Friday, October 2, 2009

क्या खूब थी उनकी लाठी

वो झेल न पाये आँधी,
जो ले कर आये गाँधी,
बेकार हुई सब तोपें,
क्या खूब थी उनकी लाठी।

सदियों में वो दिन आया,
भारत ने हीरा पाया,
उसने जब आँख थी खोली,
इक नया सवेरा आया।

हमें अपनी धरती देने को,
उसने खुद को था माटी किया,
दे हमें खुले चमन की हवा,
वो खुद न जाने कहाँ गया।

दुश्मन तो कुछ न बिगाड़ सके,
अपनों ने गोली मारी थी,
समझो कि माली ने खुद,
अपनी ही बगिया उजाड़ी थी।

अपना सब कुछ दे कर के,
इस गुलशन को आबाद किया,
तोड़ जंजीर गुलामी की,
हमको उसने आजाद किया।

याद वो बरबस आता है,
जब दो अक्टूबर आता है,
ऐसे महापुरुष के आगे,
सिर खुद ही तो झुक जाता है।

--डॉ॰ अनिल चड्डा


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3 पाठकों का कहना है :

shanno का कहना है कि -

अनिल जी,
बहुत अच्छी लगी कविता '' क्या खूब थी उनकी लाठी ''....आइये हम सब अपने बापू को याद करें और उनकी कुर्बानी को.

Manju Gupta का कहना है कि -

बापू की १४० वीं जयंती पर बढिया कविता के साथ उन्हें नमन .

Shamikh Faraz का कहना है कि -

वो झेल न पाये आँधी,
जो ले कर आये गाँधी,
बेकार हुई सब तोपें,
क्या खूब थी उनकी लाठी।

sundar कविता

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