Sunday, October 14, 2007

बाल कहानी: सबसे बडा पुरस्कार (लेखक: जाकिर अली 'रजनीश')


सलाम अम्मीजान।” घर में कदम रखते ही अकरम जोर से चहकावह सफेद कुर्ता, पाजामा और टोपी पहने हुए था और उसके चेहरे पर खुशी फूली समा रही थीलेकिन जब उसको सलाम का जवाब नहीं मिला, तो उसके चेहरे की चमक फीकी पड गयीवह भागता हुआ सीधे आंगन में पहुंचाउसने देखा कि अम्मी चारपाई पर लेटी हुई कराह रही हैं

क्या हुआ अम्मी? आप....” कहते हुए अकरम चारपाई के पास पहुंच गया

अम्मी ने सिर घुमाकर अकरम की ओर देखा और फिर धीरे से बोलीं, “नमाज पढ आए बेटा?”

हां, पर आप.....?”

कुछ नहीं बेटा, अचानक पैरों में दर्द होने लगातुम फिक्र करो, जाओ सिवइंया खा लो, प्याले में निकाली रखी हैंये दर्द थोडी देर में अपने आप ठीक हो जाएगा।”

मैंने आपसे कितनी बार कहा कि ज्यादा चलाफिरा मत करें, लेकिन आप मानती ही नहींबिलावजह....” कहते हुए वह अम्मी के पैर दबाने लगा

रहने दे बेटा, अभी ठीक हो जाएगाजा, अपने दोस्तों के साथ घूमफिर आज मेला भी तो लगा होगा? लो, एक रूपया रख लो, कुछ लेकर खा लेना।” तकिए के नीचे से एक रूपये का नोट निकाल कर देते हुए अम्मी ने कहा, “...और हां, आज के दिन तो तुझे पुरस्कार भी मिलने वाला है, सरकार की तरफ सेदौड में अव्वल आया था तू।”
नहीं, मैं आपको छोडकर नहीं जा सकता।” अकरम ने प्रतिरोध किया

अरे, क्यों नहीं जाएगा ?” अम्मी ने प्यार से डांटा, “वहां सब लोग तेरा इंतजार कर रहे होंगे, तू नहीं जाएगा तो...”
अकरम ने अम्मी की बात बीच में ही काट दी, “...मैंने कह दिया , मुझे नहीं जाना पुरस्कारवुरस्कार लेनेआप कभी अपनी भी फिक्र कर लिया करो।”

अकरम पुन: अम्मी के पैर दबाने लगाएक रूपये का नोट उसके हाथ में ज्यों का त्यों फंसा रहाअम्मी ने इस बार कुछ नहीं कहाउन्हें मालूम था कि जब इसने जिद कर ली, तो फिर कहने से कोई फायदा नहीं

क्या कर रहे हो अकरम? जल्दी करो, प्रधान जी तुमको बुला रहे हैं।” यह आवाज अकरम के दोस्त शफीक की थी, जो दालान के पास से अकरम को आवाज दे रहा था

अकरम की ओर से कोई जवाब मिलने पर शफीक उसके पास गयावह उसकी अम्मी को सलाम करने के बाद बोला, “जल्दी चलो, वहां पर सब लोग गये हैंबस थोडी देर में कार्यक्रम शुरू होने वाला है।”

नहीं, मुझे नहीं जाना पुरस्कारवुरस्कार लेने।” अकरम ने शफीक से अपना कंधा छुडाते हुए कहा, “तुम्हें मालूम है, मेरी अम्मी की तबियत खराब है और तुम्हें पुरस्कार की पडी है।”

यह देखकर अम्मी से रहा गयावे बिस्तर से उठते हुए बोलीं, “नहीं बेटे, तू मेरी फिक्र करमैं बिलकुल ठीक हूं।” कहते हुए उन्होंने शफीक की ओर देखा, “शफीक बेटा, तू इसे अपने साथ ले जा।”

