है। आशा है आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगी और भविष्य में छोटी और रोचक कविताएँ इसी तरह हम लोगों को पढवाती रहेंगी।

seema sachdeva का कहना है कि -

kaavya-katha padhaneaur tippani karne ke liye aap sab ka bahut-ahut dhanyavaad .Pushapdeep ji aapse kahna chaahungi ki aap hamesha BHARAT ki khushaboo ko mahsos karti rahe aur har tyohaar sabke liye khushiya lekar aaye ,yahi dua hai ISHVAR se .

JAKIR ALI ji pata nahi kyo lagta hai ki aapki tippani rachana ko aur sundar bana deti hai . aapka kahna bilkul sahi hai ki choti kavita rochak hoti hai , is se pahle meri do-teen kavitaayen "MERI GUDIYA" , "PARIYO KI SHAHJAADI " yaha par publish hui hai ,vo lambi nahi hai , yah to teen etihaasik kathayen hai ,jinko gaday me n likh kar ,keval rochakta aur sarlata ka dhayaan rakhate hue hi paday me likha ,aur utna hi likha jitna bachche aasaani se pachaa sake , aap is ko dekhiye ,yah teen kathaayen hai jinko alag bhi kiya jaa sakta hai , fir bhi mujhe aapka sujhaav vaastav me bahut achcha laga aur aage se pryaas karoongi ki kaavay-katha ko bhi thoda aur kam kar sakoo. Aapki tippani ke liye bahut-bahut dhanyavaad.....seema sachdev

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