Monday, December 17, 2007

बच्चे

बच्चे अच्छे लगते हैं
मीठी-मीठी बातें करते
हँसते खेलते पढते लिखते
बच्चे अच्छे लगते हैं
सहज सरल घर घर जाते
बैर मिटाते प्रेम बढाते
कुछ भी गाते गुनगुनाते
बच्चे अच्छे लगते हैं
चाँद सूरज पर ललचाते
रोते हकलाते बातें बनाते
सजते संवरते और सकुचाते
बच्चे अच्छे लगते हैं

बच्चे अच्छे नही लगते
काम पर जाते बोझ उठाते
पसीना बहाते देश को लजाते
बच्चे अच्छे नही लगते हैं


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डॉ.नंदन-बचेली, बस्तर (छ.ग.)


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4 पाठकों का कहना है :

Alpana Verma का कहना है कि -

नन्दन जी,
ये पंक्तियाँ बहुत प्यारी लगीं-
''चाँद सूरज पर ललचाते
रोते हकलाते बातें बनाते
सजते संवरते और सकुचाते
बच्चे अच्छे लगते हैं''
-सच में मुस्कराते बच्चे अच्छे लगते हैं और बाल श्रमिकों के प्रति भी आपने दुःख जताया और यह भी बताया कि इस से देश की छवि पर भी असर पड़ता है.अच्छी कविता है
यह भी बच्चों को भाएगी.

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

डॉ. नंदन..

आपकी रचनाओं से बालौद्यान को एक उर्जा प्राप्त हुई है। आपकी हर रचना एक सोच का बीज प्रदान करती है। इस रचना के दोनो ही पहलू संवेदित करते हैं।

*** राजीव रंजन प्रसाद

रंजू का कहना है कि -

बच्चे हँसते मुस्कराते ही अच्छे लगते हैं ..बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता नंदन जी !!

sahil का कहना है कि -

नंदन जी,बहुत ही प्यारा वर्णन किया है विशेषकर बच्चों काये स्वरुप-
चाँद सूरज पर ललचाते
रोते हकलाते बातें बनाते
सजते संवरते और सकुचाते
बच्चे अच्छे लगते हैं
वास्तव में बच्चों का ये स्वरुप सिर्फ़ नफ़रत का ही पत्र हो सकता है.
बच्चे अच्छे नही लगते
काम पर जाते बोझ उठाते
पसीना बहाते देश को लजाते
बच्चे अच्छे नही लगते हैं
बहुत ही मिठास भरी मर्म को झकझोरने वाली प्यारी कविता
शुभकामनाओं समेत
आलोक सिंह "साहिल"

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