चलो यार।” शफीक ने अकरम का हाथ पकडकर उसे उठाने की कोशिश की

अकरम का मन मेला जाने के लिए स्वयं ही कितने दिनों से उतावला थाआखिर ईद का मेला साल में एक बार ही तो आता हैकितनी सारी दुकानें लगती हैं वहांआसपास के दस गांवों से लोग आते हैंऔर फिर इतने सारे लोगों के बीच नेताजी के हाथों पुरस्कार मिलना कितने गर्व की बात हैपिछले एक महीने से वह इसी दिन की प्रतीक्षा कर रहा थाकितनी योजनाएं बनाईं थी उसनेलेकिन आज अम्मी की तबियत अचानक खराब हो जाने से उसका मूड उखड गया थाभला वह ऐसी हालत में उन्हें अकेला छोडकर कैसे चला जाए?शफीक ने दुबारा अकरम का हाथ पकड कर घसीटाइस बार वह बेमन से उठ गयाउसने एक बार अम्मी की ओर देखाजैसे जाने से पहले आखिरी इजाजात मांग रहा हो

मैं बिलकुल ठीक हूं बेटा, तू आराम से जा।” अम्मी ने उसे आश्वासन दिया

अकरम ने पुन: एक बार अम्मी की ओर देखा और फिर शरीफ के साथ बाहर निकल गयाअकरम के जाते ही उसकी अम्मी अपने पति के बारे में सोचने लगींवे किराने की एक दुकान चलाते थेउनकी इच्छा थी कि अकरम खूब पढे और बडा होकर कोई बडा अफसर बनेलेकिन दुकान से जितनी आमदनी होती थी, उससे तो घर का खर्च भी मुश्किल से चल पाता थाइसलिए वे अकरम को किसी अच्छे स्कूल में नहीं पढा पा रहे थेअकरम के अब्बू का एक दोस्त विदेश में नौकरी लगवाने का काम करता थाअपने दोस्त से कहकर उन्होंने दुबई में एक नौकरी का जुगाड किया और फिर इधरउधर से पैसे उधार लेकर विदेश चले गये 

अभी कुछ दिनों पहले ही अकरम के अब्बू ने खर्चे के लिए कुछ रूपये भेजे थेहालांकि घर में पैसों की सख्त कमी थी, लेकिन फिरभी अम्मी ने वे सारे रूपये उन लोगों को दे दिए, जिनके वे कर्जदार थेआज जो एक रूपया उन्होंने अकरम को दिया था, उसे उन्होंने कई दिनों से संभाल कर रखा थाईद के अवसर पर बच्चों मेंईदीके रूप में पैसे देने की परम्परा हैअगर आज अकरम को ईदी मिलती, तो उसके कोमल मन को ठेस लगती और वह अन्य बच्चों के सामने स्वयं को हीन महसूस करता

अचानक उनके पैरों का दर्द बढ गयावे पुन: चारपाई पर लेट गयींधीरेधीरे दर्द बढता ही गयाऔर जब उनसे रहा गया, तो उनके मुंह से चीख निकल ही गयी, “अकरम बेटे।”

और तभी जैसे चमत्कार हो गयाअकरम बाहर सेजी अम्मीकहता हुआ आया और उनसे लिपट गया

मेले जाते समय अकरम को बराबर ऐसा लग रहा था कि कहीं अम्मी की तबियत बिगड जाएऐसे में उन्हें उसकी सख्त जरूरत पडेगीबस यही सोचकर वह रास्ते से ही घर लौट आयाईदी के रूपये से उसने अम्मी के लिए दवा खरीदी और उसे लेकर वापस घर गया

एक गिलास में पानी लेकर अकरम ने अम्मी की तरफ दवा बढाई, “लीजिए अम्मी, दवा खा लीजिएअभी आराम मिल जाएगा।” कहते हुए उसने सहारा देकर अम्मी को उठाया

अकरम की बातें सुनकर अम्मी स्नेह से नहा उठींलेकिन तभी उनकी नजर अकरम के हाथ में थमी दवा की गोली पर चली गयीभला ये दवा इसे कहां से मिली? और जब उनसे रहा गया, तो उन्होंने पूछ ही लिया, “लेकिन बेटे, तू ये दवा कहां से लाया?”

आप ही ने तो पैसे दिए थे।” कहते हुए अकरम ने अम्मी को दवा खिलाई और फिर उन्हें लिटा दिया

अपने प्रति बेटे का यह प्रेम देखकर वे गदगद हो गयींउनका मन चाहा कि वे अकरम को सीने से लगा लें और उसे जी भर कर प्यार करेंलेकिन तभी उनके मन में पुरस्कार वाली बात कौंध गयीवे बोलीं, “लेकिन बेटे, तुम तो पुरस्कार लेने....?”

