Wednesday, October 3, 2007

"*रेल*"

आओ बच्चो खेलें खेल
छुक-छुक छुक-छुक चलती रेल
मेरा इंजन सबको खींचे
सब जुड़ जाओ मेरे पीछे
बिना टिकिट चढ़ना मत कोई
आपस में लड़ना मत कोई
नदियां पर्वत बाग-बगीचे
सबको करती जाती पीछे
हिन्दू सिख या मुसलमान
सबका हक़ है एक समान

आओ प्यारे साथी आओ
जहाँ भी जाना हो चढ़ जाओ
मूंगफली,फल या हो खाना
इसमें कूड़ा मत फैलाना
अगर पास में हो सामान
रखना उसका पूरा ध्यान
जगह जगह पर जाती रेल
सबको सैर कराती रेल
प्यार बढ़ाती सबका सबसे
और कराती सबका मेल
आओ बच्चो खेलें खेल


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13 पाठकों का कहना है :

रचना सागर का कहना है कि -

भुपेन्द्र जी,
बहुत सुंदर कविता, खेल का खेल और शिक्षा की शिक्षा।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ का कहना है कि -

बच्चों को रेल के द्वारा अच्छा संदेश दिया गया है। निम्न पंक्तियां तो बहुत ही सुन्दर हैं-
"बिना टिकिट चढ़ना मत कोई
आपस में लड़ना मत कोई
नदियां पर्वत बाग-बगीचे
सबको करती जाती पीछे
हिन्दू सिख या मुसलमान
सबका हक़ है एक समान"
बधाई।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

भूपेंद्र जी..

बहुत अच्छी प्रस्तुति है, बच्चे निश्चित ही आनंद लेंगे। रेल बच्चों को हमेशा ही आकर्षित करती रही है उसपर आप इस काव्यात्मक प्रस्तुति जिसके द्वारा संदेश भी दे रहे हैं,के लिये बधाई के पात्र हैं।

*** राजीव रंजन प्रसाद

रंजू का कहना है कि -

बहुत मजेदार लगी रेल की यह कविता प्यारी
बच्चों जल्दी से आ के करो इस में सवारी :)
बहुत ख़ूब भूपेंद्र जी ...बधाई।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

भूपेन्द्र जी

" नदियां पर्वत बाग-बगीचे
सबको करती जाती पीछे
हिन्दू सिख या मुसलमान
सबका हक़ है एक समान"

बहुत अच्छी प्रस्तुति है मेरे प्यारे भैया बहनों के लिये। और साथ में चित्रों ने तो शोभा दुगुणित कर दी
बधाई

Seema Kumar का कहना है कि -

मज़ा आ गया पढ़कर । मुझे भी रेल चलाने का मन हो आया :)

अजय यादव का कहना है कि -

वाह भूपेन्द्र जी!
आपकी रेल की सवारी तो हमें भी बहुत अच्छी लगी!

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

राघव जी,

आपकी कविता पढ कर बचपन याद आ गया जब हम भी इसी तरह रेल बना सरपट दौड लगाते थे...बच्चों के लिये खेल का खेल और शिक्षा भी साथ में.... बधाई

sunita (shanoo) का कहना है कि -

क्या बात है राघवेन्द्र जी बचपन में आप और हम कहीं साथ-साथ पढ़े तो नही थे..मेरी रेल भी आपकी रेल से कुछ मिलती जुलती है और हम भी एसा ही गाया करते थे...हा हा हा वैसे मज़ा आ गया दोबारा रेल की सवारी करके...कविता में ही सही...

सुनीता(शानू)

bharti का कहना है कि -

Pranam,
Bachhon ke Priy Kavi RaghavG,
Aapki Rail badi lambi doori ki yatra karvayegi..
Baal man ko dhyan me rakhkar aapne khel-khel me badhiya shiksha di hai...
Badhaii..
Shubhkamnayein...

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

भूपेन्द्र,

ऐसे ही बाल-गीतों को लिखने की ज़रूरत है। पढ़ने पर आनंद तो आता ही है, साथ ही साथ संदेभ भी मिल जाता है।

Deepali का कहना है कि -

Good poem
I pray to god you got everything in your life whatever you want

Gita pandit का कहना है कि -

भुपेन्द्र जी,


बहुत सुंदर कविता,
आपकी रेल की सवारी बहुत अच्छी लगी..

नदियां पर्वत बाग-बगीचे
सबको करती जाती पीछे
हिन्दू सिख या मुसलमान
सबका हक़ है एक समान"


अच्छा संदेश ....

बधाई।

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