Friday, May 30, 2008

लुका छिपी

सबसे प्यारा
जग में न्यारा
खेल हमारा
लुका छिपी ।

आँख मिचौली
गिनती बोली
आँखे खोली
लुका छिपी ।

घर में ढ़ूंढ़ा
बाहर ढ़ूंढ़ा
गली में ढ़ूंढ़ा
लुका छिपी ।

इसको खोजा
उसको खोजा
धप्पा खाया
लुका छिपी ।

फेल हुआ फिर
आँख बंद कर
गिनती गिन फिर
लुका छिपी ।

सौ तक गिना
देखे बिना
छुपी सेना
लुका छिपी ।

खोजा सबको
इसको उसको
सब सेना को
लुका छिपी ।

खोजा किसको
पहले जिसको
बारी उसको
लुका छिपी ।

कवि कुलवंत सिंह


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4 पाठकों का कहना है :

मीनाक्षी का कहना है कि -

aapaki kavita bahut pyaari hai. mauka milte hi ise bachho ke liye apani avaaz dena chaungi...

Seema Sachdev का कहना है कि -

मज़ा आया
सबको पढाया
खेल खिलाया
लुका छिपी
छुपन छुपाई
अक्ल दौडाई
ढूंढ के लाई
लुका छिपी
बहुत अच्छे कवि जी |छोटे छोटे शब्दों मे बच्चो के लिए कितनी प्यारी कविता कह दी आपने ,खेलने को मन कर रहा है, याद आ गया
लुक छुप जाना
मकई का दाना
राजे की बेटी आई जे
चलो खेले .....लुका छिपी....:) :) सीमा सचदेव

pooja anil का कहना है कि -

कवि कुलवंत जी ,

लुका छिपी बहुत प्यारी कविता लिखी है , बधाई.


^^पूजा अनिल

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

लुक छुप लुक छुप जाओ ना...
आओ मेले नन्हें मुन्ने प्याले प्याले राजा
आओ मेले गले लग जाओ ना.. अले आओ ना..

बढिया लुका-छिपी कुलवंत जी..

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