मेरा सबसे बडा पुरस्कार तो आपकी सेवा हैआपने मुझे पालपोसकर इस काबिल बनाया हैआपकी दुआ से मैं ऐसे कई पुरस्कार जीतूंगा। ...आज आपकी तबियत ठीक नहीं है, आपको मेरी जरूरत है, तो क्या ऐसे में मैं आपको छोडकर पुरस्कार लेने चला जाता? नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकताआप यहां दर्द से तडपती रहें और मैं वहां अपना सम्मान करवाऊं, यह मुझसे नहीं हो सकताकभी नहीं हो सकता।” कहते हुए अकरम की आंखें भर आईं

हृदय में उठते स्नेह के ज्वार को अम्मी ज्यादा देर तक थाम सकीं और उन्होंने अपने बेटे को सीने से लगा लियाआंसू रूपी मोती उनकी आंखों से झरझर झर रहे थे



(बच्चों सच्ची ईद और सच्चा त्योहार बडों सी सेवा में ही समाया हुआ हैआप सब को ईद की हार्दिक शुभकामनायें)


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10 पाठकों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

अकरम की इस ईद नें प्रेमचंद की रचना "ईदगाह" का स्मरण करा दिया। रजनीश जी ईद के पवित्र पर्व में आपनें बच्चों को इतना शिक्षाप्रद तोहफा दिया है वह अनुकरणीय है। आपकी कलम, कल के भारत को सही दिशा दे रही है। यही वो संस्कार हैं जिन्हें हमें अपनी पीढी को प्रदान करने आवश्यकता हैं। वस्तुत: उदाहरण और कथायें ही बाल मन के रिक्त कोनों को भरती हैं और कालांतर में उनका आचरण बनती हैं। आपकी लेखनी को नमन।


*** राजीव रंजन प्रसाद

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

रजनीश जी

आज के पवित्र और सौहाद्र पूर्ण त्योहार के अवसर
पर बच्चों को मां बाप के प्रति आदर की बात
निःसंदेह ईद का सबसे बड़ा तोहफा है

पवित्र ईद की मुबारकबाद के साथ ही
सामयिक प्रस्तुति के लिये बधाई

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

रजनीश जी आपको और सभी पाठकों व मित्रों को ईद की शुभकामनायें. सुन्दर भाव भरी रचना के लिये बधायी.

रितु रंजन का कहना है कि -

कहानी शिक्षाप्रद तो है ही, बच्चों के मन पर यह एसा छाप छोडने में सक्षम है कि वे ताउम्र इसे नहीं भुला सकेंगे।

रचना सागर का कहना है कि -

रजनीश जी,
सचमुच ईद के मौके पर अपने कहानी के माध्यम से बहुत सुंदर शिक्षा दी...
बच्चे तो बच्चे आशा है कि बडे भी इससे शिक्षा लेगे..

रंजू का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर कहानी रजनीश जी
ईद के मुबारक मौके पर पढ़ना इसको बहुत अच्छा लगा ...सुन्दर रचना के लिये बधाई!!

tanha kavi का कहना है कि -

रजनीश जी,
सच कहता हूँ, कहानी पढते वक्त आँख से आँसू निकल आए। यह कहानी आज के समाज के लिए बहुत जरूरी है, जहाँ भौतिकता के फेर में हम ऎसे फंस गए हैं कि अपने बड़े-बुजुर्गों के लिए भी वक्त नहीं निकाल पाते।
ऎसी शिक्षाप्रद कहानी के लिए बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

Gita pandit का कहना है कि -

रजनीश जी !

आपको सभी कों ईद की शुभकामनायें.

सुन्दर शिक्षाप्रद रचना ...

बधाई

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

रजनीश जी,
सच में एक बहुत शिक्षाप्रद व मूल्यवर्धन करने वाली कहानी..

वाकई प्रेमचन्द जी की "ईदगाह" याद आ गयी..

shobha का कहना है कि -

रजनीश जी
बहुत सुन्दर कहानी सुनाई आपने । प्रेम चन्द की ईदगाह कहानी याद आ गई । बधाई स्वीकारें ।

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