Friday, May 29, 2009

धरती का श्रंगार

भूल गया पेड़ों का दान
मानव क्या इतना नादान

काट काट कर जंगल नाश
खुद अपना कर रहा विनाश

स्वार्थ बना है इसका मूल
गुड़ पेड़ के गया है भूल

यही हैं देते प्राण वायु
इनसे मिलती लंबी आयु

करते अपना यह उपचार
करते हम पर यह उपकार

तरह तरह के देते फूल
कम करते यह मिट्टी धूल

औषधि का देते सामान
हम भूले इनकी पहचान

कैसा है अधुना इनसान
रखें याद न सृष्टि विधान

मानवता से कैसा वैर
काट रहा खुद अपने पैर

साध रहा बस अपने स्वार्थ
भूल गया है यह परमार्थ

पेड़ों की हम सुनें पुकार
बंद करें अब अत्याचार

यह हैं धरती का श्रॄंगार
इनसे ही जीवन साकार

कवि कुलवंत सिंह


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4 पाठकों का कहना है :

neelam का कहना है कि -

वाकई वृक्ष (पेड़ )हमारी धरती का श्रृंगार है ,कुलवंत जी की कविता शिक्षा प्रद है |

रंजना का कहना है कि -

Bahut hi sundar shikshaprad kavita.

manu का कहना है कि -

प्रेरक..

rachana का कहना है कि -

पेडों से धरती सजती है ये सही है .धरती जो सजाये रखना है
सादर
रचना

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