Friday, January 11, 2008

एक सुखी राष्ट्र

होता अगर ऎसा कोई राष्ट्र,
जहाँ न होता कोई भी भ्रष्ट।
जनता भी होती अनुशासित,
न होता उन्हें दु:ख-कष्ट॥

जाति-पाति का भेद न होता,
धनी-दीन का ना अंतर ।
धैर्य , धर्म और क्षमाशीलता,
होते उनके मूल मंतर ( मंत्र) ॥

लाठी, डंडा, भाला , बरछी
का न होता नामो-निशान।
सच्चरित्रता और कर्मों से
हीं होती उनकी पहचान ॥

युद्ध का कहीं नाम न होता,
होती शांति उधर-इधर।
मानव कभी नहीं समझता
किसी को अपने से इतर( दूसरा) ॥

भय, गरीबी और प्रदूषण को
मिला होता जहाँ निर्वासन ।
मानव-कर्ण बाध्य न होते-
सुनने को झूठे भाषण ॥

कीट, विहग, हस्ती या घोटक
करते सुखमय जीवन व्यतीत।
मानव-सुलभ कुकॄत्य न होते,
प्रेम हीं होती असली रीत ॥

पर ऎसा संभव भी होगा,
बता दे तू , मेरे भगवान ।
'हाँ' भरे उत्तर सुनने को
तरस रहे हैं मेरे कान ॥

-विश्व दीपक 'तन्हा'


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8 पाठकों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

Switzerland

रंजू का कहना है कि -

सुंदर कविता एक सुंदर आशा के साथ लिखी हुई !!

seema gupta का कहना है कि -

पर ऎसा संभव भी होगा,
बता दे तू , मेरे भगवान ।
'हाँ' भरे उत्तर सुनने को
तरस रहे हैं मेरे कान ॥
" hmm nice poetry full of trust n belief that it could ever happen. good thoughts"
Regards

sahil का कहना है कि -

तन्हा जी एक सुंदर urjawan कविता
बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत सुन्दर कविता..

बहुत बहुत बधाई

shobha का कहना है कि -

तन्हा जी
बहुत सुन्दर प्रस्तुति । बधाई

Alpana Verma का कहना है कि -

बहुत नेक ख्वाहिश की है.ईश्वर करे आप की कामना पूरी हो.
कविता भी अच्छी बनी है.बधाई

रचना सागर का कहना है कि -

बहुत अच्छा सपना....

काश आपका सपना सच हो जाये हम भगवान से यही दुआ करते है

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