Thursday, December 20, 2007

बाल कवि-सम्मेलन की सातवीं कविता..

बीच समंदर बैठी थी

मैं बीच समंदर
आती लहरें मेरे ऊपर
मैं डूब-डूब जाती इसके अन्दर
लहरें जाती मुझको छूकर
मछली भी तैरती मेरे साथ
खुश होकर झूमने लगते हाथ
फिसल -फिसल वह जाती पार
कहती जैसे न मानूंगी हार
तब तक लहरें फ़िर से आती
मुझसे मछली दूर हो जाती
बीच समंदर से लहरें आतीं
अपने आप मैं खो जाती...

स्वरदा सुनील वेदमुथा
कक्षा चौथी
एस.बी.ओ.ए.पब्लिक स्कूल
औरंगाबाद (महाराष्ट्र)


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8 पाठकों का कहना है :

shobha का कहना है कि -

वाह स्वरदा! बहुत सुन्दर कविता लिखी है । और इसमें संदेश भी बहुत अच्छा दिया है । जीवन में हमेशा कठिनाइयों से संघर्ष करते रहना चाहिए । अगली कविता का इन्तज़ार रहेगा । आशीर्वाद सहित

रंजू का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर कविता लिखी है आपने ..खो गए हम भी इस में :)

sahil का कहना है कि -

बहुत अच्छे स्वरदा बाबु, बहुत ही प्यारा लिखा.
सप्रेम
आलोक सिंह "साहिल"

Alpana Verma का कहना है कि -

स्वरदा -ये तो मैंने नया नाम सुना----बहुत अच्छा है.
तुम्हारी कविता से जीवन में संघर्ष करते रहने का संदेश सब तक पहुंचेगा.
अभ्यास करती रहो-खूब पढ़ती भी रहो.
शुभकामनाएं-

anuradha srivastav का कहना है कि -

मैं बीच समंदर
आती लहरें मेरे ऊपर
मैं डूब-डूब जाती इसके अन्दर
लहरें जाती मुझको छूकर
मछली भी तैरती मेरे साथ
खुश होकर झूमने लगते हाथ

काश, स्वरदा मैं भी तु्म्हारे साथ इतनी ही बेफिक्री से तैर पाती। लिखना छोडना नहीं शायद तुम नहीं जानती कि तुम कितना अच्छा लिखती हो।

sunita yadav का कहना है कि -

कितनी आसानी से कह दी.....! काश मैं भी आप के साथ होती:-)

सुनीता यादव

अजय यादव का कहना है कि -

वाह स्वरदा! आप तो बहुत अच्छा लिखतीं हैं! हमें आपकी कविता पसंद आई. ऐसे ही लिखतीं रहें.

रचना सागर का कहना है कि -

वाह स्वरदा
बहुत सुन्दर कविता... एसे ही लिखते रहो

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