Tuesday, May 6, 2008

यूँ न पढाई-पढाई करें।


छोटा सा बचपन है
प्यारा सा उपवन है
यूँ न पढाई- पढाई करें।

मम्मी के आंचल में
रहने दे पल दो पल हमें
पापा की गोद में खेलने दे
पल दो पल

ताकि कल को हम जान सके
पहचान से संभाल सके
जीवन को अपने हमें संवार सके
आगे तो पढना है बडा आदमी बनना है
अभी तो, छोटा सा बचपन है
प्यारा सा उपवन है
यूँ न पढाई-पढाई करें।

-रचना सागर
03.04.2008





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4 पाठकों का कहना है :

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

नन्ही कमर पिचक जाती है
इस बस्ते के बोझ से.....
हम तो यारो तंग आ गये
पढ़ाई पढ़ाई हर रोज से.....
कम से कम बचपन तो अपना
जीने तो कुछ मौज से ......
नन्ही कमर पिचक जाती है
इस बस्ते के बोझ से.....

रचना जी बड़े दिनों बाद पधारी हो.. पुनः स्वागत है
और बहुत बहुत धन्यवाद वात्सल्य में डुबोने के लिये..
वैसे आप खुद ही पढ़ा रही हो छुटकी को और खुद ही कह रही हो कि 'यूँ न पढ़ाई पढाई करें'
देखा..... कैसा जमाना आ गया है.. :)

शोभा का कहना है कि -

रचना जी
बिल्कुल ठीक कहा आपने। बचपन को उन्मुक्त ही रहने देना चाहिए। एक अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई।

Seema Sachdev का कहना है कि -

गंदी बात ......:)) रचना जी ख़ुद ही तो पढाई न कराने की बात कह रही हो और चुटकी बेचारी.....:(? रहम करो नन्ही-मुन्नी पर .......सीमा सचदेव

pooja anil का कहना है कि -

रचना जी सही कहा , बचपन से ही पढ़ाई का बोझ ठीक नहीं है ......पर तेजी से आगे बढ़ती दुनिया में कोई और उपाय भी तो नहीं बचता ....!!! बच्चे चाहें या ना चाहें , पढ़ाई तो करनी ही होगी .... मजबूरी है ):
^^पूजा अनिल

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