Friday, April 24, 2009

ले त्रिशूल अब अपने हाथ

याद करो तुम पशुपति नाथ
ले त्रिशूल अब अपने हाथ

भारता माता रही पुकार
बहुत हो चुका भ्रष्टाचार
भूल गये हैं सब भगवान
पूज रहे हैं सब शैतान
साथ तुम्हारे दीनानाथ
ले त्रिशूल अब अपने हाथ

मानव जीवन को धिक्कार
सहता कितने अत्याचार
दुख से भरा हुआ संसार
फिर भी चुप सारा संसार
मानव मानव का दे साथ
ले त्रिशूल अब अपने हाथ

दानव मिलकर देते त्रास
कर दो इनका सत्यानाश
सहन न होते इनके काज
खत्म करो अब दानव राज
इनसे करना दो दो हाथ
ले त्रिशूल अब अपने हाथ

याद करो तुम निज अभिमान
भारत माँ का गौरव गान
प्राणों का तू मत धर ध्यान
जीवन को दो न्याय महान
हमें मिटानी काली रात
ले त्रिशूल अब अपने हाथ

कवि कुलवंत सिंह


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5 पाठकों का कहना है :

संजय तिवारी ’संजू’ का कहना है कि -

बहुत बडिया

rachana का कहना है कि -

एक बहुत ही सुंदर रचना पढ़ के जोश आ जाये एसी
सादर
रचना

neelam का कहना है कि -

achchi kavita ,
veer ras se ot prot ,achcha manchan bhi kiya jaa sakta hai is kavita ka .
bachche to comment likhte nahi hain ,magar visit jaroor karte hain un sabki taraf se hum aapko dhanuvaad karte hain

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

बता रहे हैं कवि कुलवंत.
उनके यश का कभी न अंत.
जो औरों खातिर जीते.
अमृत बाँट गरल पीते.
'सलिल' नवाते उनको माथ
लो त्रिशूल अब अपने हाथ.

Kavi Kulwant का कहना है कि -

आप सबी का हार्दिक धन्यवाद...

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