Friday, March 28, 2008

आना बाना दाना

आना बाना दाना
चिडिया खाये खाना
पेट भरे जब उसका
मस्ती से गाये गाना ।

आना बाना दाना
सैर सपाटे जाना
शेर दिखे जो राह में
सरपट भागे आना ।

आना बाना दाना

टिफिन नही बनाना
टीचर करती गुस्सा
स्कूल नही अब जाना ।

आना बाना दाना
शोर नही मचाना
नींद टूटी दादा की
तो मार तुम ही खाना ।

आना बाना दाना
मौसम है सुहाना
खूब छाए हैं बादल
बारिस में नहाना ।

आना बाना दाना
मेहमां को है आना
मम्मी, पापा आफिस में
घर को हमें सजाना ।

आना बाना दाना
लड्डू खूब खाना
पापा ने पकड़ी चोरी
चले न कोई बहाना ।

आना बाना दाना
चावल है पुराना
भूख लगी है मम्मी
अब तो दे दो खाना ।

आना बाना दाना
सबको खेल खिलाना
करे जो कोई शैतानी
टंगड़ी मार गिराना ।

आना बाना दाना
गाड़ी में घुमाना
धूम मचाएं मिलकर
सीटी तुम बजाना ।

आना बाना दाना
बर्थ-डे है मनाना
सबको है बुलाया
केक बड़ा सा लाना ।

आना बाना दाना
छोड़ो अब सताना
मिलकर झूमें नाचें
छेड़ो कोई तराना ।

कवि कुलवंत सिंह


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6 पाठकों का कहना है :

anju का कहना है कि -

आना बाना दाना
बहुत अच्छी बाल कविता
बधाई सवीकरें

seema sachdeva का कहना है कि -

कवि कुलवंत सिंह ji,
is आना बाना दाना ke chakkar me bhool gay ham apanaa khaana ,bahut achchee kavita.....seema

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ का कहना है कि -

आना बाना दाना
मजा आ गया, माना।

KAMLABHANDARI का कहना है कि -

aapki kavita padhkar accha laga. aapne mera blog padha ar mera hausla badhaya aapka bahut dhanyabad.

pooja anil का कहना है कि -

वैसे तो बड़ी लम्बी कविता है पर मेरी २ साल की बेटी का दिल इससे नहीं भरा, दो बार पढ़ कर सुनाया तो बात बनी , मुझे भी पढने में मज़ा आया , अच्छी बाल कविता है , बधाई
पूजा अनिल

nav pravah का कहना है कि -

कुलवंत जी,अच्छी कविता.बच्चे प्रभावित जरुर होंगे.
आलोक सिंह "साहील"

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